
ओम प्रकाश उनियाल
यदि आप देहरादून आए हुए हैं और यहां आकर भी आपने उत्तराखंड के व्यंजनों का स्वाद नहीं लिया तो आप यूं समझिए कि आपका देहरादून आना निरर्थक ही रहा। तो चलिए हमारे साथ ऐसी जगह जहां प्रकृति, उत्तराखंडी संस्कृति और खाने के जायके का आनंद एक साथ लिया जा सकता है। देहरादून के थानों मुख्य मार्ग से लगभग डेढ किलोमीटर अंदर है सीरियों गांव। जहां स्थित है डिंड्याली होमस्टे।
यहां तक पहुंचने के लिए पक्की सड़क है। सड़क के दोनों ओर जंगल फैला हुआ है। गांव में प्रवेश करते ही हल्के सीढ़ीनुमा खेत और उनमें फैली हरियाली, गांव से लगती पहाड़ी पर घना जंगल यहां आने वालों का मन मोह लेता है। गांव ज्यादा ऊंचाई पर तो नहीं है लेकिन हल्का-सा ढलान है।
डिंड्याली के प्रवेश द्वार पर कतारबद्ध टंगी घंटियां, प्रांगण में एक तरफ उत्तराखंड के पारंपरिक वाद्य-यंत्र बजाते हुए बाजगी व केदारनाथ व महासू देवता मंदिर की कलाकृति आदि यहां आने वालों का ध्यान आकर्षित करती है। भीतरी द्वार पर पहाड़ की ‘अतिथि देवो भव:’ की परंपरा का निर्वहन करते हुए तिलक लगाकर अतिथियों का स्वागत किया जाता है।
पहाड़ों में बने घरों की तर्ज बने इस होमस्टे में नीचे के तल (उबर) में जमीन पर बैठकर पहाड़ी थाली का आनंद लिया जा सकता है तथा ऊपरी तल डिंड्याली (आंगन) में प्रकृति को निहारते हुए। साथ ही बजते गढ़वाली-कुमाऊंनी गीत।
खाने में पहाड़ी व्यंजनों में लाल चावल का भात, मंडुवे की रोटी, पहाड़ी दाल, भांग की चटनी, झंगोरे की खीर, आलू के गुटके आदि का स्वाद का तो क्या ही कहना। पीतल के बर्तनों में परोसे जाते हैं पकवान।
उत्तराखंड की संस्कृति को जीवंत रखने व आगे बढ़ाने में इस प्रकार के होमस्टे काफी सहायक सिद्ध होंगे। यही नहीं जो लोग उत्तराखंड से बिल्कुल ही नाता तोड़ चुके हैं या नयी पीढ़ी जिन्होंने पहाड़ देखा ही नहीं उन्हें एक बार यहां जरूर आना चाहिए।