जीनोम एडिटिंग की चुनौतियां

Challenges of genome editing

विशाल कुमार सिंह

विज्ञान और प्रौद्योगिकी की दुनिया में भारत ने एक बार फिर अपनी विशिष्ट पहचान दर्ज कराई है। कृषि क्षेत्र में ‘जीनोम एडिटिंग’ के माध्यम से भारतीय वैज्ञानिकों ने चावल की दो नई किस्में विकसित करके न केवल वैश्विक स्तर पर एक कीर्तिमान स्थापित किया है, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा और किसानों की आर्थिक स्थिति में गुणात्मक परिवर्तन का द्वार भी खोल दिया है। यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह ‘जेनेटिक मॉडिफिकेशन’ से अलग है, और इसके सामाजिक तथा कानूनी प्रतिरोध अपेक्षाकृत कम हैं।

जीनोम एडिटिंग वह आधुनिक तकनीक है जिसके जरिए किसी पौधे के डीएनए में बदलाव करके उसमें विशेष गुणों को जोड़ा या हटाया जाता है। परंपरागत जेनेटिक इंजीनियरिंग में बाहरी जीन को सम्मिलित किया जाता है, जबकि जीनोम एडिटिंग एक तरह की ‘सर्जरी’ है जो पौधे के अपने ही जीन में परिवर्तन करती है। भारत में पहली बार इस तकनीक का उपयोग करके वैज्ञानिकों ने दो नई चावल किस्में विकसित की हैं- DRR Dhan-100 और Improved Samba Mahsuri (ISM-1)। इन दोनों किस्मों की विशेषता यह है कि इन्हें कम पानी, कम खाद और कम कीटनाशकों की आवश्यकता होती है। यही नहीं, इनका उत्पादन सामान्य चावल की तुलना में 30 प्रतिशत अधिक है और पकने में भी ये किस्में लगभग 20 दिन पहले तैयार हो जाती हैं।

इस तकनीक के माध्यम से एक ही प्लांट में मौजूद जींस को एडिट करके डीएनए सीक्वेंसिंग में परिवर्तन किया जाता है। इससे उत्पन्न पौधे को कोई बाहरी या कृत्रिम तत्व ग्रहण नहीं करना पड़ता, जिससे यह तकनीक जैविक और पारंपरिक कृषि के बीच की दूरी को भी पाट सकती है। DRR Dhan-100 और ISM-1 को ‘जीनोम एडिटिंग’ के माध्यम से तैयार किया गया है और इन्हें बिना किसी जैविक जोखिम के बड़े पैमाने पर अपनाया जा सकता है।

इस वैज्ञानिक उपलब्धि के पीछे सरकार की स्पष्ट रणनीति और दृष्टिकोण भी अहम भूमिका निभा रहा है। कृषि मंत्री ने ‘माइनस 5 प्लस 10’ का नारा देते हुए कहा है कि पाँच मिलियन हेक्टेयर में कम क्षेत्रफल में दस मिलियन टन अतिरिक्त चावल उगाने का लक्ष्य रखा गया है। यह संकल्प केवल खाद्यान्न उत्पादन की दिशा में नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन और भूमि की घटती उर्वरता से निपटने की दिशा में भी बड़ा कदम है। किसानों को अल्प जल वाले क्षेत्रों में भी उच्च उपज देने वाली किस्मों की उपलब्धता कृषि क्षेत्र को एक नई दिशा प्रदान कर सकती है।

भारत जैसे देश में जहां कृषि मुख्य रूप से वर्षा आधारित है और अधिकांश किसान छोटे और सीमांत किसान हैं, वहाँ यह तकनीक क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकती है। जीनोम एडिटिंग की सहायता से तैयार की गई फसलों की उत्पादकता अधिक होती है और संसाधनों की खपत कम होती है, जिससे किसान की लागत घटती है और मुनाफा बढ़ता है। खासकर उन क्षेत्रों में जहां सिंचाई के संसाधनों की भारी कमी है या भूमि की उर्वरता लगातार घट रही है, वहाँ इस तकनीक से तैयार किस्में किसानों के लिए वरदान साबित हो सकती हैं।

इस तकनीक का एक अन्य प्रमुख पक्ष है ‘क्रॉप डाइवर्सिफिकेशन’ यानी फसल विविधीकरण। सरकार चावल की अधिक खपत वाली खेती को दालों और तिलहनों की खेती की ओर मोड़ना चाहती है, जिससे जल संकट और पोषण असंतुलन से निपटा जा सके। पारंपरिक चावल की खेती में अधिक जल की आवश्यकता होती है और यह हरित क्रांति के समय से ही उत्तर भारत के कुछ राज्यों में भूजल के अत्यधिक दोहन का कारण रही है। अब यदि कम जल-खपत वाली किस्में किसान को उपलब्ध कराई जाएंगी तो किसान को चावल की पैदावार कम किए बिना दाल और तिलहन की ओर बढ़ने की सुविधा मिलेगी।

वर्तमान में भारत में चावल, गेहूं जैसी खाद्यान्न फसलें अधिक उगाई जाती हैं जबकि दाल और तिलहन के मामले में हम अभी भी आयात पर निर्भर हैं। खाद्य तेल और प्रोटीन की कमी को पूरा करने के लिए यदि हम कृषि संरचना में संतुलन स्थापित कर पाएं तो यह पोषण सुरक्षा और आत्मनिर्भरता दोनों दृष्टियों से लाभकारी होगा। सरकार की यह नीति कि जिन क्षेत्रों में चावल की अत्यधिक खेती हो रही है, वहाँ की भूमि का उपयोग अब दलहन-तिलहन के लिए किया जाए, बिल्कुल सही दिशा में उठाया गया कदम है।

इस तकनीक से जुड़ी एक महत्वपूर्ण बात यह है कि इसे सामाजिक स्वीकार्यता मिलने की संभावना अधिक है। जेनेटिक मॉडिफिकेशन को लेकर लंबे समय से कई भ्रांतियां और आशंकाएं रही हैं, जैसे कि वह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है या पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुँचा सकता है। लेकिन जीनोम एडिटिंग में किसी बाहरी तत्व को शामिल नहीं किया जाता, जिससे यह नैतिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अधिक स्वीकार्य है। इससे किसानों को भी यह समझाना आसान होगा कि नई किस्में सुरक्षित हैं और उनकी उपज में लाभप्रद वृद्धि करेंगी।

भारत में कृषि अनुसंधान और विकास के क्षेत्र में यह प्रयोग एक मील का पत्थर है। इससे पहले भारत ने हरित क्रांति के माध्यम से उत्पादन तो बढ़ाया था, लेकिन उसमें रसायनों और जल का अत्यधिक उपयोग हुआ, जिससे भूमि की उर्वरता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। अब जबकि जलवायु परिवर्तन, भूमि क्षरण और जल संकट जैसे गंभीर मुद्दे सामने हैं, ऐसे में कम संसाधन खपत वाली उच्च उत्पादक किस्में ही टिकाऊ कृषि की कुंजी हो सकती हैं।

यह भी ध्यान देने योग्य तथ्य है कि जीनोम एडिटिंग की सहायता से विकसित की गई किस्में केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं रहेंगी, बल्कि इन्हें व्यावसायिक रूप से किसानों तक पहुँचाने की योजना बनाई गई है। वैज्ञानिकों का यह प्रयास केवल अकादमिक उपलब्धि नहीं बल्कि व्यावहारिक समाधान के रूप में देखा जाना चाहिए। इसके लिए सरकार को बीज वितरण, प्रशिक्षण, प्रचार-प्रसार और बाजार संपर्क जैसी व्यवस्थाओं को मजबूत बनाना होगा, ताकि किसान इसे सहजता से अपना सकें।

यह कहना बिलकुल उचित होगा कि जीनोम एडिटिंग जैसी उन्नत तकनीक के माध्यम से भारत न केवल अपनी कृषि प्रणाली को पुनः परिभाषित कर सकता है, बल्कि वैश्विक कृषि नवाचार के क्षेत्र में भी एक अग्रणी राष्ट्र बन सकता है। वर्तमान समय में खाद्य सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन, और पोषण की समस्याएँ वैश्विक स्तर पर चिंताजनक विषय बन गई हैं। ऐसे समय में यदि भारत जीनोम एडिटिंग के सफल प्रयोगों को बड़े पैमाने पर लागू करता है, तो यह न केवल भारत की कृषि उत्पादकता को बढ़ाएगा, बल्कि विश्व को भोजन की पर्याप्त मात्रा उपलब्ध कराने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। यह तकनीक पारंपरिक कृषि पद्धतियों की तुलना में अधिक सटीक, तेज़ और पर्यावरण के अनुकूल है, जिससे फसलों की उपज बढ़ाने के साथ-साथ उनकी पौष्टिक गुणवत्ता में भी सुधार संभव हो पाता है।

विशेष रूप से चावल की दो नई किस्में, जिनका जीनोम एडिटिंग के माध्यम से विकास हुआ है, भारत के लिए एक क्रांतिकारी उपलब्धि हैं। ये किस्में न केवल उच्च उपज वाली हैं, बल्कि जलवायु परिवर्तन से होने वाले प्रभावों जैसे सूखा, बाढ़ और तापमान में वृद्धि को सहन करने में भी सक्षम हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण किसानों को हो रहे नुकसान को कम करने में ये फसलें सहायक सिद्ध होंगी, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को स्थिरता मिलेगी और किसानों की आय में वृद्धि होगी। इसके साथ ही, इन फसलों के पोषण स्तर में सुधार भी हुआ है, जो पोषण असंतुलन जैसी गंभीर समस्याओं को कम करने में मदद करेगा। इससे बच्चों और वयस्कों दोनों के स्वास्थ्य में सुधार होगा, जो एक स्वस्थ राष्ट्र के निर्माण के लिए अनिवार्य है।

भारत का कृषि निर्यात इस तकनीक से अत्यधिक लाभान्वित हो सकता है। विश्व बाजार में गुणवत्ता और टिकाऊ फसलों की मांग तेजी से बढ़ रही है, और जीनोम एडिटिंग से विकसित फसलों की वैश्विक स्वीकार्यता भारत के निर्यात को नई ऊँचाइयों तक ले जा सकती है। इससे न केवल किसानों की आय बढ़ेगी, बल्कि देश की आर्थिक स्थिति भी मजबूत होगी। साथ ही, यह तकनीक भारत को वैश्विक कृषि अनुसंधान और नवाचार के केंद्र के रूप में स्थापित कर सकती है, जिससे नए अवसर पैदा होंगे और कृषि क्षेत्र में रोज़गार सृजन भी होगा।

हालांकि, इस तकनीक के समुचित और सुरक्षित उपयोग के लिए कुछ चुनौतियों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सबसे पहले, जीनोम एडिटिंग की तकनीकी जटिलताओं को समझना और उन्हें सही तरीके से लागू करना आवश्यक है। इसके लिए किसानों को प्रशिक्षण और जागरूकता प्रदान करना अनिवार्य है ताकि वे इस नई तकनीक का सही फायदा उठा सकें। सरकार और संबंधित संस्थानों को एक व्यापक और ठोस नीति बनानी होगी, जो नैतिकता, सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण के मानकों को सुनिश्चित करे। साथ ही, इस तकनीक के उपयोग पर निगरानी व्यवस्था भी प्रभावी रूप से स्थापित करनी होगी ताकि किसी भी प्रकार की अनियमितता या दुरुपयोग को रोका जा सके।

यह भी आवश्यक है कि जीनोम एडिटिंग तकनीक का उपयोग केवल वैज्ञानिक दृष्टिकोण और नैतिक मूल्यों के आधार पर हो, न कि केवल आर्थिक लाभ के लिए। इसके लिए वैज्ञानिक समुदाय, नीति निर्माता, किसानों और आम जनता के बीच एक स्पष्ट संवाद और सहयोग स्थापित करना होगा। इस संवाद के माध्यम से ही तकनीक के प्रति भरोसा और स्वीकृति बढ़ेगी, जिससे इसका व्यापक और सफल उपयोग संभव होगा।

भारत में जीनोम एडिटिंग के माध्यम से कृषि क्षेत्र में एक नई क्रांति का प्रारंभ हो चुका है। यदि इस क्रांति को मजबूत नीति समर्थन, वैज्ञानिक अनुसंधान और जनसमर्थन प्राप्त होता है, तो यह बीज निश्चित रूप से एक समृद्ध, आत्मनिर्भर और टिकाऊ भारत के निर्माण में फल-फूल कर बड़ा पेड़ बन जाएगा। यह तकनीक न केवल भारत के खाद्यान्न उत्पादन को बढ़ाएगी, बल्कि जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का सामना करते हुए विश्व को एक स्थिर और सुरक्षित खाद्य भविष्य की ओर ले जाएगी। इससे भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में न केवल आर्थिक सुधार आएगा, बल्कि भारत की ग्रामीण संस्कृति और आत्मा में भी एक नई ऊर्जा और आशा का संचार होगा। यह तकनीक, इस अर्थ में, केवल कृषि का नवाचार नहीं बल्कि देश के हर किसान के जीवन में सुधार और उज्जवल भविष्य की एक नई किरण है।