पेरिस की तपिश : जलवायु संकट का कठोर सच
डॉ राजाराम त्रिपाठी
एक बार फिर वर्षा ऋतु हमारे द्वार पर आकर ठिठक गई है। आषाढ़ अपने नियत समय पर आया अवश्य, परंतु जैसे किसी रूठे हुए अतिथि की तरह बिना भीतर आए ही लौट जाने की जिद पर अड़ा हो। खेतों की मेड़ों पर किसान की निगाहें अब भी आकाश में अटकी हैं। चुनावी प्रत्याशी की तरह बादल आते हैं, आश्वासन देते हैं और बिना बरसे लौट जाते हैं। धरती की देह फट रही है, ताल तलैया दम तोड़ चुके हैं, नदियों की सांसें उखड़ रही हैं और किसान के मन में घनघोर आशंकाएँ उमड़ रही हैं।
यह केवल भारत की कहानी नहीं, बल्कि वैश्विक संकट का स्थानीय चेहरा है।
संयोग ही था कि इसी जून के अंतिम सप्ताह में जब मैं फ्रांस की राजधानी पेरिस में था, उसी समय पूरा यूरोप भीषण हीट वेव की गिरफ्त में था। पेरिस, जिसे दुनिया अपने सौंदर्य, अनुशासित नगरीय नियोजन और हरियाली के लिए जानती है, वहां की तपती सड़कों पर चलते हुए लगा जैसे प्रकृति मनुष्य के अहंकार का सार्वजनिक परीक्षण कर रही हो। विशाल वृक्षों से आच्छादित बुलेवार्ड, शहर के चारों ओर फैले हरित क्षेत्र, हरियाली से सजे राजमार्ग, आधुनिक शीतलन व्यवस्था और अरबों यूरो की पर्यावरणीय परियोजनाओं के बावजूद फ्रांस इस बार प्रकृति के प्रकोप के सामने असहाय दिखाई दिया। स्कूलों में छुट्टी कर दी गई थी। जहां हजारों की भीड़ रहती थी उन दर्शनीय स्थलों पर कौए बोल रहे थे। गर्मी से बेहाल लोग फव्वारों के नीचे पनाह ले रहे थे।
फ्रांस की सार्वजनिक स्वास्थ्य एजेंसी के अनुसार हाल की हीट वेव के दौरान देश में एक हजार से अधिक अतिरिक्त मौतें दर्ज की गईं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार पूरे यूरोप में 1300 से अधिक अतिरिक्त मौतें हुईं और लगभग 19 करोड़ लोग 35 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान झेलने को विवश हुए। जर्मनी, पोलैंड, चेक गणराज्य और हंगरी जैसे देशों में तापमान के पुराने सारे रिकॉर्ड टूट गए।
ये आंकड़े केवल संख्या नहीं, बल्कि स्पष्ट चेतावनी हैं।
प्रकृति समय-समय पर मनुष्य को उसकी सीमाएँ याद दिलाती है। किंतु आधुनिक मनुष्य, विशेषकर तथाकथित विकसित समाज, स्वयं को प्रकृति का स्वामी मान बैठा है। हमने नदियों को नालों में बदला, जंगलों को उद्योगों के हवाले किया, पर्वतों को विस्फोटकों से छलनी किया और अब जब प्रकृति प्रतिकार कर रही है, तब हम सम्मेलनों, घोषणाओं और कार्बन क्रेडिट के व्यापार में समाधान खोज रहे हैं।
संस्कृत का एक अत्यंत सारगर्भित वचन है:-
“माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।”
अर्थात, यह पृथ्वी हमारी माता है और हम उसके पुत्र हैं।
दुर्भाग्य यह है कि आधुनिक मनुष्य ने अपनी ही माता को केवल उपभोग की वस्तु समझ लिया है। अब कुकर्म-फल तो भोगना ही पड़ेगा।
अंग्रेज़ दार्शनिक और कवि टी. एस. इलियट ने लिखा था, “Humankind cannot bear very much reality.” आज जलवायु परिवर्तन वही कठोर यथार्थ बनकर हमारे सामने खड़ा है, जिससे आंखें चुराना अब संभव नहीं।
भारत में भी स्थिति कम चिंताजनक नहीं है। इस वर्ष मानसून लगभग एक माह तक विलंबित रहा। देश के अनेक हिस्सों में बुवाई प्रभावित हुई है। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि वर्षा का वितरण असंतुलित रहा, तो खरीफ उत्पादन पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। विश्व की सर्वाधिक जनसंख्या वाले देश भारत के लिए यह केवल कृषि संकट नहीं, बल्कि संभावित खाद्य सुरक्षा संकट भी है।
विडंबना देखिए। जिस बस्तर को कभी मोटे अनाजों की जीवित प्रयोगशाला कहा जा सकता था, वहां आज पारंपरिक फसलें तेजी से स्मृतियों में बदल रही हैं। मेरे बचपन में आंखों देखी है कि कुछेक दशकों पूर्व बस्तर के अंदरूनी गांवों में धान के साथ-साथ मंडया अर्थात रागी, कोदो, कुटकी, कोसरा, सांवां, कुल्थी, झुनगा, भदई, जोंधरी अर्थात ज्वार तथा देशी मक्का की भरपूर खेती होती थी। ये फसलें केवल अन्न नहीं थीं, बल्कि बस्तर की जैव विविधता, पोषण सुरक्षा और सांस्कृतिक अस्मिता की जीवित अभिव्यक्ति थीं।
आज पूरी दुनिया इन्हीं मोटे अनाजों को ‘सुपर फूड’ कहकर सिर आंखों पर बिठा रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में इनकी मांग बढ़ रही है। इनकी खेती में लागत भी कम है और बाजार मूल्य अन्य अनाजों से ज्यादा है इसलिए किसानों की आमदनी बढ़ाने में भी सक्षम है। किंतु विडंबना यह है कि जिन समुदायों ने हजारों वर्षों तक इन्हें बचाकर रखा, उन्हीं को तथाकथित विकास ने इनसे दूर कर दिया।
हमने बस्तर के किसान को मुख्य रूप से हाइब्रिड धान का किसान बना दिया, फिर हाइब्रिड मक्का का किसान बनाया, और अब उसे रासायनिक खाद, हाइब्रिड बीज तथा जहरीली दवाई उद्योग का स्थायी ग्राहक बना दिया है।
आज हालात यह है कि बस्तर के राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे स्थित सब्जी व फल के गैरों में यदि आप दस मिनट भी खड़े हो जाएं, तो रासायनिक कीटनाशकों की तीखी गंध और हवा में घुले जहर के असर से चक्कर आने लगेंगे। प्रश्न यह है कि क्या हम वास्तव में फल,सब्जियां,भोजन उगा रहे हैं या जहर की खेती कर रहे हैं?
जब बस्तर जैसे वनाच्छादित, आदिवासी और अपेक्षाकृत पिछड़े क्षेत्र भी बहुराष्ट्रीय कृषि कंपनियों के बाजारवादी मकड़जाल में इस सीमा तक उलझ चुके हों, तब शेष देश की स्थिति की कल्पना सहज ही की जा सकती है।
हमने पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश इन पंचमहाभूतों में विष घोल दिया है। फिर यह अपेक्षा कैसे की जा सकती है कि प्रकृति हमें बिना दंड दिए छोड़ देगी?
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम पुनः प्रकृति की पाठशाला में लौटें। हमें अपने जनजातीय पूर्वजों से सीखना होगा, जिन्होंने हजारों वर्षों तक प्रकृति के साथ संघर्ष नहीं, सहजीवन का मार्ग अपनाया। उन्होंने जंगल को संसाधन नहीं, रिश्तेदार माना; नदी को परियोजना नहीं, जीवन दायिनी माना; और धरती को बाजार नहीं, माता माना।
यह समय चेतावनी को समझने का है, न कि उसे अनदेखा करने का। यदि हमने अभी भी प्रकृति के साथ अपने संबंधों को नहीं सुधारा, तो आने वाली पीढ़ियों के हिस्से में केवल संकट ही बचेगा,,, बशर्ते की वो बची रहें।।





