धुरंधर और इसका मनोविज्ञान: सिनेमा की दिशा, दर्शक की दृष्टि और बदलता विमर्श

Dhurandhar and its psychology: The direction of cinema, the viewer's perspective, and the changing discourse

अजय कुमार बियानी

भारतीय सिनेमा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रहा, बल्कि उसने दशकों तक समाज की भावनाओं, धारणाओं और सामूहिक चेतना को आकार देने का कार्य भी किया है। “जैसा अन्न, वैसा मन” की तर्ज पर, जैसा चित्रपट पर परोसा गया, वैसी ही सोच धीरे-धीरे समाज के भीतर पनपती गई। ऐसे में जब किसी नई फिल्म के माध्यम से स्थापित प्रवृत्तियों को चुनौती मिलती है, तो स्वाभाविक रूप से विमर्श और विवाद दोनों जन्म लेते हैं।

पुराने दौर की फिल्मों पर दृष्टि डालें तो एक विशेष प्रवृत्ति स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। दीवार, शोले, खुदा गवाह और सनम बेवफा जैसी फिल्मों ने अपने-अपने समय में व्यापक लोकप्रियता अर्जित की। इन फिल्मों में सामाजिक ताने-बाने के साथ-साथ सांस्कृतिक प्रतीकों का भी चित्रण हुआ, परंतु यह चित्रण कई बार इतना सूक्ष्म था कि दर्शक उसे मनोरंजन का हिस्सा मानकर स्वीकार करता गया। “धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय”—इसी प्रकार यह प्रभाव भी धीरे-धीरे मन में स्थान बनाता गया।

इन फिल्मों में एक ओर जहाँ नायक के संघर्ष और भावनाओं को प्रमुखता दी गई, वहीं दूसरी ओर कुछ विशेष सांस्कृतिक संकेतों और प्रतीकों को बार-बार प्रस्तुत किया गया। दर्शकों ने इसे सहजता से स्वीकार किया, क्योंकि उस समय सिनेमा पर प्रश्न उठाने की प्रवृत्ति कम थी। “आँख के अंधे नाम नयनसुख” की तरह, जो दिखा वही सत्य मान लिया गया।

इसके विपरीत, यदि पड़ोसी देश के सिनेमा और वहाँ के सामाजिक चित्रण पर दृष्टि डालें, तो वहाँ कथानक अधिक स्पष्ट और प्रत्यक्ष रूप में प्रस्तुत किए जाते रहे हैं। वहाँ सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को लेकर कोई संकोच नहीं दिखाई देता। यह अंतर यह दर्शाता है कि सिनेमा केवल कला नहीं, बल्कि समाज की वैचारिक दिशा का भी प्रतिबिंब होता है। “जैसी करनी वैसी भरनी”—यह सिद्धांत यहाँ भी लागू होता है, क्योंकि जिस प्रकार की प्रस्तुति होती है, वैसी ही सोच विकसित होती है।

वर्तमान समय में जब धुरंधर जैसी फिल्में सामने आती हैं, तो वे स्थापित कथाओं और पूर्ववर्ती दृष्टिकोणों को चुनौती देती प्रतीत होती हैं। यही कारण है कि इस प्रकार की फिल्मों को लेकर प्रतिक्रियाएँ भी तीव्र होती हैं। “नया चावल चढ़े तो पुराना खदबदाए”—यह स्थिति यहाँ स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

परंतु इस पूरे परिदृश्य में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका दर्शक की है। आज का दर्शक पहले की अपेक्षा अधिक जागरूक और विश्लेषणात्मक हो चुका है। वह केवल मनोरंजन नहीं चाहता, बल्कि वह यह भी समझना चाहता है कि उसे क्या और क्यों दिखाया जा रहा है। “दूध का जला छाछ भी फूँक-फूँक कर पीता है”—यह सावधानी आज के दर्शक में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

सिनेमा के माध्यम से किसी भी विचार को प्रस्तुत करना कलाकार का अधिकार है, परंतु उसे स्वीकार करना या अस्वीकार करना समाज के विवेक पर निर्भर करता है। यदि हम हर प्रस्तुति को अंतिम सत्य मान लें, तो यह “आँख मूँदकर चलना” होगा, और यदि हर नई सोच का विरोध करें, तो यह प्रगति के मार्ग में बाधा बनेगा।

अंततः, यह कहना उचित होगा कि सिनेमा का स्वरूप समय के साथ बदलता रहता है, और यह परिवर्तन समाज की चेतना का संकेत होता है। पुराने और नए के बीच तुलना करना आवश्यक है, परंतु उससे भी अधिक आवश्यक है संतुलन बनाए रखना। कला का उद्देश्य संवाद स्थापित करना है, न कि विभाजन को बढ़ावा देना।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम सिनेमा को केवल भावनाओं के आधार पर नहीं, बल्कि समझ और विवेक के साथ देखें। क्योंकि अंततः वही समाज आगे बढ़ता है, जो “सही को सही और गलत को गलत” कहने का साहस रखता है, और जो हर नई बात को समझने की क्षमता भी रखता है।