डॉ सत्यवान सौरभ
भारतीय संविधान नागरिकों को धर्म का पालन, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता प्रदान करता है, परंतु यह स्वतंत्रता पूर्णतः निरपेक्ष नहीं है। विशेषकर उन सेवाओं में, जहाँ सामूहिक अनुशासन, पदानुक्रम, आज्ञापालन और इकाई-एकजुटता ही अस्तित्व की शर्तें हैं, वहाँ व्यक्तिगत स्वतंत्रता का दायरा स्वाभाविक रूप से सीमित हो जाता है। भारतीय सशस्त्र बल इसी श्रेणी में आते हैं, जहाँ राष्ट्रीय सुरक्षा, युद्धक क्षमता और सामूहिक मनोबल किसी भी व्यक्तिगत पसंद-नापसंद या धार्मिक व्याख्या से कहीं ऊपर रखे जाते हैं। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एक सैन्य अधिकारी की बर्खास्तगी को उचित ठहराया जाना इस बात का प्रमाण है कि ‘‘आवश्यक धार्मिक आचरण’’ और ‘‘व्यक्तिगत धार्मिक व्याख्या’’ में स्पष्ट अंतर किया जाएगा, और वर्दी में रहते हुए यह अंतर और अधिक कठोर हो जाता है। यह निर्णय यह संकेत भी देता है कि सैन्य सेवा का मूल स्वर ‘‘सैकुलर यूनिट-कल्चर’’ पर आधारित है, जहाँ किसी भी धर्म की मान्यताएँ सम्मानित हैं, किंतु किसी एक धर्म की निजी व्याख्या रेजिमेंटल परंपराओं, आदेशों या सैन्य अनुशासन पर प्रभाव नहीं डाल सकती।
भारत जैसे बहुधर्मी समाज में सेना का चरित्र हमेशा से विशिष्ट रूप से धर्मनिरपेक्ष रहा है। एक ही पलटन में हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध और अन्य धर्मों के सैनिक कंधे से कंधा जोड़कर लड़ते हैं। उनकी एकता का आधार ‘‘धर्म’’ नहीं, बल्कि ‘‘रक्त संबंधी बंधुत्व’’ और ‘‘राष्ट्र के प्रति साझा निष्ठा’’ है। यही कारण है कि भारतीय सेना की रेजिमेंटल परंपराओं में धार्मिक रंग तो दिखते हैं, पर उनका उद्देश्य किसी विशेष धर्म का प्रचार नहीं, बल्कि सैनिक भावना, युद्धक मनोबल और ऐतिहासिक गौरव की निरंतरता को बनाए रखना होता है। उदाहरणस्वरूप कई रेजिमेंट अपने पारंपरिक युद्ध-नाद या शुभ प्रतीकों का उपयोग करती हैं, जो उनकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और युद्धों में प्रदर्शित वीरता की गवाही देते हैं।
किसी सैनिक के लिए धार्मिक आस्था उसका व्यक्तिगत अधिकार अवश्य है, पर जब वह वर्दी धारण करता है, तो वह व्यक्ति नहीं, राष्ट्र का प्रतिनिधि बन जाता है। सेना किसी सैनिक को किसी विशेष धार्मिक अनुष्ठान को त्यागने या नया अपनाने के लिए बाध्य नहीं करती, किंतु यह अपेक्षा अवश्य करती है कि भीतर की किसी निजी व्याख्या को सैनिक अपने कर्तव्यों, आदेशों या इकाई-परंपराओं से ऊपर न रखे। सर्वोच्च न्यायालय ने इसी संदर्भ में स्पष्ट किया कि क्या कोई धार्मिक ग्रंथ वास्तव में किसी विशेष क्रिया को प्रतिबंधित करता है या यह केवल व्यक्ति की निजी धारणा है—यह अंतर अत्यंत महत्वपूर्ण है। ‘‘आवश्यक धार्मिक आचरण’’ वही होता है जो धर्म के मूलभूत स्वरूप का अंग हो, जिसे त्याग देने पर धर्म का स्वरूप ही बदल जाए। इसके विपरीत यदि कोई आचरण केवल व्यक्तिगत व्याख्या पर आधारित है, तो उसे सेवा-आवश्यकताओं से ऊपर नहीं रखा जा सकता।
न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि यदि किसी सैनिक को आदेश दिया जाए कि वह किसी आधिकारिक कार्यक्रम या परेड में भाग ले, और वह ‘‘धार्मिक कारणों’’ का हवाला देते हुए मना करे, तो उसकी इस असहमति के दो स्तरों की जाँच होगी—पहला यह कि क्या वह आचरण सचमुच धर्म-आवश्यक है? और दूसरा यह कि क्या उसका पालन रेजिमेंटल अनुशासन या सामूहिक मनोबल को प्रभावित करता है? यदि कोई सैनिक आदेश का पालन नहीं करता, तो वह केवल एक व्यक्तिगत निर्णय नहीं होता—वह पूरी संरचना के अनुशासन को चुनौती देने का कार्य बन जाता है। सेना में एक भी अस्वीकार उदाहरण चेन-ऑफ-कमांड को कमजोर करने का कारण बन सकता है, क्योंकि युद्धकालीन या संकट की परिस्थितियों में आदेशों का तुरंत पालन ही जीवन और मृत्यु का अंतर तय करता है।
सैन्य अनुशासन केवल बाहरी नियमों का पालन नहीं है; यह मनोवैज्ञानिक एकजुटता और मानसिक तैयारी की वह अवस्था है जिसमें प्रत्येक सैनिक स्वयं को इकाई का अभिन्न घटक मानता है। धार्मिक आधार पर स्वयं को अलग करना या रेजिमेंटल परंपराओं से दूरी बनाना उस भावना को कमजोर कर सकता है। इसलिए न्यायालय और सैन्य नेतृत्व दोनों इस बात पर सहमत हैं कि ‘‘व्यक्तिगत विश्वास’’ और ‘‘व्यक्तिगत व्याख्या’’ का सम्मान तो किया जा सकता है, पर ‘‘व्यक्तिगत धार्मिक औचित्य’’ देकर सैन्य आदेशों का उल्लंघन न तो स्वीकार्य है, न ही वह किसी भी प्रकार ‘‘धर्म के अधिकार’’ के अंतर्गत आता है।
यह भी महत्वपूर्ण है कि सेना किसी सैनिक को दूसरे धर्म के अनुष्ठानों में ‘‘भाग लेने’’ के लिए बाध्य नहीं करती, बल्कि केवल ‘‘उपस्थिति’’ या ‘‘प्रोटोकॉल’’ पूरा करने की अपेक्षा करती है। उदाहरणस्वरूप—यदि किसी कार्यक्रम में किसी देवी-देवता की प्रतिमा लाई जाती है या आशीर्वाद की औपचारिक प्रार्थना होती है, तो सैनिक को ‘‘उपस्थित’’ रहना होता है, ‘‘पूजा’’ करना अनिवार्य नहीं होता। यह अंतर अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि सेना किसी की अंत:करण-स्वतंत्रता का अतिक्रमण नहीं करती। सैनिक चाहे तो मन ही मन अलग विश्वास रख सकता है, पर वह सार्वजनिक रूप से असहमति दिखाकर अनुशासन को चुनौती नहीं दे सकता।
सवाल यह है कि क्या सेना ‘‘उचित समायोजन’’ (Reasonable accommodation) कर सकती है? हाँ, पर इसकी सीमा वही है जहाँ तक वह सामूहिक हितों को प्रभावित न करे। कई बार सैनिकों को उनके धार्मिक त्यौहारों, पूजा-पद्धतियों या आहार-मान्यताओं के अनुसार उचित छूट दी जाती है। सेना में गुरुद्वारा, मंदिर, मस्जिद, चर्च आदि के लिए स्थान भी निर्धारित होते हैं। पर यह ‘‘धर्म-आधारित सुविधाएँ’’ तभी तक संभव हैं जब तक वे ‘‘सेवा के मूल कार्य’’ या ‘‘युद्धक आवश्यकताओं’’ से संघर्ष न करें। यदि किसी व्यक्तिगत आस्था का पालन इकाई की गतिविधियों, युद्ध-तैयारी या आदेशों में अवरोध डालता है, तो उसका समायोजन संभव नहीं होता।
सैन्य अधिकारी के लिए दायित्व और भी अधिक कठोर हो जाते हैं। अधिकारी केवल आदेश का पालन करने वाला सैनिक नहीं होता—उसे दूसरों के लिए उदाहरण बनना होता है। यदि वह स्वयं आदेश मानने से इनकार करता है, और वह भी व्यक्तिगत धार्मिक कारणों का हवाला देकर, तो उसके अधीनस्थों का मनोबल प्रभावित होता है और अनुशासन के टूटने की संभावना बढ़ती है। इसलिए न्यायालय ने इसे ‘‘सबसे गंभीर प्रकार की अनुशासनहीनता’’ माना। न्यायालय ने यह भी कहा कि यदि कोई अधिकारी निजी धार्मिक व्याख्या को सेवा के ऊपर रखता है, तो वह स्पष्ट रूप से यह प्रदर्शित करता है कि वह वर्दी की माँगों के अनुरूप स्वयं को ढालने में असमर्थ है।
धर्म और सैन्य अनुशासन के संबंध में एक और महत्त्वपूर्ण प्रश्न है—क्या ‘‘धार्मिक स्वतंत्रता’’ सैनिक की पहचान है या उसकी प्राथमिक पहचान ‘‘राष्ट्र-सेवक’’ होना है? भारतीय सेना का चरित्र सदैव ‘‘धर्म-निरपेक्ष पेशेवरिता’’ पर आधारित रहा है। सैनिक का प्राथमिक धर्म ‘‘कर्तव्य’’ है—‘‘धर्मनिष्ठा’’ नहीं। इसका अर्थ यह नहीं है कि उसके व्यक्तिगत धार्मिक जीवन को दबा दिया जाए; बल्कि यह है कि वर्दी में रहते हुए उसका धर्म ‘‘राष्ट्र-धर्म’’ बन जाता है। व्यक्तिगत आस्था उसकी निजी सीमा में सुरक्षित रहती है, और सेना यह सुनिश्चित करती है कि कोई भी सैनिक अपने धर्म के कारण न तो उपेक्षित महसूस करे, न ही उसे विशिष्ट विशेषाधिकार मिले।
इस पूरे विषय का सार यह है कि ‘‘व्यक्तिगत धार्मिक भावना’’ और ‘‘सैन्य अनुशासन’’ के बीच संतुलन तो आवश्यक है, पर यह संतुलन सदैव सैन्य आवश्यकताओं के पक्ष में झुकता है। क्यों? क्योंकि सेना की विफलता किसी एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि राष्ट्र को प्रभावित करती है। यदि युद्धभूमि पर कोई सैनिक कहे कि धार्मिक कारणों से वह आदेश का पालन नहीं कर सकता, तो उसके परिणाम घातक हो सकते हैं। इसीलिए सैन्य नेतृत्व और न्यायपालिका, दोनों इस सिद्धांत को दोहराते हैं कि—‘‘वर्दी में रहते हुए व्यक्ति निजी नहीं रहता, वह राष्ट्र का संरक्षक बन जाता है।’’
सेना में धार्मिक आचरण की स्वतंत्रता ‘‘अनुमति-आधारित’’ होती है, ‘‘पूर्ण अधिकार’’ नहीं। यह स्वतंत्रता सेवा-नियमों और संचालन-हितों के अधीन होती है। आवश्यक धार्मिक आचरण का सम्मान किया जा सकता है, पर यदि वही आचरण अनुशासन, आदेश-पालन या इकाई-एकजुटता को क्षति पहुँचाए, तो वह संरक्षित नहीं रहेगा। सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय इसी सिद्धांत को सुदृढ़ करता है—कि सैन्य जीवन में ‘‘धर्म’’ का स्थान है, पर ‘‘धर्म-आधारित अवज्ञा’’ का नहीं।
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि भारतीय सेना अपने सैनिकों की व्यक्तिगत आस्था का सम्मान करती है, उनकी धार्मिक पहचान को संरक्षित भी करती है, और जहाँ तक संभव हो ‘‘उचित समायोजन’’ भी प्रदान करती है। परंतु वह किसी भी परिस्थिति में सेवा-नियमों, आदेशों, रेजिमेंटल परंपराओं और सामूहिक कर्तव्य को व्यक्तिगत धार्मिक तर्कों के कारण कमजोर नहीं होने देती। यही कारण है कि जब आस्था और सैन्य अनुशासन के बीच टकराव की स्थिति उत्पन्न होती है, तो न्यायपालिका और सैन्य नेतृत्व दोनों का रुख स्पष्ट होता है—‘‘राष्ट्रीय सुरक्षा और सैन्य अनुशासन को सर्वोच्च प्राथमिकता प्राप्त है; व्यक्तिगत धार्मिक आचरण उन्हीं सीमाओं के भीतर मान्य है जहाँ तक वह सैन्य सेवा की अनिवार्यताओं से टकराव न पैदा करे।’’





