संथाली जन जीवन एवं संस्कृति का प्रमाणिक दस्तावेज है डॉ.वीरेन्द्र प्रसाद की ‘द संथाल आफ बिहार ‘

Dr. Virendra Prasad's 'The Santhal of Bihar' is an authentic document of Santhali people's life and culture

समीक्षक प्रो. ओम प्रकाश भारती

‘द संथाल आफ बिहार – इन द सर्च ऑफ़ आईडेनटीटी एंड लाइवलीहुड’ बिहार के युवा साहित्यकार डॉ. वीरेंद्र प्रसाद लिखित शोधपरक ग्रंथ है। यह पुस्तक बिहार से झारखण्ड विभाजित होने के बाद बिहार के संथाल जनजाति पर केन्द्रित है, इस दृष्टिकोण से बिहार के संथालों को लेकर एकमात्र मौलिक एवं महत्वपूर्ण पुस्तक है । पुस्तक एक सौ चालीस पृष्ठ की है तथा प्रकाशक प्रभात प्रकाशन दिल्ली है। प्रस्तुत पुस्तक में संथाल जनजाति का उद्भव, सामाजिक संरचना, सामाजिक प्रथा, गीत, नृत्य, वाद्य तथा जीवकोपार्जन के लिए उनके संघर्षों की शोधपरक प्रस्तुति की गई है। लेखक डॉक्टर वीरेंद्र प्रसाद ने पुस्तक की भूमिका में लिखा है कि मधेपुरा जिला के कलेक्टर तथा किशनगंज के एस. डी. एम. रहते हुए उन्हें संथाल जनजाति को करीब से देखने और समझने का अवसर प्राप्त हुआ। उन्हीं अनुभवों को प्रत्यक्ष रूप से महसूस करते हुए पुस्तक की रचना की गयी है।

संथाल जिसे उत्तर बिहार के कटिहार,पूर्णियां, मधेपुरा , सहरसा, सुपौल, अररिया तथा किशनगंज जिलों में करती है। इन्हें इन अंचलों में सौतार भी कहा जाता है। संथाल मुख्य रूप से कृषक हैं और तीरंदाजी में माहिर होते हैं। बड़े किसान या सामंत लोग जमीनी विवाद या किसी भी तरह के झगड़ा से निपटारे के लिए संथाल लोगों को भाड़े के तीरंदाज के रूप में बुलाते थे और एवज में उसे कुछ पैसे या अनाज देते थे। इस तरह धीरे-धीरे प्रकृति प्रिय संथालों की पहचान एक आपराधिक समुदाय के रूप में होने लगी । इन समस्याओं का जिक्र करते हुए लेखक का अनुभाविक एवं संदर्भगत है, जो पुस्तक को नवीनता प्रदान करता ।

लेखक ने पुस्तक में संथाल की संस्कृति एवं सामाजिक जीवन का तथ्यगत एवं शोध परक प्रस्तुति की है- संथाल जनजाति के परंपरागत पोशाक कुपनी, कांचा. पंची, पारहांड, दह्ड़ी, पाटका इत्यादि पहनते थे । अब संथाल पुरूष धोती – कुर्ता के साथ – साथ पेंट – शर्ट भी पहनते हैं। संथाल महिलायें साड़ी, पेटीकोट, तथा ब्लाउज पहनने लगी है । संथाल महिलाऐं अपने जुड़े को गोलाकार रूप में एक विशेष ढंग से बांधती हैं। इनके हाथ – पैर तथा गले में गोदना चिन्ह भी देखने को मिलते हैं, किन्तु गोदना का रिवाज अब धीरे – धीरे विलुप्त होता जा रहा है। संथाल युवतियों तथा महिलाएं प्राय: शंख, कांसे, पीतल, तांबे तथा चांदी से निर्मित आभूषण पहनती हैं। हाथों में शंख निर्मित सांखा, कांसे पीतल या चांदी के बने सकोम, बांह में खागा, गले में हंसली तथा सकड़ी तथा कानों में सोने व चांदी से निर्मित पानरा, नाक में मकड़ी, पांवों में कांसे की बांक – बंकी तथा पांव की अंगुलियों में बटरिया इनके सामान्य आभूषण हैं। युवकों के आभूषण – हाथों में चांदी के टोडोर, बांहों में खांगा तथा कानों में कूंडल हैं। इनके अलावे फूल तथा पत्तियों से भी वे अपने शरीर को सजाया करते हैं। संथाल जनजाति के परिवार का स्वरुप पितृ सतात्मक, पितृ वंशीय तथा पितृ स्थानीय है। पैतृक संपति पर पहला अधिकार पुत्रों का, फिर अविवाहित पुत्रियों का होता है। इनके बीच एकाकी तथा संयुक्त दोनों प्रकार के परिवार देखने को मिलते हैं। पिता ही परिवार का मुख्य होता है। संथाल महिलाऐं सरल तथा काफी परिश्रमी होती है, वे पुरषों की भांति सभी प्रकार के कार्य करती हैं । बच्चों का लालन – पालन, खाना बनाने, पानी लाने तथा कृषि तथा अन्य व्यवसायी कार्यों के संपादन में संथाल महिलाओं की प्रमुख भूमिका होती है। हाटों में वस्तुयें बेचने तथा आवश्यक चीजों की खरीददारी करने में संथाल महिलाऐं काफी प्रवीण होती हैं। किन्तु संथाल महिलाऐं शिकार, पूजा – अर्चना तथा पंचायत की बैठक में हिस्सा नहीं ले सकती हैं। इसी तरह संथाल महिलाओं द्वारा हल जोतने, छप्पर छाने इत्यादि जैसे कार्यों पर पाबंदी होती है। संथाल जनजाति संथाली बोली बोलती है, जिसका संबंध आस्ट्रो – एशियाई भाषा परिवार से है। संथाली बोली की लिपि ओलचिकी है। प्रजातीय तत्व की दृष्टि से संथाल जनजाति का कद मध्यम, रंग काला या गहरा भूरा, कपाल दीर्घ, बाल काले व सीधे, परंतु कभी – कभी घुंघराले, नाक मध्यमाकर तथा जड़ से दबी सी, आंखे मध्यम आकार की तथा काली मुंह बड़ा एवं होठ मोटे व लटके हुए होते हैं ।

संथाल लोक नृत्य, वाद्य तथा लोककथाओं के वर्णन के क्रम में लेखक ने संस्कृति के मानवशास्त्रीय पक्षों को उद्घाटित किया है । नृत्य –गीतों के मिथकीय तथ्यों पर प्रकश डालते हुए संथाल के जीवन पर उनके प्रभावों की समाजशास्त्रीय विश्लेषण किया है ।

कुल मिलाकर प्रस्तुत यह पुस्तक कला,संस्कृति,मानवशास्त्र तथा समाजशास्त्र के शोधार्थी एवं विद्यार्थियों के लिए उपयोगी तथा संग्रहणीय है।

पुस्तक -द सौतार
लेखक- डॉ.वीरेन्द्र प्रसाद
प्रकाशन -प्रभात प्रकाशन दिल्ली
समीक्षक -प्रो. (डॉ. ) ओम प्रकाश भारती
विभागाध्यक्ष प्रदर्शनकारी कला
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा (महाराष्ट्र).