वर्दी का डर या भरोसे का हाथ? लोकतंत्र में पुलिस की नई परिभाषा की तलाश

Fear of the uniform or a trusted hand? Seeking a new definition of policing in a democracy

  • क्या हमारे थाने इंसाफ़ के दरवाज़े हैं, या डर की दहलीज़?
  • जब एक आम आदमी किसी मुसीबत में थाने की ओर बढ़ता है, तो क्या उसके कदमों में भरोसा होता है या दिल में खौफ़? यही सवाल आज लोकतंत्र के आईने में पुलिस की छवि को देखता हुआ खड़ा है।

बृज खंडेलवाल

उत्तर प्रदेश हाईकोर्ट की हालिया टिप्पणियों ने पुलिस व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं। अदालत की भाषा में जो तल्ख़ी और चिंता झलकी, वह केवल कानूनी टिप्पणी नहीं थी, बल्कि व्यवस्था को आईना दिखाने की कोशिश थी।

जनता जानना चाहती है कि क्या सरकार इन संकेतों को सुधार के अवसर के रूप में लेगी, या ये यूहीं चलता रहेगा?

लोकतंत्र की असली पहचान केवल चुनावों से नहीं होती। उसकी आत्मा उन संस्थाओं में बसती है जो कानून और नागरिकों के बीच सेतु का काम करती हैं। पुलिस ऐसी ही एक संस्था है। लेकिन जब वही संस्था लोगों के मन में सुरक्षा की जगह भय पैदा करने लगे, तो भरोसे की नींव हिलने लगती है।

अदालत ने पुलिस थानों में लगे सीसीटीवी कैमरों को लेकर नाराज़गी जताई। जब भी हिरासत में मारपीट या बदसलूकी की शिकायत आती है, कैमरे अक्सर उसी समय “खराब” पाए जाते हैं। क्या यह महज़ तकनीकी खराबी है, या एक खतरनाक पैटर्न?
लखनऊ पीठ ने इस मामले की जांच के आदेश दिए और स्पष्ट कहा कि इसे सामान्य घटना मानकर टालना न्याय से मुंह मोड़ने जैसा होगा। अगर थानों के भीतर पारदर्शिता नहीं होगी, तो न्याय की रोशनी बाहर कैसे पहुंचेगी? अंधेरे में खड़ा तंत्र नागरिकों का विश्वास नहीं जीत सकता।

अदालत ने तथाकथित “एनकाउंटर संस्कृति” पर भी तीखी टिप्पणी की। न्यायमूर्ति ने साफ़ कहा कि सज़ा देने का अधिकार न्यायपालिका का है, पुलिस का नहीं। हर मुठभेड़ की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच अनिवार्य होनी चाहिए।

यह भी सवाल उठा कि आरोपियों को पैर में गोली मारकर “लंगड़ा” बना देना क्या कानून सम्मत प्रक्रिया है, या फिर यह पदोन्नति और वाहवाही पाने का शॉर्टकट? न्याय की प्रक्रिया भावनाओं या लोकप्रियता से नहीं, नियमों और संवैधानिक मर्यादाओं से चलती है।

अदालत ने यह चेतावनी भी दी कि यदि पुलिस न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप करे या मजिस्ट्रेटों पर दबाव बनाए, तो हालात “पुलिस राज्य” की ओर बढ़ सकते हैं। लोकतंत्र में शक्तियों का संतुलन अनिवार्य है। अगर एक संस्था अपने दायरे से बाहर जाकर दूसरों पर हावी होने लगे, तो व्यवस्था का संतुलन डगमगाने लगता है।

गैरकानूनी गिरफ्तारियों का मुद्दा भी कम गंभीर नहीं। गिरफ्तारी के कारण न बताना या कानूनी प्रक्रिया का पालन न करना संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के बावजूद, ज़मीनी हकीकत में इनका पालन अधूरा दिखाई देता है। यह केवल कानूनी कमी नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों पर सीधा आघात है।
समस्या कुछ व्यक्तियों तक सीमित नहीं है; यह ढांचे की जड़ में बैठी हुई है। 1861 का पुलिस कानून उस दौर की देन है जब मक़सद जनता की सेवा नहीं, बल्कि हुकूमत की पकड़ मज़बूत करना था। दुर्भाग्य से आज भी उस मानसिकता की छाया दिखाई देती है।

राजनीतिक हस्तक्षेप, तबादलों में दबाव, संसाधनों की कमी और अपर्याप्त प्रशिक्षण; ये सब मिलकर पुलिस को परिणाम दिखाने की होड़ में धकेलते हैं। नतीजा यह होता है कि प्रक्रिया और संवेदनशीलता पीछे छूट जाती है। सम्मान की जगह भय पैदा होता है।

गांवों और छोटे कस्बों में अक्सर यह धारणा बन जाती है कि एक मामूली अफसर ही इलाके का “बादशाह” है। गरीब और कमजोर तबका थाने जाने से कतराता है, जबकि रसूखदार लोगों के लिए रास्ते अपेक्षाकृत आसान हो जाते हैं। जब पुलिस, पूंजी और राजनीति के गठजोड़ की चर्चाएं होती हैं, तो आम नागरिक बेबस हो जाता है।

पुलिस और फ़ौज के किरदार में मौलिक अंतर होता है। फ़ौज बाहरी दुश्मन से लड़ती है, जबकि पुलिस अपने ही समाज के बीच काम करती है। इसलिए उससे अपेक्षा भी अलग, संयम, धैर्य और इंसानियत की।

अगर हर विरोध प्रदर्शन को दुश्मनी की नज़र से देखा जाएगा और असहमति को अपराध समझा जाएगा, तो लोकतंत्र की आत्मा जख्मी होगी। पुलिस की ताक़त डंडे या हथियार में नहीं, बल्कि संवाद और विश्वास में निहित है।

सुधार केवल संसाधन बढ़ाने से नहीं आएगा। इसके लिए सोच और व्यवस्था दोनों में बदलाव जरूरी है। स्वतंत्र शिकायत प्राधिकरण की स्थापना, सीसीटीवी और बॉडी कैमरों का प्रभावी उपयोग, मानवाधिकार आधारित प्रशिक्षण और राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्ति , ये कदम बुनियादी हैं।

थानों को डर का प्रतीक नहीं, भरोसे का केंद्र बनाना होगा। जवाबदेही और पारदर्शिता के बिना सुधार अधूरा रहेगा।
लोकतंत्र में पुलिस की असली शक्ति उसकी वर्दी नहीं, बल्कि जनता का विश्वास है। अगर यह विश्वास टूट जाए, तो कानून का ढांचा केवल कागज़ी रह जाता है।