भीड़ और प्रदूषण ने बढ़ाई पहाड़ों की मुश्किलें

Crowd and pollution increased the problems of the mountains

मुनीष भाटिया

भारत की पहचान उसकी भौगोलिक विविधता और सांस्कृतिक संपन्नता में निहित है। हिमालय की ऊँचाइयों से लेकर अरावली और विंध्य की पहाड़ियों तक, हमारे देश के पर्वतीय क्षेत्र प्राकृतिक सौंदर्य, धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक धरोहर के केंद्र रहे हैं। यही कारण है कि लाखों-करोड़ों लोग हर साल इन स्थलों की ओर आकर्षित होते हैं। कभी कोई पर्यटक शांति और सौंदर्य की तलाश में निकलता है तो कोई तीर्थयात्री आस्था और आध्यात्मिक संतोष पाने के लिए। लेकिन बीते कुछ वर्षों में जिस तरह इन स्थानों पर भीड़ का दबाव बढ़ा है, उसने प्रकृति के संतुलन को गहराई से प्रभावित किया है। पर्यटन और तीर्थयात्रा का यह अनियंत्रित प्रवाह अब केवल धार्मिक-आध्यात्मिक ही नहीं, बल्कि पर्यावरणीय संकट का रूप लेता जा रहा है।

हिमालय और अन्य पर्वतीय क्षेत्र अपने नाजुक भूगर्भीय ढांचे के लिए जाने जाते हैं। यहां की चट्टानें और मिट्टी मैदानी इलाकों की तुलना में कहीं अधिक संवेदनशील हैं। जब लाखों लोग एक साथ यहां आते हैं, तो न केवल मानव दबाव बढ़ता है, बल्कि उनके ठहरने, खाने-पीने और यात्रा करने की व्यवस्था के लिए बड़े पैमाने पर निर्माण भी करना पड़ता है। अक्सर यह देखा गया है कि भीड़ बढ़ने के साथ ही भूस्खलन की घटनाएँ तेज हो जाती हैं। हाल ही में वैष्णो देवी मार्ग पर भीड़ बढ़ने से हादसे हुए। मणिमहेश, बद्रीनाथ, केदारनाथ और अमरनाथ जैसे तीर्थस्थलों पर भी कई बार भारी भीड़ दुर्घटनाओं का कारण बनी है। यह मानो प्रकृति की चेतावनी हो कि वह अपनी सहनशक्ति से अधिक भार नहीं उठा सकती।

भीड़ के दबाव को संभालने के लिए होटलों, रेस्तरां, दुकानों और पार्किंग स्थलों का निर्माण किया जाता है। ये निर्माण अक्सर पहाड़ों की प्राकृतिक ढलानों को काटकर किए जाते हैं। सड़क मार्ग चौड़े करने के लिए हजारों पेड़ काटे जाते हैं।

परिणामस्वरूप, पहाड़ों की संरचना कमजोर होती जाती है और बारिश के मौसम में छोटी-सी हलचल भी बड़े भूस्खलन में बदल जाती है। पर्यटकों की सुविधा के नाम पर लगातार वनों की कटाई हो रही है। यह न केवल जैव विविधता को खत्म कर रही है, बल्कि स्थानीय लोगों के जीवन को भी प्रभावित कर रही है। जंगलों के घटने से जंगली जानवरों का प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहा है और वे मानव बस्तियों की ओर रुख करने लगे हैं।

भीड़ का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव प्रदूषण के रूप में सामने आता है। लाखों लोग इन स्थलों पर पानी की बोतलें, पैकेटबंद खाद्य पदार्थ और अन्य प्लास्टिक सामग्री साथ लाते हैं। पर्वतीय इलाकों में प्लास्टिक नष्ट नहीं होता, बल्कि नदी-नालों में जमा होकर उन्हें गंदा करता है। गंगा, यमुना, झेलम और ब्यास जैसी नदियाँ पवित्र मानी जाती हैं, लेकिन आज इन पर इतना दबाव है कि इनका जल प्रदूषित होता जा रहा है। तीर्थयात्री स्नान करते हैं, पूजा सामग्री प्रवाहित करते हैं और साथ ही कचरा भी बहा देते हैं। वाहनों की संख्या इतनी बढ़ गई है कि छोटे-छोटे पहाड़ी कस्बों में भीषण जाम लग जाते हैं। डीजल वाहनों से निकलने वाला धुआँ वायु प्रदूषण तो बढ़ाता ही है, साथ ही बर्फ़ और ग्लेशियरों को भी प्रभावित करता है।

पर्वतीय स्थलों का धार्मिक महत्व उन्हें और अधिक संवेदनशील बनाता है। कुंवारी देवी, वैष्णो देवी, केदारनाथ, बद्रीनाथ और अमरनाथ जैसे स्थानों पर लाखों श्रद्धालु हर साल पहुँचते हैं। यह आस्था का प्रतीक तो है, लेकिन जब यह यात्रा अनियंत्रित भीड़ का रूप ले लेती है, तब इससे प्रकृति पर भारी दबाव पड़ता है। इन यात्राओं को व्यापार का अवसर मानकर बड़े पैमाने पर होटल, लॉज और बाजार बना दिए जाते हैं। स्थानीय लोग तो कुछ हद तक लाभान्वित होते हैं, लेकिन असंतुलित और बिना योजना के विकास अंततः नुकसान ही करता है।

भीड़ का दबाव केवल पर्यावरण को ही नहीं, बल्कि स्थानीय समाज और संस्कृति को भी प्रभावित करता है। पर्यटकों की भारी संख्या से स्थानीय लोगों के संसाधन जैसे पानी, बिजली और ईंधन पर दबाव बढ़ता है। कई बार स्थानीय निवासियों को ही पानी की कमी झेलनी पड़ती है। व्यवसायीकरण और बाहरी प्रभावों से पारंपरिक संस्कृति बदलने लगती है। उदाहरण के लिए, स्थानीय हस्तशिल्प या भोजन की जगह प्लास्टिक से बने उत्पाद और फास्ट फूड हावी होने लगते हैं। कई लोग तीर्थयात्रा को अब केवल एक पर्यटन गतिविधि के रूप में लेने लगे हैं। इससे धार्मिक स्थलों की पवित्रता भी प्रभावित होती है।

समस्या का समाधान के लिए सरकार, स्थानीय प्रशासन और आम नागरिकों की संयुक्त जिम्मेदारी बनती है। हर स्थल की क्षमता के अनुसार प्रतिदिन या प्रति वर्ष आने वाले यात्रियों की सीमा तय की जानी चाहिए। जैसे अमरनाथ यात्रा में पंजीकरण की अनिवार्यता की गई है, वैसे ही अन्य स्थलों पर भी कदम उठाने होंगे। नए होटल या पार्किंग स्थल तभी बनें जब वे पर्यावरणीय मानकों पर खरे उतरें। स्थानीय वास्तुकला और पारंपरिक सामग्रियों का उपयोग प्रोत्साहित किया जाए। प्रत्येक निर्माण कार्य के साथ वृक्षारोपण को अनिवार्य बनाया जाए और स्थानीय समुदाय को इसमें भागीदार बनाना होगा।

पर्वतीय क्षेत्रों में एकल-उपयोग प्लास्टिक पर सख्ती से प्रतिबंध लगाया जाए। इसके बदले बायोडिग्रेडेबल और पुन: प्रयोज्य सामग्री का उपयोग बढ़ावा दिया जाए। तीर्थयात्रियों और पर्यटकों को यह समझाना होगा कि यात्रा केवल दर्शन या मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि प्रकृति से जुड़ने का अवसर भी है। ‘स्वच्छ यात्रा, सुरक्षित यात्रा’ जैसे अभियान लगातार चलाए जाने चाहिए। जब तक स्थानीय लोग इसमें शामिल नहीं होंगे, तब तक सुधार संभव नहीं है। उन्हें पर्यावरण संरक्षण का हितैषी और पर्यटन प्रबंधन का भागीदार बनाना होगा।

पर्वतीय स्थल हमारी प्राकृतिक धरोहर हैं। ये केवल पर्यटन स्थल या धार्मिक आस्था के केंद्र ही नहीं, बल्कि जीवनदायिनी नदियों, जंगलों और जैव विविधता के स्रोत भी हैं। यदि हमने अनियंत्रित भीड़ और व्यावसायिक स्वार्थ के कारण इनका संतुलन बिगाड़ दिया, तो आने वाली पीढ़ियाँ न तो इन स्थलों की पवित्रता देख पाएँगी और न ही प्रकृति का सौंदर्य अनुभव कर पाएँगी। समय रहते हमें यह समझना होगा कि तीर्थयात्रा और पर्यटन केवल सुविधा या मनोरंजन का विषय नहीं, बल्कि प्रकृति और आस्था दोनों की रक्षा करने की जिम्मेदारी है। यदि हम सचमुच इन स्थलों को पवित्र मानते हैं, तो हमें उनका संरक्षण भी उतना ही पवित्र कर्तव्य समझना होगा।