देश के सभी जिला अस्पतालों में समर्पित टाइप-1 डायबिटीज क्लीनिक स्थापित किए जाए

Dedicated Type-1 diabetes clinics should be established in all district hospitals of the country

तकनीकी विशेषज्ञ समूह की सदस्य डॉ.स्मिता जोशी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लिखा पत्र

गोपेन्द्र नाथ भट्ट

नई दिल्ली : केन्द्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा “विकसित भारत @2047” के दृष्टिकोण को साकार करने और स्वास्थ्य संवर्धन के सम्बन्ध में अपनी सिफारिशें, विशेषज्ञता, मार्गदर्शन और विशेष सुझाव देने के लिए गठित तकनीकी विशेषज्ञ समूह की सदस्य डॉ.स्मिता जोशी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को एक पत्र लिख कर भारत में बच्चों और किशोरों में व्याप्त गंभीर मधुमेह रोग के समुचित उपचार एवं जागरूकता के लिए गुजरात एवं राजस्थान राज्यॉ की तरह देश के अन्य सभी प्रदेशों के सभी जिला अस्पतालों में भी बच्चों और किशोरों के लिए समर्पित टाइप-1 डायबिटीज क्लीनिक स्थापित करने के लिए यथोचित निर्देश जारी कराने का आग्रह किया है ।

डॉ जोशी ने पत्र में लिखा हैंकि देश के दो राज्यों गुजरात और राजस्थान ने एनसीडी क्लीनिकों के साथ अपने राज्य के सभी जिला अस्पतालों में समर्पित टाइप-1 डायबिटीज क्लीनिक स्थापित करने की पहल की हैं तथा राज्य के बजट में इसके लिए विशेष वित्तीय प्रावधान की घोषणा भी की गई हैं ।

उन्होंने लिखा कि देश के अन्य प्रदेशों के जिला अस्पतालों में भी समर्पित टाइप-1 डायबिटीज क्लीनिक स्थापित होने से टाइप-1 मधुमेह से पीड़ित असंख्य बच्चों और किशोरों की सही ढंग से देखभाल हों सकेगी और वे भी अन्य बच्चों की तरह स्वस्थ जीवन जी सकेंगे, जिसके सही अर्थों में वे भी हकदार हैं ।

डॉ.स्मिता जोशी ने प्रधानमंत्री को पत्र में लिखा है कि 0-18 वर्ष उम्र के बच्चों और किशोरों में तेजी से फ़ैल रहा गंभीर मधुमेह (टाइप-1 जुवेनाइल डायबिटीज) रोग वर्तमान में एक वैश्विक स्वास्थ्य चुनौती बन गया है। विशेष कर भारत में बच्चों और किशोरों में इस गंभीर रोग की संख्या पूरे विश्व में सबसे अधिक हैं । भारत के बाद अमरीका दूसरे नम्बर पर हैं,जहाँ डायबिटीज से पीड़ित बच्चों और किशोरों की संख्या सबसे अधिक हैं।

उन्होंने बताया कि दुर्भाग्य से इस समय भारत में चलाये जा रहें किसी भी राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रम में बच्चों और किशोरों में होने वाले टाइप-1 मधुमेह जुवेनाइल डायबिटीज का इलाज और पूर्व निदान शामिल नहीं हैं । वर्तमान में हमारे राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रम (एनपीसीडीसीएस) 30 वर्ष से अधिक आयु वर्ग के लोगों पर ही पूरा ध्यान केंद्रित करते है। इस प्रकार टाइप-1 मधुमेह से पीड़ित बच्चे और किशोर (0-18 वर्ष) इस गंभीर रोग की प्रारंभिक जांच और प्रबंधन के लिए किसी भी राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रम में शामिल नहीं हैं।

टाइप-1 मधुमेह जुवेनाइल डायबिटीज के अंतर्गत बच्चों में बचपन से ही,शरीर में इंसुलिन का उत्पादन अचानक बंद हो जाने से उन्हें जीवन भर इंसुलिन के इंजेक्शन पर निर्भर होने के लिए मजबूर होना पड़ता हैं । आमतौर पर उन्हें एक दिन में 3 से 4 बार पीड़ादायक इंसुलिन लेना पड़ता हैं । भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में सामान्य लोगों के लिए इस प्रकार का महंगा इलाज लेना बहुत कठिन हैं ।

हमारे देश में अमरीका जैसी पीड़ा रहित इंसुलिन के इंजेक्शन लेने की तकनीक भी विकसित नहीं हुई हैं । इस कारण टाइप-1 डायबिटीज़ से पीड़ित परिवारों विशेष कर समाज के पिछड़े,गरीब और वंचित समुदायों के बच्चों को अक्सर भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इन बच्चों और किशोरों के परिवारजन रोजाना इंसुलिन इंजेक्शन और किट्स के लिए अपने जेब से महंगे इलाज का खर्च करने के लिए संघर्ष करते हैं और इसका सबसे दुःखद पहलू यह हैं कि अपर्याप्त देखभाल,जागरूकता और इलाज के अभाव से इनमें से कई बच्चे असमय मौत के शिकार हो जाते हैं।

उल्लेखनीय है कि डॉ.स्मिता जोशी, गुजरात के डॉ.वासुदेव जे.रावल चैरिटेबल ट्रस्ट मेहसाणा द्वारा गठित भारत में टाइप-1 मधुमेह जागरूकता और वकालत टीम की मुखिया भी है । टीम में डॉ.शुक्ला रावल, डॉ.राजा जोशी एवं डॉ.मन पंचोली आदि सदस्य हैं । इस टीम ने बच्चों और किशोरों में मधुमेह के प्रति जागरूकता पैदा करने के लिए अपने स्वयं के खर्चे पर भारत में कश्मीर से कन्या कुमारी तथा अमरीका में ईस्ट से वेस्ट कोर्स तक सात हजार किमी से भी अधिक लम्बी यात्राएँ कर कई राजनेताओं, अधिकारियों, सामाजिक संगठनों एवं संस्थाओं के प्रतिनिधियों से भेंट करने के साथ ही कई स्वास्थ्य शिविरों और सेमिनारों में भाग लिया हैं।