रविवार दिल्ली नेटवर्क
कार्यस्थल पर मानसिक स्वास्थ्य और समावेश (Inclusion) को अलग-अलग प्राथमिकताओं के रूप में नहीं देखा जा सकता। LGBTQIA+ कर्मचारियों के लिए, कल्याण का सीधा संबंध उनकी पहचान, अपनेपन के अहसास और काम पर अपनी वास्तविक पहचान के साथ रहने की क्षमता से है।
प्रगतिशील संगठन अब यह समझने लगे हैं कि कार्यस्थल पर ‘कल्याण’ का अर्थ केवल सामान्य मानसिक स्वास्थ्य ढांचे तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसमें यह स्वीकार करना आवश्यक है कि लिंग, यौनिकता, अक्षमता या न्यूरोडायवर्सिटी जैसी विभिन्न पहचानें किस तरह एक कर्मचारी के अनुभवों को आकार देती हैं। क्वीर कर्मचारियों के लिए, इसकी शुरुआत मनोवैज्ञानिक सुरक्षा से होती है: यह आश्वासन कि उनके व्यक्तित्व के लिए उनके साथ कोई भेदभाव, पूर्वाग्रह या जजमेंट नहीं होगा। जब लोग सम्मानित महसूस करते हैं, तो तनाव का एक बड़ा कारण दूर हो जाता है, जिससे काम में बेहतर फोकस, आत्मविश्वास और जुड़ाव पैदा होता है।
हालांकि, समावेश कभी भी केवल दिखावटी नहीं होना चाहिए। प्रतीकात्मक संकेत या एक बार के अभियान पर्याप्त नहीं हैं। वास्तविक समावेश को रोज़मर्रा के संगठनात्मक व्यवहार और नीतियों में रचा-बसा होना चाहिए। इसमें पार्टनर्स को स्वास्थ्य लाभ देना, LGBTQIA+ मुद्दों को समझने वाले मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों तक पहुंच प्रदान करना, जेंडर अफर्मेशन के इर्द-गिर्द स्पष्ट नीतियां बनाना और संवाद व शिकायत निवारण के लिए सुरक्षित माध्यम तैयार करना शामिल है। जब ऐसे कदम विचारपूर्वक उठाए जाते हैं, तो वे संकेत देते हैं कि संगठन वास्तव में कर्मचारी के कल्याण को महत्व देता है, न कि विविधता को केवल एक ‘चेकलिस्ट’ की औपचारिकता मानता है।
संगठनों को कभी भी कर्मचारियों पर अपनी यौन प्राथमिकता या लैंगिक पहचान उजागर करने का दबाव नहीं डालना चाहिए। कई क्वीर कर्मचारी कार्यस्थल पर अपनी पहचान निजी रखते हैं, और उनकी गोपनीयता का हमेशा सम्मान किया जाना चाहिए। सहायता प्रणाली और लाभ सभी के लिए उपलब्ध होने चाहिए, चाहे कोई अपनी पहचान सार्वजनिक करे या नहीं। समय के साथ, समावेशी नीतियां और सुरक्षित वातावरण कर्मचारियों को स्वयं के बारे में अधिक साझा करने का आत्मविश्वास दे सकते हैं, लेकिन वह चुनाव पूरी तरह से व्यक्तिगत होना चाहिए।
मनोवैज्ञानिक सुरक्षा कर्मचारियों के जुड़ाव और प्रतिधारण का आधार है। जब क्वीर (Queer) कर्मचारी स्वयं को सुरक्षित और समर्थित महसूस करते हैं, तो वे अपनी पूरी ऊर्जा रचनात्मकता, सहयोग और नवाचार में लगा पाते हैं। जो संगठन भावनात्मक रूप से सुरक्षित कार्यस्थल सुनिश्चित करते हैं, वे न केवल विविध प्रतिभाओं को आकर्षित करते हैं, बल्कि एक समावेशी संस्कृति भी विकसित करते हैं। जहां हर व्यक्ति निडर होकर योगदान देता है, वहां विविध दृष्टिकोण फलते-फूलते हैं, जिससे टीम की कार्यक्षमता और व्यावसायिक परिणाम दोनों सशक्त होते हैं।
भारत में मानसिक स्वास्थ्य केवल व्यक्तिगत विषय नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान से गहराई से जुड़ा है। विशेषकर LGBTQIA+ कर्मचारियों के लिए, कार्यस्थल पर सुरक्षा और स्वीकार्यता का भाव उनके मानसिक कल्याण की नींव है। जो संगठन इस गहरे संबंध को समझते हैं, वे केवल नीतियां नहीं बनाते, बल्कि एक ऐसा मानवीय तंत्र विकसित करते हैं जहाँ हर कर्मचारी अपनी पहचान के साथ सहज महसूस करे। कलंक को मिटाना, खुलकर संवाद करना और विश्वास का माहौल बनाना ही एक समावेशी भविष्य की ओर ले जाने वाले सच्चे कदम हैं।
विकसित भारत 2047 के विज़न को देखते हुए, एक समावेशी कार्यस्थल नीतियों से आगे बढ़कर दीर्घकालिक सांस्कृतिक बदलाव पर ध्यान केंद्रित करता है। यहां नेतृत्व (लीडरशिप) एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जब नेता सक्रिय रूप से सहयोग और समर्थन खी भावना प्रदर्शित करते हैं, समावेश की पहल में भाग लेते हैं, और अपनी संवेदनशीलता दिखाते हैं, तो वे विश्वास और अपनेपन पर आधारित एक बेहतर माहौल बनाने में मदद करते हैं।
आखिरकार, समावेशी और मानसिक रूप से स्वस्थ कार्यस्थल बनाना एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है। इसके लिए लगातार सुनना, फीडबैक से सीखना और समय के साथ बदलाव करना ज़रूरी है। समावेश और सेहत को अपने मुख्य मूल्यों में शामिल करके, संगठन ऐसी मज़बूत संस्कृति बना सकते हैं, जो व्यक्तियों को सपोर्ट करे, टीमों को मज़बूत करे, और ज़्यादा न्यायसंगत समाज में योगदान दे।





