मालेगांव : जनसांख्यिकीय घनत्व बिगड़ने की कथित धर्मनिरपेक्ष दलों को चेतावनी
प्रमोद भार्गव
पिछले लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा नेता देवेंद्र फडणवीस ने महाराष्ट्र के नासिक जिले के नगर मालेगांव में वोट जिहाद होने का आरोप लगाया था,वह अब एक प्रामाणिक सच्चाई के रूप में सामने आ गया है। फडणवीस के इस आरोप से तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दल तिलमिला उठे थे, लेकिन अब निकाय चुनाव में उसी मालेगांव में इस्लाम पार्टी,समाजवादी पार्टी और एआईएमआईएम के गठबंधन ने अपना परचम तो फहराया ही,कथित सेकुलर दलों को भी किनारे लगा दिया। कांग्रेस ने भी महज तीन वे सीटें जीती हैं,जिन पर मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव लड़े थे। यहां नई नई अस्तित्व में आई इस्लाम पार्टी ने 35,सपा ने 5 एआईएमआईएम ने 21 सीटें जीती हैं। शिवसेना (शिंदे) को 18 और भाजपा को मात्र दो सीटें मिली हैं। ये परिणाम मालेगांव में जनसांख्यिकीय घनत्व बिगड़ने के कारण संभव हुए हैं। जिसकी चेतावनी फडणवीस ने तो दी ही थी, टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइसेंज (टिस्स ) ने भी दी थी। टिस्स की इस रिपोर्ट ने मुंबई में एक सर्वेक्षण करके कहा था कि 1961 में मुंबई की आबादी सिर्फ 8 प्रतिशत थी,जो 2011 में बढ़कर 21 प्रतिशत हो गई और 2051 तक यह आबादी 30 प्रतिशत पहुंच जाएगी। तब यह आबादी कई दलों के राजनीतिक समीकरण बिगाड़ने में सक्षम होगी। इस रिपोर्ट की प्रासंगिकता मालेगांव निकाय चुनाव में साबित हो गई है। वर्तमान में मालेगांव में 78 प्रतिशत आबादी है,इसी बूते उसने 75 प्रतिशत सीटें जीत ली हैं। मसलन ‘जिसकी जितनी संख्या भारी,उसकी उतनी शासन में हिस्सेदारी’ ।
जनसँख्यात्मक घनत्व के परिप्रेक्ष्य में दो तरह की चुनौतियां सामने आ रही हैं, एक प्रजनन के जरिए मुस्लिमों की बढ़ती आबादी और दूसरे घुसपैठ के जरिए सीमावर्ती राज्यों में मुस्लिमों की बढ़ती आबादी! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसे सीमावर्ती इलाकों में घुसपैठियों की मदद से जनसांख्यिकीय घनत्व बदलने की साजिश बता रहे हैं, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा है। ये हालात इसलिए चिंताजनक हैं, क्योंकि अब बिगड़ता जनसंख्यात्मक घनत्व भारत का राजनीतिक भविष्य तय करने की ओर बढ़ रहा है। पश्चिम बंगाल, असम और पूर्वोत्तर राज्यों में स्थानीय बनाम विदेशी नागरिकों का मसला एक बड़ी समस्या बन गया है। जो यहां के सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक जीवन को लंबे समय से झकझोर रहा है। असम के लोगों की शिकायत है कि बांग्लादेश और म्यांमार से बड़ी संख्या में घुसपैठ करके आए मुस्लिमों ने उनके न केवल आजीविका के संसाधनों को हथिया लिया है, बल्कि कृषि भूमि पर भी काबिज हो गए हैं। इस कारण राज्य का जनसंख्यात्मक घनत्व बिगड़ रहा है। लिहाजा यहां के मूल निवासी बोडो आदिवासी और घुसपैठियों के बीच जानलेवा हिंसक झड़पें भी होती रहती हैं। नतीजतन अवैध और स्थाई नागरिकों की पहचान के लिए सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर एनआरसी यानी राष्ट्रीय नागरिकता पत्रक बनाने की पहल हुई।
इस निर्देश के मुताबिक 1971 से पहले असम में रह रहे लोगों को मूल नागरिक माना गया है। इसके बाद के लोगों को अवैध नागरिकों की सूची में दर्ज किया गया है। इस सूची के अनुसार 3.29 करोड़ नागरिकों में से 2.89 करोड़ लोगों के पास नागरिकता के वैध दस्तावेज हैं। शेष रह गए 40 लाख लोग फिलहाल अवैध नागरिकों की श्रेणी में रखे गए हैं। इस तरह के संवेदनशील मामलों पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। दरअसल घुसपैठिए अपनी नागरिकता सिद्ध नहीं कर पाते हैं, तो यह उन राजनीतिक दलों को वजूद बचाए रखने की दृष्टि से खतरे की घंटी है, जो मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति करते हुए घुसपैठ को बढ़ावा देकर अवैध नागरिकता को वैधता देने के उपाय करते रहे हैं। इस संदर्भ में मालेगांव एक सबक है। यह सबक भाजपा से कहीं ज्यादा उन दलों के लिए है,जो सेकुलर का डंका पीटते हुए आबादी नियंत्रण कानून और समान नागरिक संहिता का विरोध करके खुद के पैरों पर तो कुल्हाड़ी मार ही रहे हैं, देश की संप्रभुता और अखंडता को भी खतरे में डाल रहे हैं।
मालेगांव में हुई गोलबंदी ने तय कर दिया है कि भविष्य में मुस्लिम नेता और नेतृत्व वाले दलों को ही मुस्लिम मतदाता,मतदान के लिए धुर्वीकृत होंगे।इस संदर्भ में मालेगांव एक मॉडल के रूप में पेश आया है,जिसका भविष्य में विस्तार भी हो सकता है?दरससल यहां इस्लाम पार्टी,सपा और असदूद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम गठबंधन बनाकर चुनाव लड़ीं और 75 फीसदी सीटें जीतने में सफल रहीं। अतएव कल विस्तृत होने वाली यह चुनौती कांग्रेस, सपा, राजद,आप, तृणमूल और कम्युनिस्ट पार्टियों को कहां लाकर खड़ा कर देंगी,इस परिणाम में अंतर्निहित इस चेतावनी का अहसास करने की जरूरत इन दलों को है?मुस्लिमों की बढ़ती आबादी जहां उत्तर,मध्य,पश्चिम और दक्षिण भारत को प्रभावित करेगी,वहीं घुसपैठ पुर्वोत्तर भारत के राजनीतिक समीकरण बिगाड़ देगी।इसलिए इन दलों को वर्तमान से कहीं ज्यादा भविष्य पर दृष्टिपात करने की जरूरत है।
आज असम और बंगाल में अवैध घुसपैठ का मामला सबसे ज्यादा गर्म है।इसलिए मोदी जहां घुसपैठ के प्रखर विराधी के रूप में पेश आ रहे हैं, वहीं ममता बनर्जी घुसपैठियों के समर्थन में आ खड़ा होती हैं।2026 में असम और पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव होने हैं,इस कारण भी यह मुद्दा गरमाया हुआ है।दरअसल असम 1951 से 1971 के बीच राज्य में मतदाताओं की संख्या अचानक 51 प्रतिशत बढ़ गई। 1971 से 1991 के बीच यह संख्या बढ़कर 89 फीसदी हो गई। 1991 से 2011 के बीच मतदाताओं की तादात 53 प्रतिशत बढ़ी। 2001 की जनगणना के आंकड़ों के हिसाब से यह भी देखने में आया कि असम में हिंदू आबादी तेजी से घटी और मुस्लिम आबादी तेजी से बढ़ी है। 2011 की जनगणना में मुस्लिमों की आबादी और तेजी से बढ़ी।
2001 में जहां यह बढ़ोत्तरी 30.9 प्रतिशत थी, वहीं 2011 में बढ़कर 34.2 प्रतिशत हो गई। जबकि देश के अन्य हिस्सों में मुस्लिमों की आबादी में बढ़ोत्तरी 13.4 प्रतिशत से 14.2 फीसदी तक ही हुई। असम में 35 प्रतिशत से अधिक मुस्लिमों वाली 2001 में विधानसभा सीटें 36 थी, जो 2011 में बढ़कर 39 हो गईं। गौरतलब है कि 1971 में बांग्लादेश के स्वतंत्र होने के बाद से 1991 तक हिंदुओं की जनसंख्या में 41.89 फीसदी की वृद्धि हुई, जबकि इसी दौरान मुस्लिमों की जनसंख्या में 77.42 फीसदी की बेलगाम वृद्धि दर्ज की गई। इसी तरह 1991 से 2001 के बीच असम में हिंदुओं की जनसंख्या 14.95 प्रतिशत बढ़ी, जबकि मुस्लिमों की 29.3 फीसदी बढ़ी। इस घुसपैठ के कारण असम में जनसंख्यात्मक घनत्व गड़बड़ा गया। और सांप्रदायिक दंगों का सिलसिला शुरू हो गया। इसका सबसे ज्यादा खामियाजा बोडो आदिवासियों ने भुगता। इसी के दुष्फल स्वरूप कई बोडो उग्रवादी संगठन अस्तित्व में आ गए।
इन घुसपैठियों को भारतीय नागरिकता देने के काम में असम राज्य कांग्रेस की राष्ट्र विरोधी भूमिका रही है। घुसपैठियों को अपना वोट बैंक बनाने के लिए कांग्रेसियों ने इन्हें बड़ी संख्या में मतदाता पहचान पत्र एवं राशन कार्ड तक हासिल कराए। नागरिकता दिलाने की इसी पहल के चलते घुसपैठिए कांग्रेस को झोली भर-भर के वोट देते रहे हैं। कांग्रेस की तरूण गोगाई सरकार इसी बूते 15 साल सत्ता में रही। लेकिन लगातार घुसपैठ ने कांग्रेस की हालत पतली कर दी थी। फलस्वरूप भाजपा सत्ता में आ गई। इस अवैध घुसपैठ के दुष्प्रभाव पहले अलगाववाद के रूप में देखने में आ रहे थे, लेकिन बाद में राजनीति में प्रभावी हस्तक्षेप के रूप में बदल गए। इन दुष्प्रभावों को पूर्व में सत्तारूढ़ रहा कांग्रेस का केंद्रीय व प्रांतीय नेतृत्व जानबूझकर वोट बैंक बनाए रखने की दृष्टि से अनदेखा करता रहा। लिहाजा धुबरी जिले से सटी बांग्लादेश 134 किलोमीटर लंबी सीमा-रेखा है उस पर कोई चौकसी नहीं है। नतीजतन घुसपैठ आसानी से जारी है। असम को बांग्लादेश से अलग ब्रह्मपुत्र नदी करती है। इस नदी का पाट इतना चौड़ा और दलदली है कि इस पर बाड़ लगाना या दीवार बनाना नामुमकिन है। केवल नावों पर सशस्त्र पहरेदारी के जरिए घुसपैठ को रोका जाता है। लेकिन अब नरेंद्र मोदी और असम के मुख्यमंत्री हिमंत विश्व सरमा के घुसपैठियों के विरुद्ध कड़े रुख के चलते इनकी वापसी भी शुरू हुई है।
दरअसल 1971 से ही एक सुनियोजित योजना के तहत पूर्वोत्तर भारत, बंगाल, बिहार और दूसरे प्रांतों में घुसपैठ का सिलसिला जारी है। म्यांमार से आए 60,000 घुसपैठिए रोहिंग्या मुस्लिम भी कश्मीर, बेंगलुरु और हैदराबाद में गलत तरीकों से भारतीय नागरिक बनते जा रहे हैं। जबकि कश्मीर से हिंदू, सिख और बौद्ध पिछले साढ़े तीन दशक से शरणार्थी बने रहने को अभिशप्त हैं। प्रधानमंत्री राजीव गांधी सरकार ने तत्कालीन असम सरकार के साथ मिलकर फैसला लिया था कि 1971 तक जो भी बांग्लादेशी असम में घुसे हैं, उन्हें नागरिकता दी जाएगी और बाकी को भारत की जमीन से निर्वासित किया जाएगा। इस फैसले के तहत ही अब तक सात बार एनआरसी ने नागरिकों की वैध सूची जारी करने की कोशिश की, लेकिन मुस्लिम वोट-बैंक की राजनीति के चलते कांग्रेस, वामपंथी और तृणमूल एनआरसी का विरोध करते रहे हैं।बहराल,मालेगांव में मुस्लिम पार्टियों की एकतरफा जीत और पूर्वोत्तर में घुसपैठ उन तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दलों के लिए एक सबक एवं चुनौती है,जो अवैध घुसपैठियों और मुस्लिमों पर आबादी नियंत्रण के कानूनी उपायों के परिप्रेक्ष्य में समर्थन में खड़े होकर अपने ही दलों के राजनीतिक भविष्य को खतरे में डाल रहे हैं।





