बाढ़ से आज़ादी कब? आज़ादी के 79वें साल में भी देश की 60% बाढ़ का बोझ ढोते बिहार, असम और यूपी

When will there be freedom from floods? Even in the 79th year of independence, Bihar, Assam, and UP bear the burden of 60% of the country's floods

दिलीप कुमार पाठक

मानसून आते ही देश के बड़े हिस्से में खुशियों की फुहारें बरसती हैं, मोर नाचते हैं और किसान मल्हार गाते हैं। ठीक इसी समय पूरा देश अगस्त के महीने में आज़ादी का जश्न मनाने की तैयारियों में डूब जाता है। तिरंगे लहराए जाते हैं और लालकिले की प्राचीर से विकास के बड़े-बड़े दावे गूंजते हैं। लेकिन भारत के तीन राज्यों – बिहार, असम और उत्तर प्रदेश के करोड़ों लोगों के लिए आसमान से बरसने वाली यह पहली बूंद और आज़ादी का यह महीना किसी उत्सव की शुरुआत नहीं, बल्कि उनकी सामूहिक आपदा लेकर आता है। नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर की रिपोर्ट चीख-चीख कर कहती है कि देश के कुल बाढ़ प्रभावित क्षेत्र का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा अकेले ये तीन राज्य मिलकर सहते हैं। साल 2026 आ चुका है, दिल्ली के वातानुकूलित और आलीशान दफ्तरों में बैठकर चांद-मंगल पर बस्तियां बसाने और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के नारे गढ़े जा रहे हैं। लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि इन तीन राज्यों की आधी आबादी को हर साल जीते-जी जल-समाधि लेने के लिए छोड़ दिया जाता है। जिस देश को आज़ाद हुए करीब आठ दशक होने वाले हैं, वहाँ के नागरिकों को आज तक इस सालाना तबाही से आज़ादी नहीं मिल सकी। यह कोई प्राकृतिक आपदा नहीं है, यह हर साल होने वाला एक प्रशासनिक कत्लेआम है, जिसमें सरकारें फाइलें पलटती रह जाती हैं और लोग अपनी पूरी जिंदगी की गाढ़ी कमाई को मटमैले पानी में बहते हुए देखने को मजबूर होते हैं। चुनाव आते ही नेता चमचमाते हेलीकॉप्टरों से हवा में ‘बाढ़ पर्यटन’ करने आते हैं, हाथ हिलाते हैं और हवाई वादे करके उड़ जाते हैं। उनके सफेद कुर्ते पर कभी कीचड़ का एक छोटा सा दाग तक नहीं लगता, जबकि नीचे पानी में डूबा हुआ लाचार नागरिक अपनी छाती तक गहरे गंदे पानी में खड़ा होकर अपनी डूबी हुई किस्मत और मरे हुए मवेशियों को रो रहा होता है। यह सरकारों की वह क्रूर नाकामी है जो हर साल आज़ादी के जश्न के बीच इन तीन राज्यों को एक गहरा और कभी न भरने वाला जख्म दे जाती है।

त्रासदी के बेरहम आंकड़े:
हर साल जब मानसून विदा होता है, तो गृह मंत्रालय और राज्य आपदा प्रबंधन विभाग अपनी फाइलों में कुछ बेजान आंकड़े दर्ज करके सो जाते हैं। लेकिन क्या उन आंकड़ों में उस अभागी मां की चीख शामिल होती है जिसके कलेजे का टुकड़ा उफनती नदी की तेज धार में हमेशा के लिए बह गया? क्या उसमें उस बूढ़े और लाचार बाप का दर्द होता है जिसकी पूरी जिंदगी की गाढ़ी कमाई एक ही रात में मिट्टी में मिल गई? साल 2026 के ताजा और पिछले कुछ वर्षों के खौफनाक आंकड़ों को देखा जाए तो, पता चलता है कि जो हमारे निकम्मे और बहरे सिस्टम के मुंह पर एक तमाचा हैं। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण और इसरो के आंकड़े बताते हैं कि अकेले बिहार, असम और उत्तर प्रदेश में हर साल औसतन ढाई करोड़ से तीन करोड़ लोग बाढ़ की विभीषिका में तड़पते हैं। कई सालों में यह आंकड़ा चार करोड़ को पार कर जाता है। यानी देश का एक बड़ा वर्ग हर साल बिना छत के पानी में तैर रहा होता है।

सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक, इन तीनों राज्यों में हर साल प्रत्यक्ष रूप से पंद्रह सौ से पच्चीस सौ लोग बाढ़ और उससे पैदा होने वाली महामारियों के कारण तड़प-तड़प कर अपनी जान गंवा देते हैं। लेकिन यह आधा सच है, जो सरकारें अपनी पीठ थपथपाने के लिए बताती हैं। पानी उतरने के बाद फैलने वाली महामारियों जैसे हैजा, डायरिया, सांप के काटने और भुखमरी से मरने वालों की असली संख्या को जोड़ दिया जाए, तो यह आंकड़ा सालाना पांच हजार के पार चला जाता है। अकेले मौजूदा वर्ष 2026 के शुरुआती मानसूनी थपेड़ों में अब तक तीन सौ से अधिक बेगुनाह मौतें दर्ज हो चुकी हैं। इंसान तो जैसे-तैसे ऊंचे स्थानों पर चढ़ जाता है, लेकिन उन बेजुबान मवेशियों का क्या कसूर? हर साल इन तीन राज्यों में पचास हजार से अधिक गाय, भैंस और बकरियां पानी में बहकर या चारे के अभाव में दम तोड़ देती हैं। हर साल इन तीन राज्यों में लगभग अस्सी से नब्बे लाख हेक्टेयर खड़ी फसल पूरी तरह बर्बाद हो जाती है। बुनियादी ढांचे जैसे सड़क, पुल, स्कूल, अस्पताल को होने वाला नुकसान सालाना बीस हजार करोड़ रुपये से अधिक का होता है। यह वह पैसा है जो सीधे गरीब और मध्यम वर्ग की जेब से टैक्स के रूप में जाता है और नेताओं-ठेकेदारों की तिजोरियों में भ्रष्टाचार के रूप में समा जाता है।

कोसी का इलाका: बिहार का शोक नहीं, आसुओं की दास्ताँ

जब हम बिहार की बाढ़ की बात करते हैं, तो ‘कोसी’ शब्द आते ही रूह कांप जाती है। उत्तरी बिहार के सहरसा, सुपौल, मधेपुरा, अररिया, पूर्णिया और कटिहार जैसे जिलों के लिए कोसी नदी कोई जलधारा नहीं है, यह एक ऐसा खौफनाक साया है जो हर रात इन लोगों की नींद और चैन छीन लेता है। इसे बिहार का शोक कहा जाता है, लेकिन हकीकत में यह राजनीतिक नपुंसकता और प्रशासनिक अकर्मण्यता का सबसे बड़ा जीता-जागता स्मारक है। कोसी नदी नेपाल की ऊंची पहाड़ियों से भारी मात्रा में गाद यानी मिट्टी और बोल्डर लेकर आती है। जब यह बिहार के मैदानी इलाकों में प्रवेश करती है, तो इसकी रफ्तार धीमी हो जाती है और वह मिट्टी नदी के तल में जमा होने लगती है। नतीजा यह होता है कि नदी का तल हर साल ऊंचा हो जाता है और पानी किनारों को तोड़कर बस्तियों में घुस जाता है। कोसी ने पिछले ढाई सौ वर्षों में अपना रास्ता पूरब से पश्चिम की तरफ लगभग एक सौ बीस किलोमीटर बदला है। इसका हर एक बदलाव हजारों हंसते-खेलते गांवों को श्मशान बना देता है।

कोसी के वो बदनसीब गांव : जहाँ जिंदगी हर रोज घुट-घुट कर मरती है।

कोसी के असली दर्द को कागजी बहसों और टीवी स्टूडियो से बाहर निकलकर उन गांवों की सड़ी हुई मिट्टी और बदबूदार पानी में महसूस करना होगा, जहाँ का बच्चा चलना बाद में सीखता है, अपनी जान बचाकर उफनते पानी में तैरना पहले सीखता है। सुपौल जिले का भपटियाही, निर्मली और मरौना प्रखंड हो या सहरसा का नवहट्टा और महिषी, मधेपुरा का आलमनगर और चौसा, या फिर खगड़िया का अलौली, ये महज नक्शे पर खिंचे बेजान नाम नहीं हैं। ये वो इलाके हैं जहाँ सालों से इंसानों और लहरों के बीच एक अंतहीन और एकतरफा जंग चल रही है।

सुपौल का कुसहा याद है न? साल 2008 में जब वहाँ का सरकारी तटबंध टूटा था, तो कोसी ने अपना रास्ता बदल लिया था। रातों-रात लाखों लोग बेघर हो गए थे और हजारों जिंदगियां पानी में लाश बनकर तैरने लगी थीं। आज साल 2026 चल रहा है, लेकिन कुसहा, बकुआ, कमरेल और घोरघट जैसे गांवों के लोग आज भी उस खौफनाक मंजर को भूल नहीं पाए हैं। हर साल जब जून का महीना आता है, तो इन गांवों के बुजुर्ग रात-रात भर हाथ में लाठी और टॉर्च लेकर तटबंधों पर पहरा देते हैं। उन्हें डर होता है कि कहीं कोई ठेकेदार अपने फायदे के लिए उनके बांध को नुकसान न पहुंचा दे और सुबह होने से पहले उनका पूरा हंसता-खेलते परिवार पानी की जिंदा समाधि न ले ले।

सहरसा जिले का नवहट्टा प्रखंड और महिषी का जलई इलाका हर साल भीषण कटान का दंश झेलता है। यहाँ के ऐना, शाहपुर, बकुआ और तारियामा जैसे गांवों की स्थिति यह है कि साल के छह महीने ये दुनिया से पूरी तरह कट जाते हैं। इन गांवों में सड़क नाम की कोई चीज नहीं बचती। अगर किसी गर्भवती महिला या बीमार बुजुर्ग को इलाज के लिए अस्पताल ले जाना हो, तो उफनती कोसी की लहरों पर छोटी सी डोंगिया नाव लेकर अपनी जान हथेली पर रखकर निकलना पड़ता है। कई बार मरीज अस्पताल पहुँचने से पहले नाव पर ही दम तोड़ देता है। यहाँ का संघर्ष देखना है तो महिषी के कुन्दह या घोंघेपुर गांव चले जाइए। यहाँ लोग अपने घरों के भीतर चार-चार फीट ऊंचे बांस के मचान बनाकर रहते हैं। नीचे जहरीले सांपों से भरा गंदा पानी बह रहा होता है और ऊपर एक छोटी सी लकड़ी की चौकी पर पूरा परिवार, जिसमें बूढ़े, बच्चे और महिलाएं शामिल हैं, पशुओं की तरह सिमटकर बैठ जाता है। चूल्हा जलाने के लिए सूखी लकड़ी तक नसीब नहीं होती। भूखे पेट बच्चे जब रात भर रोते हैं, तो मजबूर मां के पास उन्हें पिलाने के लिए सिर्फ कोसी का वही मटमैला पानी होता है, जिसे पीकर वे अगले दिन बीमार पड़ जाते हैं।

मधेपुरा के आलमनगर प्रखंड के खापुर और किशनपुर गांव या खगड़िया के अलौली के गांव हर साल कोसी और बागमती के मिलन बिंदु पर पूरी तरह तबाह हो जाते हैं। यहाँ नदी हर साल उपजाऊ खेतों को निगल जाती है। पिछले साल जहाँ हरी-भरी फसल लहलहा रही थी, इस साल वहाँ कोसी की मुख्य धारा दहाड़ मार रही है। किसान अपनी ही जमीन को अपनी आंखों के सामने पानी में डूबते देखने के लिए मजबूर है। उसका मालिकाना हक तो सरकारी कागजों पर रहता है, लेकिन जमीन नदी में समा जाती है। वह रातों-रात जमींदार से बिना ज़मीन का हो जाता है।

कोसी इलाके का दर्द समझना है, तो ज़रा आंखें बंद करके कल्पना कीजिए। रात के दो बजे हैं। चारों तरफ घनघोर अंधेरा है और मूसलाधार बारिश हो रही है। अचानक दूर से एक भयानक आवाज आती है – ‘बांध टूट गया, भागो!’ यह आवाज किसी के लिए भी साक्षात यमराज के आने की आहट जैसी होती है। लोग अपने सोते हुए बच्चों को छाती से छिपाते हैं, अंधे बूढ़े मां-बाप को कंधे पर उठाते हैं और बिना यह सोचे कि किधर जाना है, बस नंगे पैर भागने लगते हैं। पीछे मुड़कर देखने की फुर्सत नहीं होती, क्योंकि चंद मिनटों में पाँच से दस फीट गहरा और तेज मटमैला पानी उनके पक्के मकानों को ताश के पत्तों की तरह ढहा देता है। पानी आने के बाद कोसी का पूरा इलाका एक अनंत और डरावने समंदर जैसा दिखने लगता है। जहाँ कभी बस्तियां थीं, वहाँ सिर्फ पानी और उस पानी के ऊपर तैरती मवेशियों की लाशें, चूल्हे और बच्चों के खिलौने दिखाई देते हैं। लोग हफ्तों तक राष्ट्रीय राजमार्गों या ऊंचे रेलवे ट्रैक पर फटे हुए तिरपाल तानकर कीड़ों-मकोड़ों की तरह रहने को मजबूर होते हैं। वहाँ न पीने का साफ पानी होता है, न शौच की जगह। सबसे बदतर स्थिति महिलाओं और बच्चियों की होती है। उन्हें खुले आसमान के नीचे, हजारों अजनबियों के बीच अपनी मर्यादा को संभालते हुए दिन काटने पड़ते हैं। गर्भवती महिलाओं को प्रसव के लिए कोई अस्पताल नहीं मिलता। कई लाचार माताएं बाढ़ के गंदे पानी के बीच, किसी डगमगाती नाव पर या सड़क किनारे बच्चे को जन्म देती हैं, और कई बार सही इलाज न मिलने पर जच्चा-बच्चा दोनों वहीं दम तोड़ देते हैं। यह देखना रूह को अंदर तक झकझोर देता है जब कोई बेबस पिता अपने नवजात बच्चे के शव को नदी के गंदे पानी में बहाने को मजबूर होता है क्योंकि उसे दफनाने के लिए पूरे जिले में दो गज सूखी जमीन तक मयस्सर नहीं होती।

असम की ब्रह्मपुत्र: हर साल डूबती संस्कृति और काजीरंगा की चीखें

बिहार से दूर, पूर्वोत्तर में असम का दर्द भी किसी को भी रुला देता है। असम में ब्रह्मपुत्र और बराक नदियां हर साल तबाही का ऐसा तांडव रचती हैं कि राज्य का पूरा भूगोल ही बदल जाता है। असम की बाढ़ की सबसे बड़ी क्रूरता यह है कि यहाँ बाढ़ एक बार आकर नहीं जाती, बल्कि जून से सितंबर के बीच चार से पांच लहरों में आती है। एक लहर से लोग संभल भी नहीं पाते, अपने घर की कीचड़ साफ भी नहीं कर पाते कि दूसरी लहर सब कुछ दोबारा उजाड़ देती है। दुनिया का सबसे बड़ा नदी द्वीप ‘माजुली’, जो असम की सांस्कृतिक और धार्मिक आत्मा है, ब्रह्मपुत्र के कटाव के कारण हर साल धीरे धीरे छोटा होता जा रहा है। यहाँ के लोग हर साल अपने घरों को पीछे खिसकाते हैं, क्योंकि नदी उनकी पुरखों की जमीन को निगलती जा रही है। अपनी ही धरती पर बार-बार शरणार्थी बन जाने का दर्द क्या होता है, यह माजुली और धुबरी के लोगों के आंसुओं से समझा जा सकता है। असम की बाढ़ सिर्फ इंसानों को नहीं उजाड़ती, बल्कि हमारी बेजुबान प्राकृतिक धरोहर को भी खत्म कर रही है। जब ब्रह्मपुत्र का पानी काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में घुसता है, तो पूरी दुनिया में मशहूर एक सींग वाले गैंडे, मासूम हिरण, विशालकाय हाथी और बाघ ऊंचे स्थानों यानी कारबी आंगलोंग की पहाड़ियों की तरफ भागने की कोशिश करते हैं। इस दर्दनाक कोशिश में सैकड़ों जानवर उफनती नदी में डूबकर मर जाते हैं, और जो बचकर हाईवे पर आते हैं, वे तेज रफ्तार गाड़ियों का शिकार हो जाते हैं। इन बेजुबान जानवरों की आंखों में दिखने वाला मौत का खौफ किसी भी पत्थर दिल इंसान को रुला सकता है।

उत्तर प्रदेश के मैदानी इलाके: विकास के खोखले दावों को बहा ले जाती नदियां

उत्तर प्रदेश का पूर्वांचल इलाका जैसे गोरखपुर, देवरिया, बलिया, गाजीपुर, बहराइच, गोंडा और श्रावस्ती हर साल घाघरा, राप्ती, रोहिन और गंगा नदियों के रौद्र रूप का शिकार बनता है। पश्चिमी यूपी में भले ही औद्योगिक विकास की चमक हो, लेकिन पूर्वांचल में आते-आते नदियां विकराल रूप धारण कर लेती हैं और सारा विकास पानी में बह जाता है। यहाँ की बाढ़ उपजाऊ खेतों को महीनों तक बंजर बना देती है। खेतों में पानी जमा रहने के कारण रबी की फसल की बुआई नहीं हो पाती। किसान जो बैंक से या ऊंचे ब्याज पर साहूकार से कर्ज लेकर बीज लेते है, वह कर्ज की किश्तों और परिवार की भूख के बीच पीसकर फांसी के फंदे पर झूलने को मजबूर हो जाता है। मुख्यमंत्री और मंत्री आते हैं, हवाई सर्वे करते हैं, सरकारी खर्चे पर राहत पैकेट बांटने की तस्वीरें खिंचवाते हैं और चले जाते हैं। लेकिन उन तस्वीरों के पीछे छुपा हुआ भूखे किसान का रोता हुआ चेहरा कभी गोदी मीडिया की हेडलाइन नहीं बनता।

विस्थापन, पलायन और भुखमरी का वो दुष्चक्र जो कभी खत्म नहीं होता :

बाढ़ सिर्फ तीन महीने की आफत नहीं है, यह इन राज्यों के लोगों को जीवनभर के लिए गरीबी और कर्ज के दलदल में धकेल देती है। इसके सामाजिक परिणाम बेहद संवेदनशील और डराने वाले हैं।

जबरन पलायन और ‘बाढ़ प्रभावित लोगों के जब खेत बह गए, घर उजड़ गया और खाने को एक दाना न बचा, तो जिंदा रहने के लिए क्या रास्ता बचता है? यही कारण है कि बिहार के कोसी क्षेत्र, असम के गांवों और पूर्वी यूपी से हर साल लाखों की संख्या में युवा और वयस्क दिल्ली, मुंबई, पंजाब और गुजरात की तरफ भागते हैं। वे वहां जाकर फैक्ट्रियों में, कंस्ट्रक्शन साइटों पर गारा-मिट्टी ढोने का काम करते हैं या सड़कों पर रिक्शा चलाकर बेहद अमानवीय स्थितियों में जीते हैं ताकि घर पर रह रही बूढ़ी मां या भूखी पत्नी को दो वक्त की रोटी के लिए कुछ पैसे भेज सकें। इन्हें बड़े-बड़े अर्थशास्त्री ‘आर्थिक प्रवासी’ कहते हैं, लेकिन असल में ये अपने ही देश में ‘बाढ़ शरणार्थी’ हैं जिन्हें उनके अपने राज्य के भ्रष्ट सिस्टम ने अपनी नाकामी के कारण लात मारकर बाहर खदेड़ दिया है।

बीमारियों का नर्क और मासूमों का कुपोषण:

बाढ़ के बाद जब पानी सड़ने लगता है, तो मच्छरों और जानलेवा बैक्टीरिया का साम्राज्य कायम होता है। जापानी इंसेफेलाइटिस यानी चमकी बुखार, डेंगू, मलेरिया और डायरिया जैसी बीमारियां मासूम बच्चों को अपना ग्रास बनाती हैं। दूषित और गंदा पानी पीने की मजबूरी के कारण छोटे-छोटे बच्चे कुपोषण का शिकार होकर कंकाल बन जाते हैं। सरकारी राहत कैंपों में दवाओं के नाम पर सिर्फ एक्सपायरी डेट की गोलियां बांट दी जाती हैं और गरीब अपनी आंखों के सामने अपने बच्चों को दम तोड़ते देखता है।

शिक्षा की हत्या और अंधकारमय भविष्य:

बाढ़ प्रभावित इलाकों में स्कूल महीनों तक या तो राहत शिविर बने रहते हैं या पानी में डूबे रहते हैं। बच्चों की किताबें बह जाती हैं, स्कूल की इमारतें ढह जाती हैं। इसका सीधा असर यह होता है कि इन इलाकों के बच्चे पढ़ाई छोड़ देते हैं और बाल श्रम या बाल विवाह के गंदे जाल में फंस जाते हैं। नेताओं के बच्चे विदेशों और बड़े-बड़े कॉन्वेंट स्कूलों में पढ़ते हैं और गरीब का बच्चा बाढ़ के गंदे पानी में अपनी बही हुई किताबें ढूंढता रह जाता है।

सरकार की क्रूर नाकामी:
अब उस कड़वे और नग्न सच पर आते हैं जिससे देश के नेता और अधिकारी हमेशा नजरें चुराते हैं। बाढ़ को प्रकृति का प्रकोप कहकर सरकारें अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकतीं। यह पूरी तरह से एक प्रशासनिक विफलता, नीतिगत दिवालियापन और शुद्ध रूप से राजनीतिक वोटबैंक की गंदी राजनीति है।

भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा :
हर साल मानसून से ठीक पहले मार्च से मई के बीच जल संसाधन विभाग तटबंधों की मरम्मत और फ्लड फाइटिंग के नाम पर करोड़ों-अरबों रुपये का बजट पास करता है। बोरी में बालू भरकर नदियों के किनारे रखा जाता है। लेकिन पहली ही बारिश में वे बोरियां और वे तटबंध ताश के पत्तों की तरह ढह जाते हैं। जब जांच बैठती है, तो बेशर्मी से अजीबोगरीब बहाने बनाए जाते हैं कि चूहों ने तटबंध में छेद कर दिया था या लोमड़ियों ने मिट्टी खोद दी थी। असलियत यह है कि वह पैसा चूहों ने नहीं, बल्कि इंजीनियरों, ठेकेदारों और राजनेताओं के गठजोड़ ने मिलकर डकारा होता है। बाढ़ इन भ्रष्ट अधिकारियों और नेताओं के लिए कोई आपदा नहीं, बल्कि एक उत्सव है, एक बंपर कमाई का सीजन है। नदी का पानी जितना ऊपर चढ़ता है, नेताओं अधिकारियों की गुप्त तिजोरियां उतनी ही तेजी से भरती हैं।

राहत सामग्री के नाम पर भद्दा मजाक :
बाढ़ आने के बाद जब लोग दाने-दाने को तरसते हैं, तो सरकारी नावें घूमती हैं। राहत के नाम पर क्या मिलता है? दो किलो चूड़ा यानी पोहा, थोड़ा सा कीड़ों वाला गुड़, माचिस की एक डिब्बी और प्लास्टिक की एक फटी हुई शीट। क्या किसी आजाद देश में एक इंसान की जिंदगी की कीमत बस इतनी ही है? राहत शिविरों में भारी अव्यवस्था होती है, वहाँ अनाज की कालाबाजारी होती है। उससे भी शर्मनाक बात यह है कि इन सरकारी राहत पैकेटों पर भी बड़े-बड़े मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों की मुस्कुराती हुई तस्वीरें छपी होती हैं। लोग भूखे मर रहे हैं और सरकारें टैक्स के पैसे से अपनी ब्रांडिंग करने में व्यस्त हैं। यह संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है।

दीर्घकालिक नीतियों का पूरी तरह अभाव और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी :

आजादी के इतने दशकों बाद भी हमारे पास बाढ़ से निपटने का कोई स्थायी ब्लूप्रिंट नहीं है। नदी जोड़ो परियोजना दशकों से सिर्फ चुनावी भाषणों और घोषणापत्रों में बंद है। नेपाल के साथ कूटनीतिक बातचीत हमेशा बेनतीजा रहती है। जब तक नेपाल की पहाड़ियों पर हाई डैम यानी उच्च बांध नहीं बनेगा, तब तक उत्तरी बिहार को कोई नहीं बचा सकता। लेकिन केंद्र सरकारें इस मुद्दे पर नेपाल के साथ ठोस कूटनीतिक दबाव बनाने में हमेशा नाकाम रही हैं क्योंकि इन इलाकों के लोग दिल्ली की सत्ता तय करने वाले बड़े कॉर्पोरेट घराने नहीं, बल्कि सीधे-साधे गरीब किसान हैं जिनकी आवाज दिल्ली के बहरे कानों तक नहीं पहुँचती। ड्रेजिंग यानी नदियों की तलहटी से मिट्टी निकालने की कोई वैज्ञानिक व्यवस्था नहीं है, जिससे नदियों की पानी सोखने की क्षमता पूरी तरह खत्म हो चुकी है।

इन आंखों के आंसुओं को बहने से कब रोकेगा यह देश?

साल 2026 की यह दोपहर भी उन करोड़ों लोगों के लिए भारी है जो इस वक्त असम के किसी ऊंचे टापू पर, बिहार के किसी रेलवे ट्रैक पर या यूपी के किसी बांध पर भूखे पेट बैठे आसमान की तरफ देख रहे हैं। वे भगवान से प्रार्थना कर रहे हैं कि अब और बारिश न हो। उनके पास पहनने को सूखे कपड़े नहीं हैं, बच्चों के दूध के लिए पैसे नहीं हैं, लेकिन नेताओं के पास नए संसद भवनों, विज्ञापनों और चुनावी रैलियों के लिए हजारों करोड़ रुपये पानी की तरह बहाने के लिए मौजूद हैं। यह सोचना बेहद दर्दनाक है कि जिस देश में हम डिजिटल इंडिया, 5G और बुलेट ट्रेन का जश्न मना रहे हैं, उसी देश की एक बहुत बड़ी आबादी सिर्फ एक अदद सूखी जमीन और दो वक्त की रोटी के लिए हर साल भगवान भरोसे छोड़ दी जाती है। यह बाढ़ प्राकृतिक नहीं, राजनैतिक और प्रशासनिक है। यह हमारे लोकतांत्रिक ढांचे की सबसे बड़ी और शर्मनाक हार है। जब तक हम सरकारों से चमचमाती सड़कों और भव्य स्मारकों के साथ-साथ इन नदियों पर पक्के और ईमानदार काम का हिसाब नहीं मांगेंगे, तब तक हर साल मानसून इसी तरह हमारी खुशियों को श्मशान बनाता रहेगा। नदियों का पानी तो कुछ महीनों में उतर जाएगा, लेकिन उन मासूम आंखों के आंसू कभी नहीं सूखते जिन्होंने अपने सामने अपनी पूरी कायनात, अपने बूढ़े माता-पिता या अपने नन्हे बच्चों को पानी में विलीन होते देखा है। अब वक्त आ गया है कि फाइलों को बंद किया जाए और जमीन पर काम शुरू हो, वरना इतिहास इन संवेदनहीन सरकारों और राजनेताओं को कभी माफ नहीं करेगा।