मोदी मंत्रिपरिषद के पुनर्गठन की चर्चा जोरों पर: राजनीतिक संतुलन, संदेश और नई राजनीतिक रणनीति का संकेत

Speculation rife about Modi Cabinet reshuffle: Signals regarding political balance, messaging, and a new political strategy

एन जी भट्ट

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केन्द्र की एनडीए सरकार के तीसरे कार्यकाल में मंत्रिपरिषद के संभावित पुनर्गठन की चर्चाओं ने एक बार फिर राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। हालांकि मोदी सरकार या एनडीए गठबंधन के सबसे बड़े दल भारतीय जनता पार्टी की ओर से इस बारे में अभी तक कोई आधिकारिक संकेत नहीं दिया गया है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बदलते राजनीतिक परिदृश्य, अगले दो वर्षों में सात राज्यों उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब,गोवा, मणिपुर,गुजरात और हिमाचल प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों, सहयोगी दलों की अपेक्षाओं तथा सरकार के मंत्रियों के प्रदर्शन की हाल ही हुई समीक्षा को देखते हुए मंत्रिपरिषद में फेरबदल की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

भारतीय राजनीति में केन्द्रीय मंत्रिमंडल का विस्तार या पुनर्गठन केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं होती, बल्कि इसके माध्यम से सरकार अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं, संगठनात्मक रणनीति और भविष्य की दिशा का संकेत भी देती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पिछले दोनों कार्यकालों में भी समय-समय पर मंत्रिपरिषद में धमाकेदार बदलाव किए गए, जिनका उद्देश्य गुड गवर्नेन्स (प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने) के साथ-साथ राजनीतिक और सामाजिक संतुलन स्थापित करना भी रहा था।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की काम करने की अनूठी शैली को देखते हुए यदि इस बार मोदी मंत्रिपरिषद का पुनर्गठन होता है तो सबसे पहले उन मंत्रियों के कामकाज की समीक्षा महत्वपूर्ण आधार बन सकती है जिनके विभागों का प्रदर्शन अपेक्षित स्तर का नहीं माना जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी स्वयं कई अवसरों पर परिणाम आधारित कार्यशैली पर बल देते रहे हैं। ऐसे में बेहतर प्रदर्शन करने वाले मंत्रियों को अतिरिक्त जिम्मेदारी मिल सकती है, जबकि अपेक्षाकृत कमजोर प्रदर्शन वाले चेहरों की जिम्मेदारियों में परिवर्तन संभव है। विदेश से लौटने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सोमवार को कैबिनेट साथियो और मंगलवार को केन्द्र सरकार के सभी सचिवों की मैराथन बैठक कर विकसित भारत@ 2047 के लक्ष्यों को प्राप्त करने के रोडमेप के साथ ही विभिन्न मंत्रालयों के कार्यों की समीक्षा भी की है।

जानकार लोगों और मीडिया रिपोर्ट्स का मानना है कि अब मोदी मंत्रिपरिषद – 03 के पुनर्गठन का काउंट डाउन शुरू हो गया है तथा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की पूर्व निधारित यात्राओं की व्यस्तताओं, विदेशी मेहमान की भारत यात्रा और स्वयं प्रधानमंत्री मोदी के पूर्व निर्धारित कार्यक्रमों तथा चार जुलाई को राजस्थान में पचपदरा रिफाइनरी को राष्ट्र को समर्पित करने के बाद 6 जुलाई से 10 जुलाई तक उनकी प्रस्तावित विदेश यात्रा से पहले सिर्फ 5 जुलाई का एक विंडो खुला हुआ है । अतः 5 जुलाई अथवा 11 जुलाई के बाद 21 जुलाई से शुरू होने वाले संसद के मानसून सत्र से पहले किसी भी वक्त मोदी मंत्रिपरिषद का पुनर्गठन हो सकता हैं। राजनीतिक दृष्टि से यह पुनर्गठन महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि अगले दो वर्षों में जिन राज्यों उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब,गोवा, मणिपुर,गुजरात और हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं,उन प्रदेशों के नेताओं के साथ ही बिहार, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम, केरल तथा अन्य राज्यों की राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए इन प्रदेशों के सांसदों को मंत्रिपरिषद में अधिक प्रतिनिधित्व दिए जाने की संभावना है। इसके साथ ही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अपने नए अध्यक्ष नितिन नवीन की नई टीम का गठन और राज्यों में संगठनात्मक विस्तार एवं चुनावी रणनीति को और मजबूत करने का प्रयास कर सकती है। राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि कुछ केन्द्रीय मंत्रियों को भाजपा संगठन में और संगठन के कुछ नेताओं को मोदी केबिनेट में शामिल किया जा सकता है।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का यह भी कहना है कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के सहयोगी दलों की भूमिका भी इस बार पहले की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण हो गई है क्योंकि एनडीए सरकार के तीसरे कार्यकाल में भाजपा पूर्ण बहुमत से कुछ पीछे रही थी इसलिए वर्तमान केन्द्र सरकार अपने सहयोगी दलों के समर्थन से चल रही है। ऐसे में यदि मंत्रिमंडल का विस्तार होता है तो सहयोगी दलों को पहले की तुलना में अतिरिक्त प्रतिनिधित्व देकर गठबंधन की एकजुटता को और मजबूत करने का प्रयास किया जा सकता है। इससे मोदी सरकार स्थिरता और समन्वय का संदेश भी देना चाहेगी। सामाजिक समीकरण भी किसी भी मंत्रिपरिषद के गठन का एक महत्वपूर्ण आधार होते हैं। भाजपा लगातार अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, महिलाओं और युवाओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने की रणनीति पर काम करती रही है। संभावित फेरबदल में इन वर्गों के नए चेहरों को अवसर देकर पार्टी सामाजिक समावेशन का संदेश देने का प्रयास भी कर सकती है। महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण की चर्चा के मध्य उनकी भागीदारी बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया जा सकता है। मोदी सरकार प्रशासनिक स्तर पर बुनियादी ढांचे, रक्षा, कृषि, ऊर्जा, डिजिटल अर्थव्यवस्था, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रोजगार सृजन और विनिर्माण जैसे क्षेत्रों पर विशेष जोर दे रही है। ऐसे में इन क्षेत्रों से जुड़े मंत्रालयों में विशेषज्ञता और कार्यकुशलता को प्राथमिकता मिलने की संभावना को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता । मोदी सरकार का प्रमुख लक्ष्य विकसित भारत-2047 के संकल्प को गति देना है, इसलिए यह संभावना अधिक है कि मंत्रिपरिषद का स्वरूप भी उसी दिशा में तैयार किया जा सकता है।

इसके अलावा उत्तर प्रदेश और राजस्थान जैसे बड़े प्रदेशों सहित उन राज्यों के नेताओं पर भी राजनीतिक नजर रह सकती हैं, जहां भाजपा भविष्य की रणनीति को और अधिक मजबूत करना चाहती है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि किसी राज्य में संगठन और सरकार के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता महसूस की जा रही है तो वहां के अनुभवी नेताओं को केन्द्र में जिम्मेदारी देकर राजनीतिक संतुलन साधा जा सकता है। हालांकि कुछ हैवीवेट और कथित रूप से कमजोर प्रदर्शन करने वाले और कतिपय विवादों से घिरे मंत्रियों को ड्रॉप करने, कुछ मंत्रियों के विभागों में परिवर्तन करने और नए चेहरों को मंत्रिपरिषद में शामिल करने जैसे चर्चा में आ रहे सभी नाम फिलहाल केवल मीडिया अटकलों के दायरे में हैं इसलिए आधिकारिक घोषणा से पहले किसी भी दावे को अंतिम नहीं माना जा सकता। हालांकि 21 जून को राज्यसभा सांसद का कार्यकाल समाप्त होने पर मोदी सरकार से इस्तीफा देने वाले अल्पसंख्यक मामलों के साथ-साथ मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय में केंद्रीय राज्य मंत्री जॉर्ज कुरियन और हाल ही राजस्थान से राज्यसभा सांसद का कार्यकाल पूरा कर चुके पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री दिवंगत बेअंत सिंह के पोते रवनीत सिंह बिट्टू , जो वर्तमान में मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल में रेल राज्य मंत्री और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग राज्य मंत्री के रूप में कार्यरत है जैसे नेताओं का मोदी मंत्रिपरिषद परिषद के पुनर्गठन से बाहर होना तय माना जा रहा है। बताया जाता है कि भाजपा रवनीत सिंह बिट्टू जैसे युवा नेता का उपयोग पंजाब में होने वाले विधानसभा चुनाव में करना चाहती है। इसी प्रकार मोदी सरकार के कुछ मंत्रियों पंकज चौधरी को उत्तर प्रदेश और केंद्रीय मंत्री हर्ष मल्होत्रा को दिल्ली भाजपा का नया प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। ऐसे में भाजपा के एक व्यक्ति- एक पद के सिद्धान्त के आधार पर उन्हें मंत्रिपरिषद में बनाए रखा जाएगा अथवा नहीं ? यह देखने वाली बात होगी।

कुल मिला कर कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनके चाणक्य माने जाने केन्द्रीय गृह और सहकारिता मंत्री अमित शाह की कार्य शैली को जानने वाले लोगों के अनुसार फिलहाल मंत्रिपरिषद के पुनर्गठन को लेकर केवल राजनीतिक अटकलें और संभावनाएं ही मीडिया के माध्यम से सामने आ रही हैं, अंतिम निर्णय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व तथा आरएसएस के मार्गदर्शक मण्डल के स्तर पर ही होने वाला है और जब भी यह फैसला होगा, उसके पीछे केवल राजनीतिक समीकरण ही नहीं, बल्कि भाजपा की चुनावी रणनीति, सामाजिक प्रतिनिधित्व की सौच और गठबंधन की मजबूती और गुड गवर्नेंस जैसे अनेक कारक प्रभावी होंगे। इसलिए मोदी सरकार के संभावित पुनर्गठन को केवल मंत्रियों के बदलाव के रूप में नहीं, बल्कि भाजपा की आगामी राजनीतिक और विकासात्मक रणनीति के संकेत के रूप में भी देखा जाना चाहिए।