
लोकतंत्र में असहमति और आलोचना आवश्यक हैं, लेकिन जब यह अभद्रता और घृणा का रूप ले लेती है, तो समाज की आत्मा को चोट पहुँचती है। नेताओं द्वारा अपशब्दों और व्यक्तिगत हमलों का प्रयोग लोकतंत्र की गरिमा के लिए घातक है। स्वस्थ लोकतंत्र के लिए राजनीतिक संवाद में शिष्टता, संयम और सम्मान अनिवार्य हैं। वैचारिक मतभेद स्वीकार किए जा सकते हैं, पर भाषा और व्यवहार की मर्यादा बनाए रखना ही लोकतंत्र की आत्मा को जीवित रखता है। राजनेताओं को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके शब्द समाज को बांटे नहीं, बल्कि जोड़ें और प्रेरित करें।
डॉ प्रियंका सौरभ
लोकतंत्र केवल बहुसंख्यक मतदान और शासन प्रणाली तक सीमित नहीं है। यह समाज की सोच, नैतिकता, संवाद की गुणवत्ता और व्यक्तिगत आचरण का प्रतिबिंब भी है। लोकतंत्र में असहमति और आलोचना का होना स्वाभाविक है, क्योंकि यह समाज को सतत सुधार और विकास की ओर प्रेरित करता है। लेकिन जब असहमति अभद्रता, कटुता और घृणा के रूप में प्रकट होने लगे, तब यह केवल राजनीतिक बहस नहीं रह जाती; यह समाज की आत्मा पर चोट पहुँचाती है।
वर्तमान समय में हम देख रहे हैं कि राजनीतिक संवाद का स्तर लगातार गिर रहा है। नेताओं के भाषणों में पहले की अपेक्षा अधिक व्यक्तिगत आरोप, अपमानजनक टिप्पणियाँ और कटु शब्दावली का प्रयोग हो रहा है। यह केवल राजनीतिक असहमति का विस्तार नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र की गरिमा के लिए गंभीर खतरा बन चुका है। लोकतंत्र के मूल मूल्य में शामिल है—विचारों का सम्मान, विरोधियों के प्रति सहिष्णुता और संवाद की मर्यादा। जब ये मूल्य अनदेखा किए जाते हैं, तो समाज में असंतुलन और सामाजिक कट्टरता की स्थिति उत्पन्न होती है।
एक महिला होने के नाते यह अत्यंत पीड़ादायक है कि राजनीतिक भाषणों में महिलाओं के प्रति अपमानजनक और अभद्र टिप्पणियाँ की जाती हैं। यह केवल व्यक्तिगत हमला नहीं है, बल्कि यह समाज के नैतिक ताने-बाने पर भी चोट है। किसी भी ज़िम्मेदार नेता द्वारा अशोभनीय और असंसदीय विशेषणों का प्रयोग लोकतंत्र और उसकी गरिमा के लिए घातक होता है। नेताओं को यह समझना होगा कि उनके शब्द केवल उनके समर्थकों तक सीमित नहीं रहते; उनका प्रभाव समाज के हर वर्ग और पीढ़ी पर पड़ता है।
इतिहास हमें यह सिखाता है कि राजनीति में गरिमा और शालीनता बनाए रखने से ही समाज स्थिर और सभ्य रहता है। देश ने अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे नेताओं को देखा है, जिनके समय में राजनीतिक असहमति के बावजूद संवाद का स्तर उच्च रहा। वे अपने विपक्षियों का सम्मान करते थे, वैचारिक मतभेद होने पर भी व्यक्तिगत अपशब्दों का प्रयोग नहीं करते थे। उनका आदर्श यही था कि राजनीति का उद्देश्य केवल सत्ता नहीं, बल्कि समाज को शिक्षित, संगठित और सुसंस्कृत बनाना भी है। आज जब हम उनके दौर से तुलना करते हैं, तो यह स्पष्ट होता है कि वर्तमान में राजनीतिक संवाद अपने नैतिक और सांस्कृतिक मूल्यों से बहुत दूर चला गया है।
भाषा केवल शब्दों का समूह नहीं है। यह विचारों का माध्यम, संस्कारों का प्रतिबिंब और सामाजिक दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति है। जब भाषा अशोभनीय और अपमानजनक हो जाती है, तो यह न केवल व्यक्तियों को अपमानित करती है, बल्कि समाज में आपसी विश्वास और सहयोग की भावना को भी कमजोर करती है। असहमति का अर्थ यह नहीं कि विरोधी के प्रति घृणा व्यक्त की जाए। असहमति का अर्थ यह है कि आप अपने विचार स्पष्ट करें, लेकिन सम्मान, सहिष्णुता और तर्क की मर्यादा बनाए रखें।
आज की राजनीति में अपशब्दों और अभद्रता की प्रवृत्ति का सबसे बड़ा खतरा यह है कि यह समाज में नई पीढ़ी के लिए उदाहरण स्थापित करती है। जब युवा नेताओं और समर्थकों के संवाद में अशोभनीय भाषा का प्रयोग देखेंगे, तो वे इसे सामान्य मानने लगेंगे। यह समाज की नैतिक पतन की ओर पहला कदम है। ऐसे में आवश्यक है कि हम राजनीतिक नेताओं से अपेक्षा करें कि वे अपने भाषणों और व्यवहार में मर्यादा का पालन करें। लोकतंत्र केवल कानून और संविधान तक सीमित नहीं; यह समाज की नैतिक चेतना और मूल्य प्रणाली पर भी आधारित है।
राजनीति में गरिमा बनाए रखने का अर्थ केवल विरोधियों का सम्मान करना ही नहीं है, बल्कि यह अपने समर्थकों और अनुयायियों के लिए भी नैतिक मार्गदर्शन करना है। जब नेता शालीन भाषा का प्रयोग करते हैं, तो वह समाज में एक सकारात्मक वातावरण का निर्माण करता है। यह वातावरण विभिन्न विचारों, मतभेदों और बहस के लिए सुरक्षित मंच प्रदान करता है। इसके विपरीत, अशोभनीय और अपमानजनक भाषा समाज में भय, द्वेष और असहमति को बढ़ाती है।
संपूर्ण लोकतंत्र के लिए यह आवश्यक है कि नेताओं में नैतिक चेतना और शब्दों की शक्ति की समझ विकसित हो। शब्द केवल माध्यम नहीं हैं; ये समाज की सोच, संस्कृति और भविष्य को आकार देते हैं। यदि राजनीतिक नेतृत्व अपने शब्दों की गंभीरता को समझे और संवाद में मर्यादा बनाए रखे, तो समाज में सम्मान, शांति और सहयोग की भावना स्वाभाविक रूप से विकसित होगी।
भले ही राजनीति में मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन व्यक्तिगत हमलों और अपशब्दों के बिना असहमति को व्यक्त किया जा सकता है। इसके लिए नेतृत्व को अपनी भाषा की संवेदनशीलता और प्रभाव को समझना होगा। लोकतंत्र में असहमति के लिए जगह हमेशा होनी चाहिए, लेकिन वह सम्मानजनक और सभ्य होनी चाहिए। यह प्रक्रिया समाज में न्याय, समानता और मानवता के मूल्यों को मजबूत करती है।
साथ ही, राजनीतिक संवाद में महिलाओं के प्रति सम्मान बनाए रखना अत्यंत महत्वपूर्ण है। राजनीति केवल पुरुषों का क्षेत्र नहीं है; समाज की आधी शक्ति महिलाओं में है। जब राजनीति में महिलाओं के प्रति अभद्र भाषा प्रयोग होती है, तो यह समाज के बड़े हिस्से को चोट पहुँचाती है। महिलाओं की गरिमा और सम्मान का ध्यान रखना न केवल नैतिक दायित्व है, बल्कि यह लोकतंत्र के मूल्यों की रक्षा भी करता है।
हमारे समाज ने देखा है कि जब नेता मर्यादित भाषा का प्रयोग करते हैं, तो समाज में सकारात्मक परिवर्तन आता है। यह परिवर्तन केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक, नैतिक और सांस्कृतिक रूप में भी होता है। भाषा की गरिमा बनाए रखने से युवा पीढ़ी सही मूल्य और नैतिक दृष्टिकोण सीखती है। इसके विपरीत, अपशब्दों और अभद्रता की प्रवृत्ति समाज में हिंसा, द्वेष और असहमति को जन्म देती है।
इसलिए, अब समय आ गया है कि राजनीति में फिर से शिष्टता, गरिमा और सम्मानजनक भाषा का पुनर्जागरण हो। नेताओं को अपने भाषणों और सार्वजनिक संवाद में संयम, विवेक और शालीनता बनाए रखना होगा। यह केवल राजनीतिक नैतिकता की आवश्यकता नहीं, बल्कि यह लोकतंत्र और समाज की आत्मा की रक्षा का माध्यम भी है।
लोकतंत्र में स्वस्थ संवाद के बिना समाज का विकास असंभव है। राजनीतिक असहमति को अभद्रता में बदलने की प्रवृत्ति समाज को कमजोर करती है। अतः सभी राजनीतिक दलों, नेताओं और समाज के जागरूक नागरिकों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि भाषा और संवाद का स्तर उच्च बना रहे। यह केवल शब्दों का संघर्ष नहीं, बल्कि समाज की नैतिकता, संस्कार और लोकतांत्रिक मूल्य संरचना की रक्षा है।
अंततः, लोकतंत्र केवल कानून और संविधान तक सीमित नहीं है। यह समाज की नैतिक चेतना, संवाद की शालीनता और नेतृत्व की जिम्मेदारी पर भी आधारित है। जब राजनीतिक भाषा गरिमामय होगी, तभी लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति और समाज की एकता सुरक्षित रह सकेगी। आज समय है कि हम सब मिलकर राजनीति में भाषा की गरिमा की पुनर्स्थापना करें, ताकि लोकतंत्र की आत्मा स्वस्थ और समाज का भविष्य उज्जवल बना रहे।