फिर पिंजरे का तोता साबित हुई सीबीआई

CBI proved to be a caged parrot again

दिल्ली की विशेष अदालत ने अरविंद केजरीवाल सरकार की आबकारी नीति पर उठाए सवाल

प्रमोद भार्गव

केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) और प्रवर्तन निदेषालय (ईडी) की कार्यप्रणाली पर कई बार सवाल उठे हैं। इससे उसकी साख पर बट्टा लगता है। लेकिन इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि देष की सबसे बड़ी जांच एजेंसियां राजनीतिक प्रभाव से मुक्त होकर कार्यप्रणाली विकसित नहीं कर पा रही हैं ? सीबीआई द्वारा दायर आरोप-पत्र पर संज्ञान लेने से इनकार करते हुए दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया समेत 23 लोगों को आबकारी नीति घोटाला मामले में आरोप मुक्त कर दिया। यही नहीं सीबीआई से नाराजगी जताते हुए कहा कि उसके द्वारा पेष आरोप-पत्र न्यायिक समीक्षा में खरा उतरने में पूरी तरह विफल रहा। इस प्रकरण के आरोपियों में तेलंगाना के तत्कालीन मुख्यमंत्री केसीआर की बेटी के. कविता भी षामिल हैं। विषेश न्यायाधीष जितेंद्र सिंह ने यहां तक कहा कि ‘इस अदालत को यह स्वीकारने में कोई संकोच नहीं है कि प्रस्तुत दस्तावेजों से मिली जानकारी से किसी भी आरोपी के विरुद्ध पहली दृश्टि में कोई मामला बनता ही नहीं है। यह जांच पहले से तय किए रास्ते पर आगे बढ़ी, जिसमें नीति बनाने या लागू करने से जुड़े हर व्यक्ति को फंसाया गया। ताकि एक कमजोर कहानी को भरोसे का भ्रम दिया जा सके। इस नीति को गोवा चुनावों से जोड़ना भी कानूनी रूप से विधि सम्मत नहीं है।‘ एक लोकसेवक को बिना पर्याप्त साक्ष्यों के आरोपी बनाने के इस दुर्लभ मामले में अदालत ने सीबीआई के जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय जांच और कार्यवाही की सिफारिष की है। फिलहाल सीबीआई ने अपनी कमजोरी पर पर्दा डालने के नजरिए से इस मामले की उच्च न्यायालय दिल्ली में अपील जरूर कर दी है, लेकिन फैसले में कोई बड़ा बदलाव मुमकिन नहीं लगता ? वैसे भी ईडी के मामलों में सजा की दर एक हजार में मात्र दो को ही हो पाती है।

राजनीतिक आकाओं के अनुसार काम करने लिए बदनाम देष की सबसे बड़ी जांच एजेंसी पर इसी नीति से जुड़े मामले में तब भी सवाल उठे थे, जब जेल में बंद अरविंद केजरीवाल की जमानत याचिका स्वीकार की थी। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति उज्जवन भुइयां को कहना पड़ा था कि ‘सीबीआई को पिंजरे में बंद तोते की छवि तोड़नी चाहिए। उसे दिखाना चाहिए कि वह पिंजरे में बंद नहीं, बल्कि स्वतंत्र एवं ईमानदार जांच एजेंसी है। उसे रत्तीभर भी षक के दायरे में नहीं होना चाहिए।‘ न्यायालय ने आगे कहा था कि ‘जमानत नियम और जेल अपवाद है। कानून का प्रयोग किसी के उत्पीड़न के लिए नहीं हो सकता है।

सीबीआई ने केजरीवाल को इसलिए गिरफ्तार किया, ताकि प्रवर्तन निषालय (ईडी) के मामले में केजरीवाल को मिली जमानत खारिज हो जाए।‘ पीठ के दूसरे न्यायाधीश सूर्यकांत ने भी अपने आदेश में कहा था कि केजरीवाल जमानत की षर्तें पूरी करते हैं। अतएव सीबीआई की यह दलील उचित नहीं है कि जमानत के लिए विचारण न्यायालय (ट्रायल कोर्ट) जाना चाहिए। उन्हें ईडी के प्रकरण में भी जमानत मिली है। इसलिए उन्हें हिरासत में रखना अस्वीकार्य है।‘ साफ है, जमानत के समय भी इस मामले की संदिग्धता सामने आ गई थी।

सीबीआई पर पिंजरे में बंद तोते और सरकार की कठपुतली होने के आरोप पहले भी लगते रहे हैं। 9 मई 2013 को कोयला घोटाले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति आरएस लोढ़ा की पीठ ने कहा था कि ‘सीबीआई पिंजरे में बंद तोते की तरह है, यह वही बात दोहराती रहती है, जो उसके मालिक कहते हैं। यह एक ऐसी अनॅैतिक कहानी है, जिसमें एक तोते के कई मालिक हैं। कोयला घोटाले की रिपोर्ट में अधिकारियों के कहने पर भी बदलाव हुआ है।‘ देश के राजनेता और दल सीबीआई पर नाजायज दबाव डालकर अपने तात्कालिक राजनीतिक हितों की पूर्ति करते हैं, यह अब कोई दबी-छिपी बात नहीं रह गई है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के जितने भी राश्ट्रीय अथवा क्षेत्रीय दल हैं, लगभग सभी परोक्ष-अपरोक्ष रुप से सत्ता में हिस्सेदारी कर चुके हैं और सत्ता से बाहर होने के बाद सत्ता पक्ष पर सीबीआई का दुरुपयोग करने का आरोप लगाते रहे हैं। मसलन अपरोक्ष रूप से वे अपने ही अनुभव प्रकट करते हैं। संसद में एफडीआई पर महाबहस के दौरान सपा और बसपा के मतदान में हिस्सा नहीं लेने पर भाजपा नेत्री सुशमा स्वराज ने संसद में बयान देते हुए कहा था कि यह स्थिति एफडीआई बनाम सीबीआई की लड़ाई बना देने के कारण उत्पन्न हुई है।

इसके बाद सीबीआई के पूर्व निदेषक उमाषंकर मिश्रा ने एक बयान देकर आग में घी डालने का काम कर दिया था। उनके मुताबिक 2003 से 2005 के बीच जब वे सीबीआई प्रमुख थे, तब उत्तर प्रदेष की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती से जुड़ा ताज कॉरीडोर मामले की जांच का प्रकरण उनके पास था। इस सिलसिले में मायावती के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति मामले की जांच चल रही थी। जांच में हमने पाया था कि मायावती के माता-पिता के बैंक खातों में इतनी ज्यादा रकम जमा थी कि उनकी आय के स्त्रोत की पड़ताल जरुरी थी, लेकिन केंद्र के दबाव के सामने वे निश्पक्ष जांच नहीं कर पाए। मसलन जांच लटका दी गई। यहां गौरतलब है कि मार्च 1998 से 2004 तक केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी और 22 मई 2004 को प्रधानमंत्री मनमोहन की सरकार वजूद में आ गई थी। मसलन संप्रग और राजग दोनों ने ही अपने हितों के लिए सीबीआई का दुरुपयोग किया।

मिश्रा ने आगे यह भी कहा था कि ‘यह सच है और इसे मैं नहीं छिपाउंगा। जब हम बड़े राजनेताओं के खिलाफ जांच करते हैं, तो प्रगति प्रतिवेदन लटकाने या जांच पूरी हो चुकने के बावजूद संपूर्ण जांच प्रतिवेदन न देने अथवा उसे किसी खास तरीके से प्रस्तुत कराने का पर्याप्त दबाव बनाया जाता है। इसीलिए इसकी साख बरकरार रखने के लिए उस समय अन्ना हजारे, अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी और सेवा निवृत्त सीबीआई निदेषक जोगिंदर सिंह लगातार मांग करते रहे थे कि इस संगठन को पूरी तरह स्वतंत्र एवं स्वायत्त बनाया जाए। जिस तरह से सर्वोच्च न्यायालय, निर्वाचन आयोग और निंयत्रक एवं महालेखा निरीक्षक जैसे संगठन हैं। लेकिन सरकार केंद्र में किसी भी दल की रही हो, वह सीबीआई को स्वायत्त बना देने की पहल नहीं की। जबकि इस दौरान अटलबिहारी वाजपेयी एवं मनमोहन सिंह की सरकारें रहीं और अब पिछले 12 साल से नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार केंद्र में है। दरअसल जिस दल की सरकार केंद्र में होती है, उसे षायद यह भ्रम हो जाता है कि अब आजीवन उन्हीं की सरकार का अस्तित्व बना रहेगा। इन सब बयानों से साफ होता है कि सीबीआई को सुपुर्द कर देने के बाद गंभीर से गंभीर मामला भी गंभीर नहीं रह जाता। बल्कि अपरोक्ष रूप से सीबीआई एक तो घोटाले पर आवरण डालने का काम करती है, दूसरे आरोपियों का सुरक्षा-कवच बन जाती है।

हालांकि उमाषंकर मिश्रा का बयान यहां यह भी सवाल खड़ा करता है कि आखिर सीबीआई जैसी प्रतिश्ठित संस्थाओं के नौकरषाह सत्ता के दबाव में आते क्यों हैं ? जब उन पर नाजायज दबाव बनाया जाता है, तभी इस दबाव का खुलासा क्यों नहीं करते ? सेवानिवृत्त होने के बाद ही क्यों करते हैं ? मिश्रा के पहले कैग के निदेषक आरपी सिंह का भी बयान आया था कि 2 जी स्पेक्ट्रम में घाटे से जुड़े आंकड़ों की रिपोर्ट पर उनके जबरन हस्ताक्षर कराए गए थे। जबकि जेपीसी के समक्ष बयान देने सिंह कई बार पेश हुए थे, तब उन्होंने इस कृत्य का खुलासा नहीं किया था। यहां, आला अधिकारियों को भी नहीं भूलना चाहिए कि वे भी सत्य निष्ठा और बिना किसी दबाव के काम करने की शपथ लेकर अपने काम में संलग्न होते हैं। इसलिए यदि वे किसी दबाव में काम करते हैं तो यह कर्मचारी आचरण संहिता का उल्लंघन है। बल्कि कैग तो एक संवैधानिक संस्था है और जेपीसी संसदीय समिति, इस नाते सिंह ने दबाव में काम करके और फिर उसकी सार्वजनिक आलोचना करके, संविधान और संसद दोनों की ही एक तरह से अवमानना की थी। ऐसे में यह मामला दण्डनीय अपराध की श्रेणी में आता है। लेकिन हमारे यहां यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि अपराध को सार्वजनिक रूप से स्वीकार लिए जाने के बावजूद नौकरशाहों पर दण्ड का शिकंजा नहीं कसता ? इसलिए देखने में आता है कि जो अधिकारी पिंजरे में तोते की भूमिका में मालिक की भाषा बोलते हैं, सेवानिवृत्ति के बाद किसी महत्वपूर्ण आयोग या मंडल के पद पर मनोनीत कर दिए जाते हैं। ऐसे लोगों के मनोनयन से यह तथ्य प्रमाणित होता है कि वे सत्ता पक्ष के अनुयायी बने रहे। जाहिर है, देश के लोक सेवकों को भी प्रसिद्धि और लालच की भावना से ऊपर उठकर कर्तव्य का पालन करने की जरूरत है। यदि ऐसा होता है, तो सालों जांच से जुड़े मामले लंबित नहीं रहेंगे। सीबीआई के पास ज्यादातर ऐसे मामले होते हैं, जो राजनीतिक एवं प्रषासनिक भ्रश्टाचार से जुड़े होते हैं। ऐसे में लटकाने के दबाव की प्रवृत्ति के चलते इनकी संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है।