चंदा चोरी विवाद ने कैसे बदली यूपी की सियासत

How the donation theft controversy changed UP politics

संजय सक्सेना

अयोध्या के राम मंदिर से जुड़ी चंदा चोरी की खबर जब सामने आई, तो किसी को अंदाजा नहीं था कि यह मुद्दा इतनी जल्दी उत्तर प्रदेश की पूरी राजनीति की दिशा बदल देगा। एक तरफ सत्ताधारी बीजेपी और उसकी वैचारिक जननी आरएसएस के लिए यह मामला साख का सवाल बन गया, तो दूसरी तरफ विपक्ष को वर्षों बाद ऐसा मुद्दा हाथ लगा जिसे वह भावनात्मक आस्था और सुशासन, दोनों मोर्चों पर भुना सकता था। यूपी चुनाव 2027 अभी दूर है, लेकिन इस एक घटना ने राजनीतिक हलकों में जो हलचल मचाई है, वह बताती है कि आने वाले महीनों में यह विवाद कितना बड़ा रूप ले सकता है। मामले की शुरुआत मंदिर में दान की गई कीमती वस्तुओं और नकदी की कथित चोरी से हुई। खबर फैलते ही सरकार हरकत में आई। एक विशेष जांच टीम यानी एसआईटी गठित की गई और अब तक आठ लोगों के खिलाफ केस दर्ज हो चुका है। दबाव इतना बढ़ा कि मंदिर प्रबंधन से जुड़े तीन बड़े पदाधिकारी चंपत राय, अनिल मिश्रा और गोपाल राय को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। बीजेपी नेतृत्व इसे प्रशासनिक स्तर पर उठाए गए सख्त और त्वरित कदम के तौर पर पेश कर रहा है, जबकि पार्टी के भीतर भी यह स्वीकार किया जा रहा है कि कहीं न कहीं एक चूक जरूर हुई है। दिल्ली में मौजूद बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि विपक्ष प्रशासनिक मुद्दों पर सरकार को घेर नहीं पा रहा, इसलिए वह जनता की आस्था से जुड़े इस संवेदनशील विषय को हवा दे रहा है।

लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इस विवाद ने बीजेपी को असहज कर दिया है। पार्टी के भीतरी सूत्रों की मानें तो शुरुआती दिनों में मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या और चढ़ावे, दोनों में हल्की गिरावट दर्ज की गई। यही वजह है कि जो बीजेपी और आरएसएस पहले इस मामले से दूरी बनाए हुए थे, अब उन्हें मजबूरन जनता के बीच जाकर भरोसा बहाल करने की रणनीति पर काम करना पड़ रहा है। संघ के स्वयंसेवक अब घर-घर जाकर दानदाताओं से सीधा संपर्क करेंगे, उन्हें रसीदें दिखाएंगे और जांच की पारदर्शिता का भरोसा दिलाएंगे। खास तौर पर बड़ी रकम या कीमती धातु दान करने वाले श्रद्धालुओं को प्राथमिकता से संपर्क किया जाएगा, ताकि उनके मन में मंदिर प्रबंधन को लेकर पैदा हुई आशंका दूर हो सके। संसद का मॉनसून सत्र 20 जुलाई से शुरू हो रहा है और विपक्ष वहां इस मुद्दे को जोरशोर से उठाने की तैयारी में है, जिससे पहले बीजेपी-आरएसएस इस आंच को हर हाल में ठंडा करना चाहते हैं। इसी बीच विश्व हिंदू परिषद भी मैदान में कूद पड़ी है। वीएचपी के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने जांच अधिकारी को पत्र लिखकर कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा, सपा नेता राम गोपाल यादव और आम आदमी पार्टी के नेताओं से पूछताछ की मांग कर डाली। परिषद का कहना है कि अगर आरोप बिना सबूत और दुर्भावना से लगाए गए हैं तो संबंधित नेताओं के खिलाफ कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं आरएसएस के महासचिव दत्तात्रेय होसबोले ने हिंदू समाज से धैर्य बनाए रखने और तथाकथित हिंदू-विरोधी ताकतों की साजिशों को नाकाम करने की अपील की है।

दूसरी ओर विपक्ष इस मौके को छोड़ने के मूड में नहीं दिखता। समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव लगातार बीजेपी पर हमलावर हैं। उन्होंने बयान में कहा कि मंदिर से जुड़े चढ़ावे और दान की चोरी की खबर पूरी दुनिया में फैल चुकी है, जिससे विदेश में बसे सनातनी समाज को शर्मिंदगी झेलनी पड़ रही है। उन्होंने यह भी दावा किया कि इस घटना के बाद वैश्विक निवेशक भी हाथ खींच रहे हैं क्योंकि जब सरकार भगवान के दानपात्र की सुरक्षा नहीं कर पाई, तो निवेश की सुरक्षा पर भरोसा कैसे किया जाए। इससे पहले चढ़ावा चोरी के आरोपित टिन्नू यादव से कथित बातचीत को लेकर भी अखिलेश ने बीजेपी पर तंज कसा और कहा कि पार्टी ने खुद ही ऐसे विवादित व्यक्ति से झूठे आरोप लगवाए, जिसकी अपनी छवि बदनाम रही है। इस सियासी माहौल में अखिलेश यादव की एक मुलाकात ने और हलचल बढ़ा दी। लखनऊ में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से करीब आधे घंटे की मुलाकात में सपा अध्यक्ष ने चंदा चोरी और गौरक्षा जैसे मुद्दों पर सबसे ज्यादा बातचीत की। मुलाकात के बाद अखिलेश ने कहा कि धर्म के नाम पर महापाप हुआ है और एसआईटी जांच के नाम पर सिर्फ मामले की लीपापोती कर रही है। सामने आए वीडियो में शंकराचार्य को यह कहते सुना गया कि मंदिर में महाघोटाला हुआ है और असली कार्रवाई तभी होगी जब प्रदेश में नया मुख्यमंत्री आएगा। गौरतलब है कि अविमुक्तेश्वरानंद पहले भी राम मंदिर उद्घाटन और प्राण प्रतिष्ठा पूजा पर सवाल उठा चुके हैं, और यह चार महीने में अखिलेश की उनसे दूसरी मुलाकात है। इससे पहले मार्च में भी दोनों की भेंट हुई थी, और हाल ही में सपा के अन्य वरिष्ठ नेता भी शंकराचार्य से मिल चुके हैं।

इस बदलते नैरेटिव पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी पलटवार किया है। बांदा में विकास परियोजनाओं के लोकार्पण के दौरान उन्होंने कहा कि जिन्हें राम मंदिर, काशी विश्वनाथ धाम और मां विंध्यवासिनी धाम का सुंदरीकरण पसंद नहीं, वे असल में विरासत का अपमान करते हैं। उन्होंने पुराना कब्रिस्तान बनाम मंदिर विकास वाला बयान दोहराते हुए कहा कि समाजवादी पार्टी के शासन में जो पैसा कब्रिस्तान की बाउंड्री वॉल पर खर्च होता था, वही अब मंदिरों और धामों के विकास में लग रहा है। दिलचस्प यह है कि इसी भाषण में उन्होंने डॉ. राममनोहर लोहिया का जिक्र करते हुए कहा कि लोहिया के कारण ही चित्रकूट में रामायण मेला शुरू हुआ था, जबकि आज के समाजवादी राम से दूरी बना रहे हैं। यह टिप्पणी सीधे तौर पर उस ऐतिहासिक विरासत की याद दिलाती है जब 1973 में तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी की पहल पर चित्रकूट में पहला रामायण मेला आयोजित हुआ था, जिसकी नींव बारह साल पहले खुद लोहिया ने रखी थी। कुल मिलाकर यह विवाद अब सिर्फ चंदा चोरी तक सीमित नहीं रह गया है। यह आस्था, राजनीति और चुनावी रणनीति के त्रिकोण में बदल चुका है, जहां हर पक्ष अपने-अपने हिसाब से नैरेटिव गढ़ने में जुटा है और आने वाले यूपी चुनाव इसी बिसात पर लड़े जाने की आहट दे रहे हैं।