अजय कुमार बियानी
शहर में हाल ही में घटित विद्युत वाहन चार्जिंग से जुड़ी भीषण आग की घटना, जिसमें एक ही परिवार के कई लोगों की असामयिक मृत्यु हुई, केवल एक दुर्घटना नहीं बल्कि आधुनिक विकास मॉडल की गंभीर खामियों को उजागर करने वाली त्रासदी है। यह घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम तकनीकी प्रगति की दौड़ में सुरक्षा के मूलभूत मानकों को पीछे छोड़ते जा रहे हैं।
देश में पर्यावरण संरक्षण और ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से विद्युत वाहनों को तेजी से अपनाया जा रहा है। शासन द्वारा प्रोत्साहन योजनाएं, कंपनियों द्वारा नए मॉडलों का विस्तार और नागरिकों में बढ़ती स्वीकार्यता—ये सभी संकेत हैं कि भविष्य विद्युत आधारित परिवहन का है। किन्तु इस परिवर्तन के साथ आवश्यक सुरक्षा संरचना का विकास उतनी ही गंभीरता से हुआ है या नहीं, यह एक बड़ा प्रश्न है।
विद्युत वाहनों में प्रयुक्त बैटरियां अत्याधुनिक होते हुए भी संवेदनशील होती हैं। चार्जिंग के दौरान अत्यधिक तापमान, तकनीकी त्रुटि अथवा अनुचित उपकरणों के उपयोग से आग लगने की संभावना बनी रहती है। विशेष रूप से जब घरेलू स्तर पर बिना मानक व्यवस्था के चार्जिंग की जाती है, तब जोखिम कई गुना बढ़ जाता है। विकसित देशों में इस प्रकार की घटनाओं के बाद कठोर दिशा-निर्देश और सुरक्षा मानक लागू किए गए हैं, जबकि हमारे यहां अभी भी इस दिशा में स्पष्टता और सख्ती का अभाव दिखाई देता है।
यह घटना शहरी ढांचे की एक और कमजोरी को भी सामने लाती है—अग्नि सुरक्षा के प्रति लापरवाही। अधिकांश आवासीय भवनों में न तो धुआं पहचानने वाली प्रणाली है, न आपातकालीन निकास की समुचित व्यवस्था और न ही अग्निशमन उपकरणों की उपलब्धता। जब तक आग नियंत्रण में आती है, तब तक नुकसान अपरिवर्तनीय हो चुका होता है। यह स्थिति बताती है कि भवन निर्माण से लेकर उसके उपयोग तक सुरक्षा मानकों को केवल कागजों में ही सीमित कर दिया गया है।
इस त्रासदी के संदर्भ में उत्तरदायित्व का प्रश्न भी अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। क्या वाहन निर्माताओं ने अपने उत्पादों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त परीक्षण और जागरूकता प्रदान की? क्या चार्जिंग उपकरण मानकों के अनुरूप थे? क्या स्थानीय प्रशासन ने भवनों की अग्नि सुरक्षा की नियमित जांच की? और क्या विद्युत आपूर्ति से जुड़े विभागों ने बढ़ते भार और संभावित जोखिमों का आकलन किया? इन सभी प्रश्नों के उत्तर ही भविष्य की दिशा तय करेंगे।
वास्तव में यह घटना तकनीकी विफलता से अधिक व्यवस्थागत कमजोरी की ओर संकेत करती है। यदि नीति निर्माण, क्रियान्वयन और जनजागरूकता तीनों स्तरों पर समन्वय का अभाव रहेगा, तो ऐसी दुर्घटनाएं बार-बार दोहराई जा सकती हैं।
आवश्यक है कि विद्युत वाहनों के लिए सुरक्षित चार्जिंग व्यवस्था को अनिवार्य बनाया जाए, भवनों में अग्नि सुरक्षा मानकों का कठोरता से पालन सुनिश्चित किया जाए और नागरिकों को इसके प्रति जागरूक किया जाए।
तकनीक का उद्देश्य मानव जीवन को सुरक्षित, सरल और सुविधाजनक बनाना है। यदि वही तकनीक असुरक्षा का कारण बनने लगे, तो विकास की अवधारणा अधूरी मानी जाएगी। इसलिए यह समय केवल शोक व्यक्त करने का नहीं, बल्कि ठोस निर्णय लेने का है।
यदि इस घटना को एक चेतावनी के रूप में नहीं लिया गया, तो भविष्य में ऐसे हादसे केवल आंकड़ों में नहीं बल्कि असंख्य परिवारों के जीवन में स्थायी शून्य छोड़ जाएंगे। प्रगति की दिशा वही सार्थक होगी, जिसमें सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए और प्रत्येक नागरिक का जीवन वास्तव में सुरक्षित हो सके।





