प्रफुल्ल पलसुलेदेसाई
कभी-कभी किसी खबर को पढ़कर सबसे पहले जो भावना आती है, वह गर्व या क्रोध नहीं होती—बल्कि एक हल्की-सी असहजता होती है। जैसे कोई परिचित सच अचानक आईने में कुछ ज़्यादा साफ़ दिखाई देने लगे। भारत-पाकिस्तान के बीच सीजफायर को लेकर आई यह ताज़ा रिपोर्ट भी कुछ वैसा ही अनुभव देती है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के दावे—कि सीजफायर में उनकी भूमिका निर्णायक थी—को भारत ने पहले भी ख़ारिज किया था। भारत का कहना नया नहीं है: पाकिस्तान ने स्वयं फोन किया, हालात उसके नियंत्रण से बाहर जा चुके थे। अब एक स्विस थिंक टैंक इस दावे की पुष्टि करता है। तकनीकी विश्लेषण, ऑपरेशनल विवरण, और 88 घंटों के संघर्ष का बारीक अध्ययन। सब कुछ मौजूद है।
फिर भी मन ठहर जाता है। सवाल सिर्फ़ यह नहीं है कि किसने फोन किया। सवाल यह है कि आज की दुनिया में युद्ध, कूटनीति और नैरेटिव—तीनों का संतुलन आखिर तय कौन करता है?
युद्ध से ज़्यादा, उसकी व्याख्या
स्विट्ज़रलैंड के सेंटर फॉर मिलिट्री हिस्ट्री एंड पर्सपेक्टिव स्टडीज की रिपोर्ट एक सैन्य दस्तावेज़ भर नहीं है। वह इस बात की भी गवाही है कि आधुनिक संघर्ष सिर्फ़ ज़मीन या आसमान में नहीं लड़े जाते, वे हेडलाइनों में भी लड़े जाते हैं।
रिपोर्ट बताती है कि कैसे अंतरराष्ट्रीय मीडिया का ध्यान भारत द्वारा पाकिस्तान की एयर डिफेंस और स्ट्राइक क्षमताओं को व्यवस्थित ढंग से नष्ट करने से हटकर, पाकिस्तान के “राफेल गिराने” के दावों पर टिक गया। यह कोई मासूम चूक नहीं लगती।
यहाँ एक असहज प्रश्न उठता है—क्या आज सैन्य सच्चाई से ज़्यादा महत्वपूर्ण उसकी दृश्यता हो गई है? अगर किसी कार्रवाई को सही कैमरा एंगल, सही बयान और सही समय पर जारी नहीं किया गया, तो क्या वह कार्रवाई अधूरी मानी जाएगी?
88 घंटे और एक लंबा साया
88 घंटे का संघर्ष—काग़ज़ पर यह सिर्फ़ साढ़े तीन दिन हैं। लेकिन सैन्य इतिहास में यह एक निर्णायक खिड़की होती है। रिपोर्ट बताती है कि पहलगाम हमले के बाद भारत ने प्रतिक्रिया में देरी नहीं की। 7 मई की सुबह भारतीय वायु सेना ने पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया।
यह “तुरंत” की गई कार्रवाई नहीं थी, बल्कि ऐसी प्रतिक्रिया थी जिसमें सेना को योजना बनाने की पूरी छूट दी गई। यह बात ध्यान देने योग्य है। लोकतांत्रिक देशों में अक्सर सैन्य कार्रवाई राजनीतिक माइक्रो-मैनेजमेंट का शिकार हो जाती है। यहाँ ऐसा नहीं हुआ—कम से कम रिपोर्ट यही संकेत देती है।
लेकिन क्या यह हमेशा अच्छा संकेत होता है? जब सेना को पूरी छूट दी जाती है, तो जवाबदेही का प्रश्न और भी गहरा हो जाता है। इस सवाल का उत्तर रिपोर्ट नहीं देती, और शायद देना भी नहीं चाहती।
तकनीक की लड़ाई, मनोबल का युद्ध
पाकिस्तान ने चीन से प्राप्त PL-15 लंबी दूरी की एयर-टू-एयर मिसाइलों और एयरबोर्न अर्ली वार्निंग सिस्टम का इस्तेमाल किया। यह तथ्य अपने-आप में बताता है कि यह संघर्ष सिर्फ़ भारत-पाकिस्तान का नहीं था; इसमें तीसरी शक्तियों की परछाइयाँ भी थीं।
इसके जवाब में भारत ने SCALP-EG और ब्रह्मोस जैसी स्टैंडऑफ क्रूज़ मिसाइलों से पाकिस्तान के सरफेस-टू-एयर मिसाइल नेटवर्क और रडार कवरेज को ध्वस्त किया। यह तकनीकी विवरण पढ़ते समय एक अजीब-सी दूरी महसूस होती है। जैसे हम किसी वीडियो गेम का स्तर पढ़ रहे हों—जहाँ हर हथियार एक “एसेट” है, हर रडार एक “टारगेट”।
लेकिन इन तकनीकी शब्दों के पीछे मनोबल टूटता है। जब रडार अंधे हो जाते हैं, तो सिर्फ़ मशीनें नहीं चुप होतीं—पूरे कमांड ढाँचे में असमंजस फैल जाता है। शायद यहीं से पाकिस्तान का आत्मविश्वास दरकना शुरू हुआ।
शुरुआती जीत का भ्रम
रिपोर्ट बताती है कि पाकिस्तान ने शुरुआती जीत का दावा किया। यह दावा असामान्य नहीं है। लगभग हर संघर्ष में शुरुआती बयान मनोवैज्ञानिक युद्ध का हिस्सा होते हैं।
लेकिन समस्या तब होती है जब यह दावा अपनी ही जनता के लिए बोला जाने लगे। जब राजनीतिक नेतृत्व अपने नागरिकों को यह विश्वास दिलाने लगे कि सब नियंत्रण में है—जबकि सैन्य वास्तविकता कुछ और कह रही हो।
10 मई तक, रिपोर्ट के अनुसार, खेल पलट चुका था। भारत ने पाकिस्तान के मुख्य एयर बेस पर हमले शुरू कर दिए थे। IACCCS नेटवर्क, आकाशतीर सिस्टम, आकाश, बराक-8 और S-400 जैसी लेयर्ड एयर डिफेंस प्रणालियों का इस्तेमाल—यह सब एक ऐसी तस्वीर बनाता है जिसमें पाकिस्तान के विकल्प सिमटते चले गए।
यहीं वह क्षण आता है जहाँ “रणनीति” और “मनोविज्ञान” एक-दूसरे से टकराते हैं। क्या उस समय पाकिस्तान के पास वास्तव में कोई सैन्य विकल्प बचा था, या सिर्फ़ एक राजनीतिक निर्णय?
सीजफायर: हार या विवेक?
स्विस थिंक टैंक का दावा है कि इसके बाद पाकिस्तान ने सीजफायर की मांग की। भारत का यही स्टैंड पहले से रहा है।
लेकिन क्या सीजफायर हमेशा हार का संकेत होता है? या कभी-कभी वह विवेक का आख़िरी प्रयास भी हो सकता है?
यह सवाल इसलिए ज़रूरी है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सीजफायर को अक्सर नैतिक जीत की तरह पेश किया जाता है—“देखिए, हमने युद्ध रुकवा दिया।” ट्रंप का दावा इसी श्रेणी में आता है।
पर अगर सीजफायर उस क्षण माँगा जाए जब सैन्य संतुलन पूरी तरह बिगड़ चुका हो, तो उसका नैतिक मूल्य क्या रह जाता है? क्या वह शांति का आग्रह है, या नुकसान सीमित करने की कोशिश?
भारत का नैरेटिव और उसकी सीमाएँ
भारत ने इस पूरे प्रकरण में संयमित भाषा का इस्तेमाल किया। कोई बड़े दावे नहीं, कोई उन्मादी बयान नहीं। यह रणनीति कई लोगों को पसंद आई, कई को नहीं।
एक सवाल यहाँ भी उठता है—क्या भारत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपने सैन्य नैरेटिव को ज़्यादा आक्रामक ढंग से रखना चाहिए था? या यह चुप्पी ही उसकी ताकत है?
स्विस रिपोर्ट के आने के बाद यह स्पष्ट है कि देर से ही सही, पर भारत का संस्करण बाहरी विशेषज्ञों द्वारा मान्य हो रहा है। लेकिन क्या हम हमेशा बाहरी “मुहर” का इंतज़ार करेंगे?
यह असहज प्रश्न है, और शायद इसका उत्तर भी असहज ही होगा।
मीडिया, विशेषज्ञ और चयनित ध्यान
रिपोर्ट में यह टिप्पणी विशेष रूप से ध्यान खींचती है कि अंतरराष्ट्रीय हेडलाइंस ने भारत की सिस्टमैटिक कार्रवाई को लगभग नज़रअंदाज़ कर दिया।
यह कोई नई बात नहीं है। मीडिया अक्सर उस कहानी को चुनता है जो सरल हो, नाटकीय हो, और जिसमें स्पष्ट “टकराव” दिखे। “राफेल गिराया गया” जैसी हेडलाइन तुरंत क्लिक खींचती है; “एयर डिफेंस नेटवर्क का चरणबद्ध निष्क्रियकरण” नहीं।
पर इस चयनित ध्यान का असर सिर्फ़ छवि पर नहीं पड़ता—यह नीति को भी प्रभावित करता है। जब गलत या अधूरी कहानियाँ बार-बार दोहराई जाती हैं, तो वे निर्णय-निर्माताओं के दिमाग़ में भी जगह बना लेती हैं।
क्या यही वजह है कि आज युद्ध कम और उसकी व्याख्या ज़्यादा निर्णायक हो गई है?
शक्ति का प्रदर्शन और उसकी कीमत
स्विस रिपोर्ट भारत की सैन्य क्षमता की प्रशंसा करती है। और यह प्रशंसा निराधार नहीं है। पर शक्ति का प्रदर्शन हमेशा एक दोधारी तलवार होता है।
एक तरफ़ वह प्रतिरोध पैदा करता है—दूसरी तरफ़ वह उम्मीदें भी बढ़ाता है। जब एक देश बार-बार यह साबित करता है कि वह निर्णायक कार्रवाई कर सकता है, तो अगली बार उससे और तेज़, और निर्णायक प्रतिक्रिया की अपेक्षा की जाती है।
क्या भारत इस बढ़ती अपेक्षा के लिए तैयार है? क्या हर भविष्य के संकट में “88 घंटे” का ऐसा ही स्पष्ट परिणाम संभव होगा?
इन सवालों का उत्तर शायद किसी थिंक टैंक की रिपोर्ट में नहीं मिलेगा।
यह रिपोर्ट ट्रंप के दावे पर सवाल उठाती है, पाकिस्तान की मजबूरी को रेखांकित करती है, और भारत की सैन्य क्षमता को स्थापित करती है। यह सब महत्वपूर्ण है।
लेकिन शायद सबसे महत्वपूर्ण यह है कि यह हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि आधुनिक युद्ध में जीत किसकी होती है—जिसकी मिसाइलें ज़्यादा सटीक हों, या जिसकी कहानी ज़्यादा सुनी जाए? और अगर कभी दोनों अलग-अलग दिशाओं में जाएँ, तो इतिहास किसका पक्ष लेता है?
इस सवाल का कोई तात्कालिक उत्तर नहीं है। शायद होना भी नहीं चाहिए। क्योंकि जिस दिन हमें लगे कि उत्तर पूरी तरह हमारे पास है, उसी दिन हम कुछ महत्वपूर्ण खो चुके होंगे—शायद वह असहजता, जो सोचने पर मजबूर करती है।





