डॉo सत्यवान सौरभ
दुनिया किस दिशा में आगे बढ़ रही है, यह किसी से छिपा नहीं। बीसवीं सदी में राष्ट्रों की शक्ति युद्ध और भूगोल से तय होती थी, पर इक्कीसवीं सदी की ताक़त अब ज्ञान, विज्ञान और नवाचार से मापी जाती है। रूस कैंसर जैसी घातक बीमारियों के इलाज पर अबाध अनुसंधान में निवेश कर रहा है। अमेरिका कृत्रिम बुद्धिमत्ता के ज़रिए भविष्य की अर्थव्यवस्था और युद्धनीति तक को पुनर्परिभाषित कर चुका है। चीन ने बुनियादी ढांचे और तकनीकी शिक्षा में जिस अनुशासन से काम किया है, उसने उसे उत्पादन और नवप्रवर्तन दोनों का केंद्र बना दिया है।
इन्हीं वैश्विक प्रयासों के बीच भारत “विश्वगुरु” बनने का दावा करता है। यह आकांक्षा बुरी नहीं—हर राष्ट्र अपनी भूमिका को ऊँचाई देना चाहता है। समस्या इस दावे में नहीं, बल्कि उस गहराते अंतर में है जो हमारे नारे और हमारी हकीकत के बीच फैलता जा रहा है।
हाल के महीनों में चिकित्सा शिक्षा में प्रवेश की प्रक्रिया पर जो तथ्य सामने आए हैं, उन्होंने इस अंतर को और उजागर कर दिया है। यदि यह सच है कि नकारात्मक अंक प्राप्त करने वाले अभ्यर्थी भी डॉक्टर बनने का अवसर पा रहे हैं, तो यह केवल शैक्षणिक त्रुटि नहीं—सार्वजनिक स्वास्थ्य की सुरक्षा पर खतरे की घंटी है। डॉक्टर केवल एक पेशे का नहीं, बल्कि जीवन और मृत्यु के बीच सेतु का प्रतीक है। उसकी योग्यता में गिरावट का मतलब पूरे समाज की स्पंदनशीलता पर सीधी चोट है।
यह सही है कि देश में डॉक्टरों की कमी गंभीर चुनौती है। भारत में प्रति हजार जनसंख्या पर डॉक्टरों की संख्या अब भी वैश्विक औसत से कम है। लेकिन इस संकट का समाधान योग्यता की सीमा घटाकर नहीं किया जा सकता। यह ठीक वैसा है जैसे पुलों की कमी दूर करने के लिए निर्माण सामग्री की गुणवत्ता घटा दी जाए। पुल तो खड़ा हो जाएगा, पर किसी दिन गिरकर उसी जनता को घायल करेगा जिसकी मदद के लिए बनाया गया था।
सामाजिक न्याय की अवधारणा भारतीय लोकतंत्र का अभिन्न मूल्य है। आरक्षण और समावेशिता का उद्देश्य अवसरों की बराबरी सुनिश्चित करना है, न कि प्रतिभा की कसौटी को मिटा देना। सामाजिक पृष्ठभूमि अवसर तय कर सकती है, पर सर्जन के हाथ में छुरी थमाते वक्त अंकों और दक्षता से समझौता आत्मघाती कदम होगा। किसी छात्र का संघर्ष सहानुभूति का विषय हो सकता है, लेकिन ऑपरेशन टेबल पर उसकी गलती का परिणाम किसी की ज़िंदगी हो सकता है। इसीलिए चिकित्सा, विमानन, परमाणु विज्ञान या अन्य उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में रियायत नहीं, प्रशिक्षण और समर्थन की आवश्यकता होती है।
आजकल एक व्यंग्य खूब चल रहा है—“जनसंख्या नियंत्रण का नया तरीका माइनस मार्क्स वाला डॉक्टर है।” यह सुनने में अतिशयोक्ति लगे, पर इसके भीतर छिपा डर वास्तविक है। चिकित्सा में अयोग्यता का प्रवेश राष्ट्र की सामूहिक सुरक्षा पर हमला है। जब चिकित्सक की गलती की कीमत किसी की सांस बन जाए, तब यह केवल नीति की विफलता नहीं रह जाती, यह नैतिक अपराध बन जाती है।
विडंबना यह है कि भारत एक ओर ज्ञान और नेतृत्व का वैश्विक हवाला देता है, दूसरी ओर अपने ही पेशागत मानदंड ढीले करता जाता है। कोई भी देश नारों से महान नहीं होता। वह महान बनता है अपने संस्थानों के अनुशासन और पारदर्शिता से। शिक्षा, स्वास्थ्य और अनुसंधान—ये किसी भी सभ्य समाज की रीढ़ हैं। इनके बिना कोई “विश्वगुरु” नहीं बन सकता, चाहे मंच पर कितने ही भाषण दे लिए जाएँ।
इस स्थिति का सबसे दुखद पक्ष यह है कि जिन वर्गों के नाम पर अनेक ढीलें दी जाती हैं, सबसे अधिक नुकसान भी उन्हें ही झेलना पड़ता है। गरीब और वंचित तबका सरकारी अस्पतालों पर निर्भर होता है। यदि वहाँ अयोग्य चिकित्सक पहुँचेंगे, तो सामाजिक न्याय का लक्ष्य ही उल्टा पड़ जाएगा। असमानता घटेगी नहीं, बल्कि और गहरी होगी। यह सवाल इसलिए भी जरूरी है कि नीति बनाते समय हम अक्सर मंशा को पर्याप्त मान लेते हैं, पर परिणाम के असर को नज़रंदाज़ करते हैं।
निजी चिकित्सा कॉलेजों के बढ़ते प्रभाव ने इस समस्या में और पेच जोड़ दिए हैं। जब शिक्षा को सेवा नहीं, कारोबार बना दिया जाता है, तो योग्यता धन के नीचे दब जाती है। ऊँची फीस, प्रबंधन कोटे और सीटों के लिए लेन-देन ने चिकित्सा शिक्षा का चरित्र बदल दिया है। यह स्थिति डॉक्टर और रोगी के बीच विश्वास को भी कमजोर करती है। जब डॉक्टर डिग्री को उपलब्धि नहीं, निवेश मानने लगता है, तो उसका पहला लक्ष्य उपचार नहीं, वसूली बन जाता है। इससे पेशे की नैतिकता का पतन अनिवार्य है।
अगर यह प्रवृत्ति जारी रही, तो आने वाले वर्षों में भारत में चिकित्सा प्रणाली का चेहरा ऐसा हो जाएगा जहाँ गुणवत्ता का मतलब रहेगा—कितना भुगतान किया गया, न कि कितनी दक्षता से इलाज हुआ। यह उस राष्ट्र के लिए गहरी विडंबना होगी जो स्वयं को जीवनदायिनी सभ्यता कहता है।
इस स्थिति से बाहर निकलने का एकमात्र रास्ता है—पूरे शैक्षणिक ढाँचे का पुनर्गठन। प्रवेश मानक गिराने से नहीं, बल्कि शिक्षा की नींव मज़बूत करने से समस्या सुलझेगी। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि ग्रामीण या कमजोर छात्रों को प्रारंभिक स्तर पर ही ऐसी सुविधाएँ, प्रशिक्षण और शिक्षक मिलें जो उन्हें प्रतिस्पर्धा के योग्य बनाएँ। छात्रवृत्ति, कोचिंग सहायता और वैज्ञानिक पद्धति से पढ़ाई तक—इन सब पर निवेश बढ़ाना होगा। योग्यता पैदा करना कठिन है, पर उसका विकल्प नहीं।
भारत को अब साफ़ तौर पर तय करना होगा कि उसकी प्राथमिकताएँ क्या हैं। क्या हम नारेबाज़ी के गर्व में रहना चाहते हैं या सचमुच वैश्विक गुणवत्ता का समाज बनना चाहते हैं? चीन ने अपनी शिक्षा नीति से, जापान ने अपने अनुशासन से और कोरिया ने नवाचार से विश्व में सम्मान अर्जित किया है। भारत में भी वही संभव है—अगर हम योग्यता और ईमानदारी को आदर्श बनाएँ।
किसी देश की असली पहचान उसके नेताओं से नहीं, बल्कि उसके पेशेवर वर्ग से होती है। डॉक्टर, शिक्षक, वैज्ञानिक और इंजीनियर—ये वे स्तंभ हैं जो समाज का चेहरा तय करते हैं। यदि इनमें योग्यता का क्षरण शुरू हो जाए, तो कोई हाईवे, कोई अभियान या कोई विज़न डॉक्यूमेंट उस राष्ट्र को विश्वगुरु नहीं बना सकता।
यह समय भारत के लिए आत्ममंथन का है। क्या हम उस मुकाम पर पहुँचना चाहते हैं जहाँ दुनिया हमारे डॉक्टरों पर भरोसा करे, या उस आत्मसंतोष में रहना चाहते हैं जहाँ “विश्वगुरु” शब्द केवल सांत्वना बन गया हो?
उत्तर सरल है। यदि हम अपनी शिक्षा, परीक्षा, भर्ती और प्रशासन में पारदर्शिता और योग्यता के मूल्य को फिर केंद्र में लाएँ, तो “विश्वगुरु” का सपना वायवीय नारे से ठोस उपलब्धि बन सकता है। राष्ट्र का उत्थान किसी एक वर्ग, विचारधारा या सत्ता से नहीं होता; वह हर उस नागरिक के प्रयास से होता है जो अपने क्षेत्र में श्रेष्ठता लाने का संकल्प रखता है।
भारतीय परंपरा ने सदियों पहले कहा था—“न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।” ज्ञान से पवित्र कुछ नहीं। यही विचार हमें आगे ले जा सकता है।
विश्वगुरु बनने की राह न नारों से है, न प्रतीकों से; वह शिक्षा, अनुशासन और संस्थागत ईमानदारी से होकर गुजरती है। हमें तय करना होगा कि हम इस राह पर चलना चाहते हैं या नहीं।
क्योंकि सच्चाई यह है—
विश्वगुरु बनने से पहले,
हमें योग्यता को ही गुरु बनाना होगा।
(डॉ. सत्यवान सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), एक कवि और सामाजिक विचारक है।)





