प्रयाग पाण्डे
आज से करीब साढ़े सात दशक पूर्व जब पर्यावरण अपघटन, ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण बात-बहस और चिंता का विषय नहीं थे। तब भारत वनों और वन संपदा के मामले में आज के बनिस्बत बहुत समृद्ध था। देश को गुलामी की जंजीरों से मुक्त हुए तीन वर्ष का वक्त भी नहीं बीता था। उस समय भारत के तत्कालीन नेतृत्व के सामने पर्यावरण के बजाय देश की दूसरी अनेक ज्वलंत समस्याएं चुनौती बनी हुई थीं। उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों में देश की तात्कालिक समस्याओं के मुकाबले पेड़ और पर्यावरण के मुद्दे गौण थे। बावजूद इसके हमारे दूरदर्शी राजनेता पर्यावरण को लेकर बेहद संवेदनशील थे। उन्हें भविष्य में पेश आने वाली पर्यावरणीय समस्याओं का भान था। उन्हीं में से एक राष्ट्रवादी नेता थे- कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी। श्री मुंशी की दीर्घकालिक सोच, पर्यावरण के प्रति भारतीय संस्कृति की समझ, संवेदनशीलता और पहल का ही सुफल है- ‘वन महोत्सव।’
कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी अग्रणीय पंक्ति के स्वाधीनता संग्राम सेनानी, प्रख्यात साहित्यकार, शिक्षाविद और श्रेष्ठ राजनेता थे। वे संविधान सभा के सदस्य थे। डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की अध्यक्षता में बनी संविधान सभा की प्रारूप समिति के महत्वपूर्ण सदस्य भी रहे थे। 13 मई,1950 को कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी भारत के तीसरे कृषि मंत्री बने। उन्होंने वन और पर्यावरण के संरक्षण एवं संवर्धन के प्रति जन-जागरूकता पैदा करने की मंशा से वृक्षारोपण अभियान चलाने का मन बनाया। भारत सरकार के कृषि एवं खाद्य मंत्री के रूप में कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी के कार्यकाल के दौरान 1950 में पर्यावरण संरक्षण के लिए वृक्षारोपण का राष्ट्रव्यापी अभियान प्रारंभ करने का निर्णय लिया गया था। जिसको नाम दिया गया-‘वन महोत्सव।’ एक जुलाई, 1950 को दिल्ली के राजघाट से वन महोत्सव का शुभारंभ हुआ।
आधुनिक भारत में प्रकृति और पर्यावरण के संरक्षण के लिए वन महोत्सव जैसे राष्ट्रव्यापी अभियान का शुभारंभ प्रथमदृष्टया अभिनव प्रयोग प्रतीत होता है । वस्तुतः यह विचार पेड़, पर्यावरण और प्रकृति के संरक्षण एवं संवर्धन को लेकर भारत की प्राचीन संस्कृति और अवधारणा से प्रेरित था। भारत की प्राचीन संस्कृति में वृक्ष रोपण की परंपरा बहुत पुरानी है। हमारे वेदों, पुराणों, उपनिषदों और अन्य धर्म ग्रंथों में पौधों, वृक्षों और वन्यप्राणियों के महत्व का विस्तारपूर्वक वर्णन मिलता है। वराह पुराण में स्वर्ग प्राप्ति के लिए नियमित वृक्षारोपण की सलाह दी गई है। मत्स्य पुराण और पद्मपुराण में भी वृक्ष महोत्सव का वर्णन हुआ है। मत्स्य पुराण में एक वृक्ष रोपण को दस पुत्रों के समान बताया गया है। प्रकृति को देव तुल्य माना गया है। प्रकृति की विभिन्न संरचनाओं में देवी – देवताओं की संकल्पना की गई है।
2 जून, 1952 को कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी अविभाजित उत्तर प्रदेश के राज्यपाल बने। 1953 में नैनीताल प्रवास के दौरान उन्होंने ही नैनीताल के राजभवन में वन महोत्सव की शुरूआत की थी। वन महोत्सव का शुभारंभ करते हुए श्री मुंशी ने राजभवन परिसर, नैनीताल में बांज का पौधा लगाया था। कालांतर में श्री मुंशी द्वारा रोपा गया पौधा राजभवन परिसर में मौजूद अनगिनत दरख्तों का हिस्सा बन गया। हर साल वन महोत्सव मनाने की परंपरा का निर्वहन होता रहा, लेकिन किसी ने भी वन महोत्सव के प्रणेता द्वारा लगाए गए बांज के पौधे की सुध लेने की आवश्यकता नहीं समझी।
पृथक उत्तराखंड राज्य बनने के करीब पंद्रह वर्ष बाद 2015 में डॉक्टर कृष्ण कांत पॉल उत्तराखंड के राज्यपाल बने। चूंकि डॉक्टर पॉल पर्यावरण के प्रति बेहद संवेदनशील और प्रकृति प्रेमी हैं। जब डॉक्टर पॉल नैनीताल प्रवास में आए तो उन्होंने श्री मुंशी द्वारा राजभवन परिसर में लगाए गए बांज के वृक्ष को खोजने में गहरी दिलचस्पी दिखाई। लोक निर्माण विभाग एवं वन विभाग के अफसरों को इस पेड़ को खोजने के आदेश दिए। लंबी -चौड़ी कसरत के बाद अंततः श्री मुंशी द्वारा लगाए गए बांज के पेड़ की शिनाख्त कर ली गई। तत्कालीन राज्यपाल डॉक्टर पॉल के आदेश पर इस वृक्ष में विधिवत सूचना पट्टिका लगा दी गई थी। श्री मुंशी द्वारा करीब तिहत्तर साल पहले नैनीताल के राजभवन परिसर में लगाया गया बांज का वह नन्हा पौधा अब दरख़्त बन गया है और हमारे तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्व की पर्यावरण संरक्षण के प्रति अटूट प्रतिबद्धता और दूरदर्शिता की कहानी बयां कर रहा है।
आज जबकि संपूर्ण विश्व पर्यावरण अपघटन से उपजी अनेक समस्याओं से जूझ रहा है। लगातार हो रहे वन विनाश से पर्यावरण में असंतुलन पैदा हो गया है। अनियंत्रित एवं असंयोजित विकास, नगरीकरण और बढ़ती आबादी के कारण नित बढ़ते ध्वनि, वायु, मृदा, जल एवं स्थल प्रदूषण से पर्यावरणीय संकट बढ़ा है। पृथ्वी के सभी जीवधारी ग्लोबल वॉर्मिंग से उत्पन्न समस्याओं से जूझ रहे हैं। वनोन्मूलन के कुप्रभावों से बचने और पर्यावरण संरक्षण एवं संवर्धन के लिए सघन वृक्षारोपण की वकालत की जा रही है, लेकिन जंगलात महकमे ने पर्यावरण संरक्षण के इस महत्वपूर्ण अभियान को महज रस्म अदायगी बना दिया है। पिछले करीब साढ़े सात दशक से वन महोत्सव के दौरान लाखों हेक्टेयर भूमि में पौधे रोपे जाने के दावे किए जाते रहे हैं। वृक्षारोपण के नाम पर सरकारी खजाने से बेहिसाब धन खर्चा जाता रहा है, लेकिन वृक्षारोपण अभियान की जमीनी कामयाबी और उपलब्धियों की पड़ताल करने की जहमत नहीं उठाई जाती है।
हर साल बरसात में जुलाई के महीने वन महोत्सव मनाया जाता है। पौधारोपण होता है। जंगलात विभाग की फाइलों में झक हरियाली छा जाती है। गर्मी के मौसम में अक्सर जंगलों में आग लग जाया करती है। वृक्षारोपण की जमीनी असलियत दावाग्नि की लपटों की ओट में छिप जाती है। नतीजतन जिन स्थानों में पिछले वर्षों वन महोत्सव मनाया गया, उनमें से अधिकतर जगहें वृक्ष विहीन ही नज़र आती हैं। प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण के लिए वन महोत्सव जैसे व्यापक जन सहभागिता वाले कार्यक्रम का शुभारंभ करने वाले राजनेताओं का नज़रिया भले ही दूरगामी रहा हो, लेकिन अब वन महोत्सव अन्य सरकारी कार्यक्रमों जैसा ही उपक्रम बन कर रह गया है। पर्यावरण अपघटन से उपजी समस्याओं से निपटने के लिए वन महोत्सव जैसे राष्ट्रव्यापी अभियानों की अब तक की उपलब्धियों और विफलताओं का तटस्थ आकलन किया जाना आवश्यक है। अन्यथा वन महोत्सव भी मात्र औपचारिकता बन कर रह जाएगा।
(लेखक उत्तराखण्ड के नैनीताल निवासी वरिष्ठ स्तंभकार हैं।)





