संसद में गुमराही वक्तव्य – विशेषाधिकार का उल्लंघन

Misleading Statement in Parliament – ​​Breach of Privilege

देवेन्द्र सिंह असवाल

राष्ट्रीय समर स्मारक में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के शहीद छह बहादुर सैनिकों के नाम शिलालेख होने पर एक नया विवाद उत्पन्न हो गया है। कारण है रक्षा मंत्री का 28 जुलाई, 2025 को संसद में दिया गया वक्तव्य, जिसमें उन्होंने सदन को आश्वस्त किया कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में हमारे सैनिकों को कोई क्षति नहीं हुई। कांग्रेस ने माननीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के खिलाफ विशेषाधिकार हनन की कार्यवाही की मांग की है और आरोप लगाया है कि रक्षा मंत्री ने संसद को गुमराह किया है। लोकसभा अध्यक्ष रक्षा मंत्री से सफाई मांग सकते हैं या मामले को जांच और रिपोर्ट के लिए विशेषाधिकार समिति को भेज सकते हैं। आरोप सही है या नहीं, इसका पता उचित प्रक्रिया के तहत जांच के बाद संसद में उजागर होगा।

विवेचना का प्रश्न यह है कि अगर कोई मंत्री जानबूझकर संसद को गुमराह करता है या अर्धसत्य बोलता है, तो उसके क्या नतीजे होंगे। संसद में मंत्रियों द्वारा दिए गए बयान या जवाब सत्य माने जाते हैं, जब तक कि कोई सदस्य तथ्यों को चुनौती न दे, या मंत्री स्वयं ही अपनी त्रुटि बताए और अध्यक्ष की अनुमति से उसमें सुधार करे। सही, तथ्यात्मक और दी गई जानकारी के आधार पर ही राष्ट्र की व्यवस्थापिका समुचित चर्चा कर सकती है, सुचिंतित निर्णय ले सकती है या उपयुक्त विधान पारित कर सकती है। सही और पूर्ण जानकारी के आधार पर ही संसद कुशलतापूर्वक और प्रभावी ढंग से काम कर सकती है। हमारे संसदीय लोकतांत्रिक ढांचे में, जिसे हमने अपनाया है, मंत्रिपरिषद संसद के प्रति जवाबदेह है। अतः संसद को दी जाने वाली जानकारी हमेशा सही, पूरी और समय पर मिलनी चाहिए; इसके बिना जवाबदेही का सिद्धांत महज एक कोरी कल्पना मात्र रह जाएगा। संसद के प्रति कार्यपालिका की जवाबदेही हमारे संसदीय लोकतंत्र की धुरी है और इसलिए मंत्रियों का यह कर्तव्य है कि वे संसद और उसकी समितियों को सही, पूरी और समय पर जानकारी दें।

मंत्रियों, सदस्यों तथा संसदीय समितियों के सामने गवाही देने वाले गवाहों से सच और पूरा सच बोलने की अपेक्षा की जाती है। समितियों द्वारा तो गवाहों को हमेशा यह स्मरण करवाया जाता है कि उनकी गवाही सच होगी, वे कुछ भी छिपाएंगे नहीं और उनकी गवाही का कोई भी हिस्सा गलत नहीं होगा। सच छिपाना, घुमा-फिराकर जवाब देना या संसद अथवा उसकी समितियों को गुमराह करने की कोशिश करना विशेषाधिकार का उल्लंघन माना जाता है और इसके लिए संसद सजा देने में सक्षम है। इसलिए मंत्रियों पर और भी बड़ी जिम्मेदारी है, क्योंकि वे संविधान के प्रति सच्ची निष्ठा तथा अपने कर्तव्यों का ईमानदारी और निष्ठा से पालन करने की शपथ से प्रतिबद्ध हैं।

संसद में दिए गए असत्य, अर्धसत्य या गुमराह करने वाले वक्तव्य अथवा सूचना संसदीय लोकतंत्र को कमजोर करते हैं। तथ्यात्मक गलती या चूक अनजाने में हो सकती है। संसद की कार्यप्रणाली के नियमों और निर्देशों में यह प्रावधान है कि यदि किसी मंत्री द्वारा दिए गए जवाब या बयान में कोई गलती या चूक हो, तो जैसे ही उसका पता चले, उसे स्पीकर की अनुमति से यथाशीघ्र सुधारा जाना चाहिए।

मंत्रियों द्वारा बयान सुधारने के कई उदाहरण हैं, खासकर सवालों के जवाबों के मामलों में। लेकिन जानबूझकर गुमराह करने वाला बयान देना या संसद से जानकारी छिपाना निंदनीय है और विशेषाधिकार का उल्लंघन भी। असत्य या जानबूझकर गुमराह करने वाला बयान देना पूरी तरह से अनैतिक है, सुस्थापित संसदीय परंपराओं के खिलाफ है और दंडनीय भी। कोई भी सांसद ‘सत्यमेव जयते’ और ‘यतो धर्मस्ततो जयः’ के उदात्त आदर्शों से अनजान या बेपरवाह नहीं हो सकता, जो भारत की महान सभ्यता-विरासत की नींव हैं। प्राचीन भारतीय ग्रंथों में सत्य और धर्म पर बहुत जोर दिया गया है। पुराने संसद भवन में महाभारत और मनुस्मृति से लिए गए श्लोक उद्धृत हैं, जो याद दिलाते हैं कि सदन में सदस्यों को धर्माचरण के साथ बोलना चाहिए, धर्म सत्य पर आधारित होना चाहिए और सत्य, सत्य नहीं है यदि वह धोखे की ओर ले जाता है। यह भी निर्देश है कि किसी सभासद को या तो सभा कक्ष में प्रवेश नहीं करना चाहिए, या वहां पूरी ईमानदारी और धर्म के साथ बोलना चाहिए, क्योंकि जो नहीं बोलता या जो झूठ बोलता है, वह समान रूप से पाप में शामिल है।

प्राचीन ग्रीस और रोम के गणराज्यों में भी सत्य को कानून के शासन, न्याय और जनता के भरोसे की आधारशिला माना जाता था। सही जानकारी के आधार पर फैसले लेने के लिए सत्यनिष्ठ वक्तव्यों को बुनियादी आवश्यकता माना जाता था। शेक्सपियर के बहुचर्चित नाटक जूलियस सीज़र में, जब जूलियस सीज़र की पत्नी सीनेट में न जाने की विनती करती है, क्योंकि उसे उनकी सुरक्षा की चिंता होती है, तो वह सुझाव देती है कि सीनेट को संदेश भेजा जाए कि ‘वह बीमार हैं।’ तब सीज़र पूछते हैं और हैरान होते हैं, ‘क्या सीज़र सीनेट को झूठ भेजेगा?’ झूठ भेजने के बजाय, वह सीनेट जाना बेहतर समझता है।

भारत में आज तक किसी भी मंत्री ने संसद को गुमराह करने या संसद में झूठ बोलने के आधार पर इस्तीफा नहीं दिया है, हालांकि कई मंत्रियों ने भ्रष्टाचार के आरोप लगने पर इस्तीफा दिया है। दूसरी ओर, ब्रिटेन में कई उदाहरण हैं, जहां मंत्रियों ने संसद को गुमराह करने के कारण इस्तीफा दिया। वर्ष 2023 में बोरिस जॉनसन ने यह जानने के बाद कि उन पर प्रतिबंध लग सकते हैं, सांसद पद से इस्तीफा दे दिया। इससे पहले, 2022 में भारी जन-दबाव के कारण उन्होंने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दिया था। हाउस ऑफ कॉमन्स (ब्रिटेन की प्रतिनिधि सभा) की विशेषाधिकार समिति ने पाया था कि उन्होंने ‘पार्टीगेट’ से जुड़े बयानों को लेकर जानबूझकर संसद को गुमराह किया था। 2018 में गृह मंत्री ने यह मानते हुए इस्तीफा दे दिया कि उन्होंने अनजाने में अप्रवासियों को हटाने के लक्ष्यों को लेकर सदन को गुमराह किया था। एक और ऐतिहासिक उदाहरण जॉन प्रोफुमो का है, जो युद्ध मामलों के मंत्री थे और जिन्होंने 1963 में सरकार तथा संसद से इस्तीफा दे दिया था, क्योंकि उन्होंने हाउस ऑफ कॉमन्स को गुमराह किया था। ये इस्तीफे जन-दबाव, पार्टी के भीतर के दबाव और मीडिया के हंगामे के कारण हुए थे। ब्रिटेन में यह एक सुस्थापित संसदीय परंपरा बन गई है कि यदि कोई मंत्री जानबूझकर संसद को गुमराह करता है, तो उसे अपना मंत्रालय और संसद की सदस्यता, दोनों गंवानी पड़ेंगी।

विशेषाधिकार हनन के नोटिस का भविष्य लोकसभा रक्षा मंत्रालय को सुनने के पश्चात तय करेगी। मामला गंभीर है, क्योंकि माननीय रक्षा मंत्री कई दशकों से राष्ट्रीय राजनीति के शीर्षस्थ नेताओं में हैं। वे वरिष्ठतम एवं अनुभवी मंत्री हैं, जिनकी सार्वजनिक छवि है और जो संसदीय तथा संवैधानिक परंपराओं से अच्छी तरह वाकिफ हैं। ऐसी स्थिति में संसद को गुमराह करने के आरोप की अविलंब जांच विशेषाधिकार समिति से कराया जाना आवश्यक है, ताकि वस्तुस्थिति स्पष्ट हो।

लेखक लोकसभा के पूर्व अतिरिक्त सचिव और सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के सदस्य हैं। व्यक्त किए गए विचार निजी हैं।