काँटों का ताज: भाजपा के सबसे युवा अध्यक्ष नितिन नवीन की सबसे कठिन अग्निपरीक्षा

Crown of Thorns: The toughest test for BJP's youngest president, Nitin Naveen

निलेश शुक्ला

जब भारतीय जनता पार्टी ने सर्वसम्मति से नितिन नवीन को अपना राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना, तो इसे संगठन की एक सहज, अनुशासित और ऐतिहासिक प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत किया गया। नितिन नवीन भाजपा के इतिहास में सबसे कम उम्र के अध्यक्ष बने—यह अपने आप में संकेत था कि पार्टी अब नेतृत्व की पीढ़ीगत बदलाव की दिशा में आगे बढ़ रही है। लेकिन राजनीति में पद से अधिक महत्वपूर्ण होता है उसका समय और उसकी ज़िम्मेदारी। यह पद सत्ता का सिंहासन नहीं, बल्कि जवाबदेही का कठोर मंच है। नितिन नवीन ने सुविधा का ताज नहीं पहना है, उन्होंने काँटों का ताज पहना है।

उनकी नियुक्ति का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि वे संगठनात्मक रूप से सर्वोच्च पद पर हैं, लेकिन व्यवहारिक राजनीति में वे आदेश देने की स्थिति में नहीं होंगे। वे अपने वरिष्ठों को निर्देश नहीं देंगे, बल्कि वरिष्ठ नेतृत्व से निर्देश लेंगे। भाजपा का संगठनात्मक ढांचा सामूहिक निर्णय, अनुशासन और अनुभव की वरिष्ठता पर आधारित है। दशकों की राजनीतिक तपस्या से गुज़रे नेता स्वाभाविक रूप से निर्णय प्रक्रिया को दिशा देते रहेंगे। ऐसे में नितिन नवीन की भूमिका किसी शासक से अधिक एक समन्वयक, मध्यस्थ और संगठनात्मक संतुलन साधने वाले नेता की होगी।

सर्वसम्मति से चुना जाना जितना बड़ा सम्मान है, उतना ही बड़ा जोखिम भी। जब कोई गुट नहीं होता, तो बहाना भी नहीं होता। न तो आंतरिक विरोध का हवाला दिया जा सकता है, न ही किसी दबाव समूह को दोष दिया जा सकता है। हर सफलता पार्टी की होगी, लेकिन हर असफलता सीधे अध्यक्ष के खाते में जाएगी। राजनीति में सर्वसम्मति अक्सर सुरक्षा कवच नहीं, बल्कि जवाबदेही की तलवार बन जाती है।

नितिन नवीन की नियुक्ति ऐसे समय पर हुई है जब भाजपा एक अत्यंत निर्णायक चुनावी चक्र में प्रवेश कर रही है। वर्ष 2026 और 2027 के बीच देश के 9 से 10 राज्यों में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं, जिनमें उत्तर प्रदेश सबसे महत्वपूर्ण है। यह चुनाव केवल सत्ता के लिए नहीं, बल्कि संगठन, शासन और नेतृत्व की विश्वसनीयता की परीक्षा होंगे। उत्तर प्रदेश भाजपा का गढ़ है, उसका वैचारिक और राजनीतिक केंद्र भी। यहां जीत पार्टी की राष्ट्रीय कहानी को मजबूत करेगी, जबकि कमजोरी पूरे देश में संकेत दे सकती है।

दो कार्यकाल पूरे कर चुकी सरकार के सामने स्वाभाविक रूप से एंटी-इन्कम्बेंसी, बढ़ती अपेक्षाएं और बदलते सामाजिक समीकरण हैं। अब चुनाव केवल नारों से नहीं जीते जाते, इसके लिए बूथ स्तर तक सटीक रणनीति, सामाजिक संतुलन और टिकट वितरण में अनुशासन चाहिए। पार्टी अध्यक्ष के रूप में नितिन नवीन से अपेक्षा होगी कि संगठन की मशीनरी बिना घर्षण के चले।

यहीं पर ‘काँटों का ताज’ वास्तविक अर्थ ग्रहण करता है। हर निर्णय दर्द देगा, हर चूक चुभेगी। वरिष्ठ नेताओं और उभरते चेहरों के बीच संतुलन बनाना, युवाओं को अवसर देते हुए अनुभवी नेतृत्व को साथ रखना, अनुशासन लागू करते हुए तानाशाही का आरोप न झेलना—ये सभी चुनौतियाँ एक साथ सामने होंगी।

भाजपा अब संघर्षशील पार्टी नहीं रही। वह सत्ता में है, प्रभुत्व में है। लेकिन प्रभुत्व अपने साथ अपेक्षाएं, असंतोष और अधीरता भी लाता है। कार्यकर्ता टिकट चाहते हैं, नेता प्रभाव चाहते हैं, सहयोगी दल सौदेबाज़ी चाहते हैं और मतदाता परिणाम। इन सभी दबावों का पहला और अंतिम पड़ाव पार्टी अध्यक्ष ही होता है।

इसके अलावा, भाजपा आज नरेंद्र मोदी के विराट नेतृत्व की छाया में काम करती है। प्रधानमंत्री पार्टी का सबसे बड़ा चुनावी चेहरा हैं, लेकिन इसका अर्थ यह भी है कि संगठनात्मक नेतृत्व अक्सर पर्दे के पीछे रहता है। नितिन नवीन को संगठन को मज़बूत करना होगा, बिना केंद्रीय नेतृत्व के साथ टकराव या प्रतिस्पर्धा का आभास दिए—यह संतुलन आसान नहीं है।

उनकी उम्र जहां एक ओर ताज़गी और नई सोच का प्रतीक है, वहीं दूसरी ओर अनुभव की कमी का आरोप भी बन सकती है। भाजपा में अनुभव केवल वर्षों से नहीं, बल्कि संघर्ष से मापा जाता है—आपातकाल, संगठन विस्तार, वैचारिक प्रशिक्षण। वरिष्ठ नेता समर्थन करेंगे, लेकिन निगाहें भी रखेंगी। हर गलती को अनुभवहीनता से जोड़ा जाएगा।

फिर भी, यही युवा अध्यक्ष होने का अवसर भी है। वे नई पीढ़ी के मतदाताओं की भाषा समझ सकते हैं, डेटा आधारित राजनीति, आधुनिक संचार और पेशेवर अभियान चला सकते हैं। यदि वे सफल होते हैं, तो वे भाजपा में नेतृत्व की नई परिभाषा गढ़ सकते हैं—व्यक्ति नहीं, संस्था आधारित नेतृत्व।

लेकिन भाजपा की असली ताकत अब भी उसका जमीनी कार्यकर्ता है। बार-बार चुनाव लड़ते हुए कार्यकर्ताओं की ऊर्जा बनाए रखना, बिना उन्हें अधिकार का भ्रम दिए, सबसे कठिन काम है। थकान एक वास्तविक चुनौती है। अध्यक्ष को इस मनोविज्ञान को समझना होगा।

गठबंधन राजनीति भी आने वाले वर्षों में बड़ी चुनौती होगी। कई राज्यों में जीत सहयोगियों पर निर्भर है। सीट बंटवारा ऐसा हो कि जीत सुनिश्चित हो, लेकिन पार्टी का आधार न कमजोर पड़े। हर समझौता भीतर असंतोष पैदा करेगा, हर सख्ती नुकसान का जोखिम लाएगी।

विपक्ष भी अब अधिक संगठित और आक्रामक है। मुद्दों, सामाजिक विभाजनों और कथाओं की लड़ाई तेज़ होगी। पार्टी अध्यक्ष को यह सुनिश्चित करना होगा कि भाजपा की आवाज़ एकरूप, अनुशासित और जवाबदेह बनी रहे।

अंततः नितिन नवीन का मूल्यांकन भाषणों से नहीं, नतीजों से होगा। क्या पार्टी अपने गढ़ बचा पाई? क्या नए क्षेत्र जोड़े? क्या नेतृत्व परिवर्तन सुचारू रहा? क्या संगठन बिखरने से बचा? राजनीति में ये सवाल निर्मम होते हैं।

भाजपा के इतिहास में अध्यक्ष अक्सर खामोशी से काम करते हैं और परिणामों से पहचाने जाते हैं। यहां सहानुभूति नहीं, केवल गणना होती है। सफलता उन्हें भविष्य का बड़ा नेता बना सकती है, असफलता उन्हें सबसे आसान बलि का बकरा।

इस अर्थ में, यह पद सम्मान नहीं, परीक्षा है। अधिकार बिना पूर्ण शक्ति के, ज़िम्मेदारी बिना स्वतंत्रता के, अपेक्षाएं बिना गारंटी के—यही नितिन नवीन की वास्तविक स्थिति है। ताज उनके सिर पर है, लेकिन काँटे पहले ही चुभने लगे हैं।

अब यह देखना है कि नितिन नवीन इन काँटों से रास्ता बनाते हैं या उसी में उलझ जाते हैं। आने वाले विधानसभा चुनाव केवल भाजपा की परीक्षा नहीं हैं, वे भाजपा के सबसे युवा अध्यक्ष की व्यक्तिगत अग्निपरीक्षा हैं।