ऋतुपर्ण दवे
अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और बांकी अन्य 23 अभियुक्तों को शराब घोटाले के मामले में अदालत ने डिस्चार्ज कर दिया। जब अदालत को लगता है कि चार्जशीट में कई खामियां हैं जिनका समर्थन किसी गवाह या बयान से नहीं होता और प्रथम जिन धाराओं में मुकदमा चलना चाहिए, वो न हों तो अभियुक्तों को डिस्चार्ज भी किया जा सकता है। जबकि अदालत सभी गवाहों के बयान और बचाव पक्ष के सारे सबूत देख कर, किसी अभियुक्त को निर्दोष करार देती है, तो बरी करना कहलाता है। राउज एवेन्यू कोर्ट ने देश की सर्वोच्च जांच एजेंसी केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो यानी सीबीआई द्वारा रखे सबूतों को न केवल कमजोर बल्कि बेहद नाकाफी माना। इस फैसले को लेकर पूरे देश में एक नई बहस शुरू हो गई। सीबीआई और ईडी के कामकाज के तौर तरीकों पर हमेशा से उंगली उठती रही। बड़ी जांच एजेंसियों की छवि पर भी बड़ा सवाल है। निश्चित रूप से इसके राजनीतिक मायने भी निकाले जा रहे हैं जो झलकता भी है। आम आदमी पार्टी पर दर्ज मामलों के पीछे राजनीतिक विद्वेष समझ आने लगा है। लोगों के जेहन में था, है और फिर कौंधगा कि क्या जानबूझकर ऐसे मामले राजनीतिक पूर्वाग्रहवश दर्ज किए जाते हैं?
पूरे मामले को देखने-समझने से ऐसा प्रतीत होता है कि आरोपियों के खिलाफ आरोपों का कोई ठोस आधार नहीं था बल्कि प्रस्तुत आरोप पत्र (चार्ज शीट) में जबरदस्त खामियां और विरोधाभास भी था। अब मामला भले ही राजनीतिक प्रतिद्वन्दिता का हो, देश की सबसे बड़ी और विश्वनीय समझे जाने वाली जांच एजेंसी को शामिल करने से कामकाज पर फिर उंगली उठ गई। ऐसा पहली बार भी नहीं है और न आखिरी बार होगा। दिल्ली की बहुचर्चित शराब नीति से जुड़े मामले में आए फैसले को बड़ा और अहम माना जा रहा है। इसने स्पष्ट किया कि महज दावों से काम नहीं चलेगा। आरोपों पर भरोसे के साथ में ठोस और पर्याप्त सबूत हों, जो नहीं थे। अदालत ने कई बार कहा कि जांच एजेंसी की ओर से प्रस्तुत सबूत काफी कमजोर और अपर्याप्त हैं। बरी होने के क्रम में सबसे पहले कुलदीप सिंह, जो आबकारी विभाग में कमिश्नर रहे उन्हें, फिर मनीष सिसोदिया और उनके बाद अरविंद केजरीवाल डिस्चार्ज किए गए।
चार्जशीट खामियों से भरी थीं जिससे सवाल उठता है कि क्या जांच एजेंसी पर दबाव था? जांच एजेंसी को पता था कि आरोपों में दम नहीं है और सबूत नाकाफी है तो जल्दबाजी में बिना अध्ययन, चार्जशीट क्यों प्रस्तुत की गई। यह तो समझ आता है कि मामले के जांचकर्ताओं ने बेमन से केवल औपचारिकता निभाई। अदालत ने साफ कहा कि कई बिंदुओं का संतोषजनक जवाब नहीं मिला। इसी चलते सभी को राहत मिली।
दरअसल अदालतें सबूतों को प्रथम दृष्टया देख, तय करती हैं कि किन धाराओं में मुकदमा चलना चाहिए। सीबीआई का आरोप था कि दिल्ली में 2021 में लाई गई नई शराब नीति एक साजिश थी जिसे चुनिंदा लोगों के लाभार्थ लाया गया। बाद में इसे हटा दिया गया। काफी वृहद फैसला जो कि 549 पन्ने का है में अदालत ने कई बार सीबीआई की जांच पर सवाल उठाए और कड़ी निंदा की। मामले की शुरुआत चुनाव प्रचार से जुड़ी कंपनियों से और छोटे व्यापारियों पर केन्द्रित थी जो बढ़ते-बढ़ते आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय नेताओं तक जा पहुंची। अदालत की यह टिप्पणी काफी मायने रखती है कि पूरा मामला महज कल्पनाओं यानी धारणाओं पर आधारित है न कि पुख्ता सबूतों पर। ऐसे में जांच टीम सवाल उठना स्वाभाविक है।
यहां तक कि कोई भी सबूत यह नहीं दर्शाता कि मनीष सिसोदिया कथित पैसों के लेन-देन में शामिल थे। अभियोजन पक्ष उनके खिलाफ एक भी बरामदगी, दस्तावेज या पैसों के लेन-देन या ट्रांसफर का कोई सबूत पेश कर पाई। बड़ी बात यह रही कि कथित घोटाले से जोड़ने खातिर इलेक्ट्रॉनिक वार्तालाप, दस्तावेज या लेन-देन का डिजिटल साक्ष्य भी नहीं है। अदालत ने पाया कि स्वतंत्र जांच करने पर भी पैसों की लेन-देन की कड़ी ऐसे दस्तावेजों पर आधारित है जो कतई कानूनन स्वीकार्य नहीं हैं। बयान भी ऐसे हैं जिसकी पुष्टि तक नहीं हुई। अदालत ने इन्हें मामूली कमियां न मान पूरे मामले की बुनियाद को ही शुरुआत से कमजोर माना। वहीं तथ्यों से अदालत संतुष्ट हुई कि शराब नीति एक सोची समझी थी जो सुपात्रों से विमर्श कर, विधिवत लाई गई। जबकि दिल्ली के उप राज्यपाल से विचार-विमर्श की कोई कानूनी या संवैधानिक जरूरत ही नहीं थी तब भी उनसे राय लेकर, नीति में जोड़ा गया।
पूरे मामले में केजरीवाल और सिसोदिया नहीं बल्कि जन सेवक, निजी व्यापारी और राजनीतिक दल के स्वयंसेवक भी शामिल थे। सीबीआई ने पाया कि जिन कुछ कारोबारियों को नई शराब नीति से फायदा हुआ वो ‘साउथ ग्रुप’ के थे। इस पर भी अदालत की आपत्ति आई कि नाम लोगों के क्षेत्र से जुड़ा है जिसका कानून से कोई मतलब नहीं। साउथ ग्रुप नाम प्रतिकूल प्रभाव के लिए उपयोग हुआ। अदालत ने यहां तक कहा कि कथित साजिश शुरूआत से ही लचर रही और लगने लगा कि सारा कुछ महज अटकलों का खेल है जो न कानूनन मान्य है और न ही सबूतों पर आधारित है। सरकारी गवाह बनाते वक्त भी कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ। बार-बार नए आरोप जोड़ने से लगता है कि ऐसे लोगों को भी फंसाया गया जिनके विरुध्द ठोस आधार ही नहीं था। केजरीवाल और सिसोदिया समेत कई अभियुक्तों पर प्रवर्तन निदेशालय, यानी ईडी, द्वारा एक ‘मनी लॉंडरिंग’ केस भी चल रहा है। देखना है इस मामले में इस फैसले का कैसा असर पड़ता है?
यह तो तय है कि राउज एवेन्यू कार्ट के फैसले को चुनौती दी जाएगी। कहने की जरूरत नहीं कि ऐसा क्यों होगा। बहरहाल बड़ी और प्रतिष्ठित जांच एजेंसियों को केन्द्रीय सत्ता की कठपुतली या तोता कहलाना अब भारत जैसे देश में अच्छा जरूर नहीं लगता! हां, आम आदमी पार्टी जरूर सुकून और जोश से भरी है क्योंकि डिस्चार्ज होने से एक तरह से नया जीवनदान जो मिला।





