आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26: अवसर, चुनौतियाँ और भारत की आर्थिक दिशा

Economic Survey 2025–26: Opportunities, Challenges and India's Economic Direction

नृपेन्द्र अभिषेक नृप

वैश्विक अर्थव्यवस्था आज ऐसे दौर से गुजर रही है जहाँ अनिश्चितता ही एकमात्र निश्चित सच्चाई बन चुकी है। व्यापार युद्ध, भू-राजनीतिक तनाव, आपूर्ति शृंखलाओं में बदलाव और वित्तीय बाजारों की अस्थिरता ने दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं के सामने नई चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं। ऐसे समय में आर्थिक सर्वेक्षण 2025- 26 भारत की आर्थिक स्थिति का मात्र लेखा-जोखा नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा तय करने वाला एक विचारोत्तेजक दस्तावेज़ बनकर सामने आता है। यह सर्वेक्षण बताता है कि कठिन वैश्विक परिस्थितियों के बावजूद भारत न केवल संतुलन बनाए हुए है, बल्कि विकास के नए पथ पर आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रहा है।

यह दस्तावेज़ भारत की आर्थिक शक्ति, सुधारों की निरंतरता और नीतिगत स्थिरता का प्रतिबिंब है। तेज़ विकास दर के अनुमान, नियंत्रित मुद्रास्फीति, मजबूत घरेलू मांग और बढ़ते सार्वजनिक निवेश यह संकेत देते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था की नींव पहले से अधिक सुदृढ़ हुई है। साथ ही, सर्वेक्षण आत्ममुग्धता से बचते हुए उन जोखिमों और कमजोर कड़ियों की ओर भी संकेत करता है, जिन्हें समय रहते समझना और सुधारना आवश्यक है।वास्तव में, आर्थिक सर्वेक्षण 2025- 26 भारत की विकास यात्रा का ऐसा दर्पण है, जिसमें उपलब्धियाँ भी स्पष्ट हैं और चेतावनियाँ भी। यह नीति-निर्माताओं, अर्थशास्त्रियों और आम नागरिकों, सभी को यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि स्थायी और समावेशी विकास के लिए अब किन निर्णयों की आवश्यकता है।

आर्थिक सर्वेक्षण 2025- 26 ऐसे समय में सामने आया है, जब वैश्विक अर्थव्यवस्था व्यापार युद्धों की आशंकाओं, बढ़ते भू-राजनीतिक तनावों, आपूर्ति श्रृंखलाओं के पुनर्गठन और वित्तीय अस्थिरता से जूझ रही है। इन परिस्थितियों के बीच भारत एक ऐसे निर्णायक मोड़ पर खड़ा है, जहां उसे घरेलू विकास की आकांक्षाओं और बाहरी जोखिमों के बीच संतुलन साधना है। सर्वेक्षण में चालू वित्त वर्ष के लिए 7.4 प्रतिशत की मजबूत आर्थिक वृद्धि का अनुमान लगाया गया है, जबकि वित्त वर्ष 2026- 27 में वास्तविक आधार पर 6.8 से 7.2 प्रतिशत की वृद्धि दर की संभावना जताई गई है। ये अनुमान भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती और लचीलेपन को दर्शाते हैं तथा इस बात की ओर संकेत करते हैं कि भारत की मध्यम अवधि की संभावित विकास दर पहले की तुलना में ऊपर की ओर बढ़ी है। हालांकि यह सर्वेक्षण केवल उपलब्धियों का उत्सव नहीं है, बल्कि इसमें उन जोखिमों और संरचनात्मक चुनौतियों का भी विवेकपूर्ण आकलन किया गया है, जिनसे निपटना दीर्घकालिक विकास को बनाए रखने के लिए आवश्यक होगा।

विकास परिदृश्य

आर्थिक सर्वेक्षण का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि भारत की संभावित विकास दर को संशोधित कर लगभग 7 प्रतिशत कर दिया गया है, जबकि तीन वर्ष पहले यह करीब 6.5 प्रतिशत आंकी गई थी। यह सुधार हाल के वर्षों में किए गए सतत आर्थिक सुधारों, सार्वजनिक पूंजीगत व्यय में उल्लेखनीय वृद्धि और बेहतर व्यापक आर्थिक बुनियाद का परिणाम है। सर्वेक्षण स्पष्ट करता है कि भारत की आर्थिक वृद्धि अब अस्थायी या अल्पकालिक प्रोत्साहनों पर आधारित नहीं रही, बल्कि बुनियादी ढांचागत विकास, विनिर्माण, लॉजिस्टिक्स और डिजिटल सार्वजनिक प्रणालियों जैसे क्षेत्रों में हुए संरचनात्मक सुधारों से संचालित हो रही है। यद्यपि वैश्विक प्रतिकूल परिस्थितियां अल्पावधि में असर डाल सकती हैं, लेकिन मध्यम अवधि में भारत की विकास यात्रा पहले से कहीं अधिक सशक्त प्रतीत होती है।

घरेलू मांग

भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि में घरेलू खपत की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण बनी हुई है। आर्थिक सर्वेक्षण बताता है कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद ग्रामीण और शहरी, दोनों क्षेत्रों में उपभोक्ता मांग अपेक्षाकृत मजबूत बनी रही है। कृषि क्षेत्र के बेहतर प्रदर्शन से ग्रामीण आय में वृद्धि हुई है, वहीं कर सुधारों और औपचारिक अर्थव्यवस्था के विस्तार से शहरी क्षेत्रों में परिवारों की खर्च करने योग्य आय बढ़ी है। इस खपत-आधारित वृद्धि ने भारत को बाहरी झटकों से कुछ हद तक सुरक्षित रखा है। हालांकि सर्वेक्षण आगाह करता है कि यदि खपत के साथ-साथ निवेश में समान वृद्धि नहीं हुई, तो दीर्घकाल में उत्पादकता और विकास की गति सीमित हो सकती है।

कृषि की भूमिका

कृषि क्षेत्र न केवल रोजगार का बड़ा स्रोत है, बल्कि यह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए स्थिरता का आधार भी है। सर्वेक्षण के अनुसार अनुकूल मानसून, बेहतर खरीद तंत्र और ग्रामीण बुनियादी ढांचे में सुधार ने कृषि उत्पादन को मजबूती दी है। ग्रामीण मांग में वृद्धि का सकारात्मक प्रभाव विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों पर भी पड़ा है। हालांकि सर्वेक्षण इस ओर भी ध्यान दिलाता है कि कृषि निर्यात से जुड़ी नीतियों में बार-बार हस्तक्षेप से आपूर्ति श्रृंखला बाधित होती है और भारत की एक भरोसेमंद निर्यातक के रूप में छवि को नुकसान पहुंच सकता है।

महंगाई नियंत्रण

आर्थिक सर्वेक्षण में महंगाई पर नियंत्रण को एक बड़ी उपलब्धि के रूप में रेखांकित किया गया है। अप्रैल से दिसंबर 2025 के दौरान उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति घटकर लगभग 1.7 प्रतिशत रह गई, जो संतुलित मौद्रिक नीति और आपूर्ति-पक्ष के सुधारों का परिणाम है। भारतीय रिज़र्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, दोनों का अनुमान है कि आने वाले वर्ष में महंगाई धीरे-धीरे बढ़ सकती है, लेकिन यह आरबीआई के 4 प्रतिशत के लक्ष्य के भीतर ही रहेगी। मूल्य स्थिरता से उपभोक्ताओं का भरोसा बढ़ता है और निवेश के लिए अनुकूल वातावरण बनता है। फिर भी, वैश्विक कमोडिटी कीमतों और भू-राजनीतिक घटनाओं से महंगाई पर दोबारा दबाव पड़ने की आशंका बनी हुई है।

राजकोषीय स्थिति

राजकोषीय मोर्चे पर सर्वेक्षण एक मिश्रित तस्वीर पेश करता है। वित्त वर्ष 2025 में राजकोषीय घाटा बढ़कर जीडीपी का 3.2 प्रतिशत हो गया, जो बढ़ते खर्च और वैश्विक अनिश्चितताओं के दबाव को दर्शाता है। केंद्र सरकार ने पूंजीगत व्यय बढ़ाने के साथ-साथ राजकोषीय अनुशासन बनाए रखा है, लेकिन कई राज्यों में लोकलुभावन योजनाओं और नकद अंतरण के कारण राजस्व घाटा बढ़ा है। सर्वेक्षण इस बात पर जोर देता है कि ऐसे समय में, जब वैश्विक बचत सीमित और महंगी होती जा रही है, देश की वित्तीय नियमावली को उसकी वित्तपोषण क्षमता के अनुरूप ढालना आवश्यक है।

बाहरी व्यापार

भारत का व्यापार प्रदर्शन लचीलापन और जोखिम, दोनों को दर्शाता है। वैश्विक मंदी के बावजूद अप्रैल से दिसंबर 2025 के दौरान वस्तु निर्यात में 2.4 प्रतिशत और सेवा निर्यात में 6.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। यूरोपीय संघ, ब्रिटेन, न्यूजीलैंड और ओमान के साथ हाल में हुए मुक्त व्यापार समझौते अमेरिका पर निर्भरता कम करने और नए बाजार तलाशने में सहायक होंगे। हालांकि, सर्वेक्षण यह भी स्वीकार करता है कि संरक्षणवाद, टैरिफ युद्ध और महत्वपूर्ण खनिजों की प्रतिस्पर्धा वैश्विक व्यापार व्यवस्था को बदल रही है, जिससे भारत के निर्यात के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।

रुपये की स्थिति

आर्थिक सर्वेक्षण रुपये की कमजोरी को मुख्यतः बाहरी कारकों का परिणाम मानता है, न कि घरेलू आर्थिक कमजोरी का संकेत। वैश्विक जोखिम से बचने की प्रवृत्ति और कड़े वित्तीय हालात के कारण विदेशी पूंजी का बहिर्वाह हुआ है, जिससे रुपये पर दबाव बढ़ा। कमजोर रुपया निर्यातकों के लिए कुछ हद तक राहत देता है, क्योंकि इससे ऊंचे टैरिफ का असर कम होता है। लेकिन सर्वेक्षण स्पष्ट करता है कि दीर्घकालिक मुद्रा स्थिरता के लिए मजबूत विनिर्माण आधार, अधिक निर्यात आय और स्थायी विदेशी पूंजी प्रवाह आवश्यक है।

पूंजी प्रवाह

भारत के चालू खाते के घाटे को संतुलित रखने के लिए विदेशी पूंजी प्रवाह अत्यंत महत्वपूर्ण है। सर्वेक्षण बताता है कि विदेशी पोर्टफोलियो निवेश अत्यधिक अस्थिर रहा है, जबकि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश अपेक्षाकृत स्थिर बना हुआ है। यह भारत की दीर्घकालिक संभावनाओं में निवेशकों के विश्वास को दर्शाता है। पूंजी प्रवाह बनाए रखने के लिए सर्वेक्षण नीतिगत स्थिरता, नियामकीय स्पष्टता और बुनियादी ढांचे में सुधार को अनिवार्य मानता है।

निवेश की भूमिका

महामारी के बाद की अवधि में सार्वजनिक निवेश ने आर्थिक वृद्धि को सहारा दिया है। सरकार का पूंजीगत व्यय वित्त वर्ष 2022- 23 में 7.4 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2024- 25 में 10.5 लाख करोड़ रुपये हो गया। यह निवेश मुख्य रूप से सड़क, रेल, बंदरगाह और डिजिटल अवसंरचना में किया गया है। सर्वेक्षण का मानना है कि यदि वित्तीय क्षेत्र की बैलेंस शीट मजबूत बनी रहती है, तो सार्वजनिक निवेश निजी निवेश को भी प्रोत्साहित कर सकता है। हालांकि निजी निवेश में सुधार अभी सभी क्षेत्रों में समान नहीं है।

विनिर्माण क्षेत्र

विनिर्माण क्षेत्र को मजबूत करना भारत की रणनीतिक प्राथमिकता के रूप में उभरता है। उत्पादन-संयुक्त प्रोत्साहन योजनाएं, संतुलित व्यापार उदारीकरण और लॉजिस्टिक्स सुधारों से क्षमता निर्माण को बढ़ावा मिला है। सर्वेक्षण यह स्पष्ट करता है कि विनिर्माण-आधारित निर्यात न केवल रोजगार सृजन के लिए, बल्कि मुद्रा स्थिरता के लिए भी आवश्यक है। साथ ही यह चेतावनी भी देता है कि अत्यधिक आयात संरक्षण के बजाय पूंजी की लागत कम करना प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने का अधिक प्रभावी तरीका हो सकता है।

श्रम बाजार

श्रम बाजार में आए संरचनात्मक बदलाव एक सकारात्मक संकेत हैं। महिला श्रम भागीदारी दर 2017–18 में 23.3 प्रतिशत से बढ़कर 2023–24 में 41 प्रतिशत से अधिक हो गई है। औपचारिक रोजगार और सामाजिक सुरक्षा का दायरा भी बढ़ा है, जैसा कि ईपीएफओ में बढ़ती सदस्यता से स्पष्ट होता है। यह समावेशी विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, हालांकि रोजगार की गुणवत्ता और कौशल विकास की चुनौतियां अभी बनी हुई हैं।

उत्पादकता की दिशा

महामारी के तुरंत बाद उत्पादकता वृद्धि धीमी रही, जो कई उभरती अर्थव्यवस्थाओं में देखा गया। लेकिन सर्वेक्षण का मानना है कि भारत की सुधार यात्रा उत्पादकता में पुनः तेजी ला सकती है। आधार, यूपीआई और जीएसटी जैसी डिजिटल सार्वजनिक प्रणालियों ने लेन-देन की लागत घटाई है और संसाधनों के बेहतर उपयोग को संभव बनाया है। समय के साथ ये सुधार गहरे उत्पादकता लाभ देंगे।

सामाजिक चिंताएं

सर्वेक्षण केवल आर्थिक आंकड़ों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सामाजिक मुद्दों पर भी ध्यान देता है। अधिक चीनी और वसा वाले अति-प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की बढ़ती खपत को लेकर स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं जताई गई हैं और इनके विज्ञापनों पर नियंत्रण का सुझाव दिया गया है। साथ ही गिग और अस्थायी कामगारों के लिए बेहतर सामाजिक सुरक्षा की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। राज्यों में बढ़ते नकद अंतरण और लोकलुभावन योजनाओं से राजकोषीय जोखिम भी रेखांकित किए गए हैं।

रणनीतिक आत्मनिर्भरता

भू-राजनीतिक विभाजन और वैश्विक ध्रुवीकरण के इस संवेदनशील दौर में आर्थिक सर्वेक्षण रणनीतिक आत्मनिर्भरता को भारत की आर्थिक नीति का एक अनिवार्य आधार मानता है। सर्वेक्षण स्पष्ट करता है कि आत्मनिर्भरता का अर्थ वैश्विक अर्थव्यवस्था से कटाव या संरक्षणवादी सोच अपनाना नहीं है, बल्कि ऐसी संतुलित रणनीति विकसित करना है जो दक्षता, प्रतिस्पर्धा और नवाचार को बढ़ावा दे। इसका उद्देश्य भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं से अलग करना नहीं, बल्कि उनमें एक सशक्त और विश्वसनीय भागीदार के रूप में स्थापित करना है। आर्थिक सर्वेक्षण इस बात पर बल देता है कि रक्षा, ऊर्जा, अर्धचालक, दवाइयों और महत्वपूर्ण खनिजों जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में घरेलू क्षमताओं का सुदृढ़ीकरण अत्यंत आवश्यक है। साथ ही, पारंपरिक व्यापार साझेदारों पर अत्यधिक निर्भरता को कम करते हुए नए और विविध बाजारों से जुड़ाव बढ़ाने की आवश्यकता बताई गई है। लचीली, भरोसेमंद और संकट-रोधी आपूर्ति श्रृंखलाएँ न केवल आर्थिक स्थिरता को मजबूत करेंगी, बल्कि भारत की वैश्विक सौदेबाजी क्षमता को भी नई मजबूती प्रदान करेंगी।

भविष्य के जोखिम

भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियादी मजबूती और स्थिर व्यापक आर्थिक संकेतकों के बावजूद यह तथ्य नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि वैश्विक झटकों का खतरा लगातार बना हुआ है। वैश्विक वित्तीय बाजारों में अचानक अस्थिरता आने की स्थिति में तीव्र पूंजी बहिर्वाह भारत जैसे उभरते बाजारों को विशेष रूप से प्रभावित कर सकता है। इसके अतिरिक्त, कच्चे तेल और अन्य प्रमुख कमोडिटी कीमतों में तेज़ उछाल से आयात बिल बढ़ने की आशंका रहती है, जिसका सीधा असर चालू खाते के संतुलन पर पड़ता है। भू-राजनीतिक तनावों की तीव्रता बढ़ने पर वैश्विक व्यापार और निवेश प्रवाह बाधित हो सकते हैं, जिससे रुपये पर दबाव और बढ़ सकता है। चूंकि भारत का चालू खाते का घाटा अभी भी एक संरचनात्मक चुनौती बना हुआ है, इसलिए बाहरी असंतुलन के जोखिम और गहरे हो जाते हैं। ऐसी परिस्थितियों में दीर्घकालिक और स्थिर विदेशी निवेश आकर्षित करना तथा निर्यात आय में सतत वृद्धि सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक हो जाता है, ताकि बाहरी झटकों से अर्थव्यवस्था को प्रभावी रूप से सुरक्षित रखा जा सके।

नीतिगत दिशा

आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 से दो अत्यंत महत्वपूर्ण नीतिगत संदेश स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आते हैं, जो आने वाले वर्षों में भारत की आर्थिक दिशा तय करने में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। पहला संदेश पूंजी की लागत को कम करने की आवश्यकता से जुड़ा है। सर्वेक्षण यह रेखांकित करता है कि उच्च पूंजी लागत निवेश को सीमित करती है और औद्योगिक विस्तार की गति को धीमा कर देती है। इसे कम करने के लिए सख्त राजकोषीय अनुशासन, विवेकपूर्ण बजट प्रबंधन और वित्तीय क्षेत्र में गहन सुधार अनिवार्य हैं। सरकारी घाटे में क्रमिक कमी, सार्वजनिक संसाधनों का उत्पादक उपयोग और वित्तीय बाजारों की दक्षता बढ़ाने से निजी निवेश के लिए अनुकूल माहौल बन सकता है। दूसरा प्रमुख संदेश आयात संरक्षण से संबंधित है। सर्वेक्षण के अनुसार, अत्यधिक संरक्षणवाद अल्पकाल में कुछ क्षेत्रों को राहत दे सकता है, लेकिन दीर्घकाल में यह प्रतिस्पर्धात्मकता और नवाचार को कमजोर करता है। इसके विपरीत, वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में गहरी और सक्रिय भागीदारी से भारतीय उद्योगों को नई तकनीक, बेहतर गुणवत्ता और व्यापक बाजारों तक पहुंच मिल सकती है। आयात शुल्क को तार्किक बनाकर और व्यापार प्रक्रियाओं को सरल कर भारत अपने उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा बढ़ा सकता है। इन दोनों नीतिगत दिशाओं को संतुलित रूप से अपनाकर भारत अपनी बढ़ी हुई विकास क्षमता को ठोस आर्थिक उपलब्धियों में परिवर्तित कर सकता है।

आर्थिक सर्वेक्षण 2025- 26 भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर संतुलित आशावाद प्रस्तुत करता है। यह दर्शाता है कि निरंतर सुधारों, मजबूत घरेलू मांग, नियंत्रित महंगाई और रणनीतिक व्यापार नीतियों के चलते भारत वैश्विक उथल-पुथल के बीच अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में है। साथ ही यह चेतावनी भी देता है कि बाहरी जोखिमों और आंतरिक चुनौतियों से निपटने के लिए सतर्कता, नीतिगत निरंतरता और संस्थागत मजबूती आवश्यक होगी। कुल मिलाकर, सर्वेक्षण का संदेश स्पष्ट है, भारत के पास अवसर भी हैं और चुनौतियां भी, और इन दोनों के बीच संतुलन साधकर ही दीर्घकालिक, टिकाऊ विकास संभव है।