
सुनील कुमार महला
इस साल देशभर में बारिश बहुत ज्यादा कहर मचा रही है। जगह-जगह तबाही का आलम है।बरसात, जो कभी वरदान कहलाती थी, आज कई राज्यों में कहर बनकर बरस रही है।सच तो यह है कि इस बार मॉनसून ने अपनी रौद्र लीला से पूरे उत्तर भारत को हिलाकर रख दिया है। देश में बहुत सी नदियां उफान पर हैं,तो बांध खतरे के निशान को छू रहे हैं, और जगह-जगह भूस्खलन व बादल फटने की घटनाएं प्रकृति के रौद्र रूप की भयावह तस्वीर पेश कर रही हैं। मीडिया के हवाले से आई खबरों से पता चलता है कि उत्तर भारत में लगातार भारी बरसात के बाद जम्मू के कटरा स्थित वैष्णोदेवी धाम के मार्ग पर भूस्खलन से अब तक 38 लोगों की मौत हो गई है। बहुत ही दुखद है कि दर्शन की लालसा में निकले श्रद्धालु अचानक आई इस त्रासदी का शिकार हो गए। जानकारी के अनुसार मंदिर दर्शन के लिए जा रहे कई श्रद्धालु अर्धकुंवारी के पास मार्ग पर भूस्खलन व भारी बारिश की चपेट में आ गए। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार मंदिर मार्ग पर कई जगह पत्थर गिरने से हादसे हुए।सेना के जवान और बचाव दल लगातार राहत कार्यों में जुटे हैं।इधर, भूस्खलन के बाद वैष्णोदेवी की यात्रा भी रोक दी गई। इस घटना पर हमारे देश के प्रधानमंत्री सहित देशभर ने मृतकों के प्रति गहरा शोक व संवेदना व्यक्त की है। यह पहली बार है कि वैष्णो देवी यात्रा में इतनी बड़ी त्रासदी सामने आई है। यहां पाठकों को बताता चलूं कि जम्मू-कश्मीर में पिछले 24 घंटों में 210 एमएम तथा जम्मू में 380 बारिश दर्ज की गई है। यहां हुई बारिश ने पिछले कई सालों का रेकॉर्ड तोड़ दिया है। मीडिया में आया है कि जम्मू-पठानकोट तथा जम्मू-श्रीनगर हाइवे को भारी क्षति पहुंची है। तवी, चिनाब नदी सहित अन्य नदियों के उफान व बाढ़ से स्थानीय जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया है। जानकारी के अनुसार सेना ने 10 हजार से ज्यादा लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया है।इधर, रेलवे ने जम्मू मार्ग की 58 ट्रेनों का संचालन निरस्त किया है, वहीं 18 ट्रेनों का रूट बदला गया है। उधर, हिमाचल प्रदेश की नदियां व्यास-सतलुज व रावी में भारी बाढ़ चल रही है। चंडीगढ़-मनाली हाइवे को भारी क्षति होने से कुल्लु व मनाली का सम्पर्क कट गया है। लेह एयरपोर्ट से सभी उड़ानें निरस्त कर दी गई हैं। इतना ही नहीं, पठानकोट पंजाब के माधोपुर हेडवर्क्स के निकट बुधवार 27 अगस्त को सेना के हेलिकॉप्टर ने एक इमारत से 22 सीआरपीएफ जवानों और नागरिकों को निकालकर एक बड़ा हादसा टाल दिया। पंजाब में बाढ़ जैसे हालात हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार पोंग व भाखड़ा-नांगल बांधों से पानी निकासी के बाद भयानक बाढ़ से पठानकोट, गुरदासपुर, होशियारपुर, कपूरथला, फिरोजपुर सहित कई क्षेत्रों में हालात बिगड़ गए। गुरदासपुर में नवोदय विद्यालय के ग्राउंड फ्लोर पर 5 फीट से ज्यादा पानी भरने से 400 विद्यार्थी व शिक्षक फंस गए। रावी नदी में बाढ़ के कारण करतारपुर कॉरिडोर पर 7 फीट तक पानी भर गया। इसके कारण पाकिस्तान में करतारपुरा गुरुद्वारा साहिब भी डूब गया बताते हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार सभी को निकालते ही इमारत भी बह गई।इसी क्रम में हिमाचल प्रदेश की नदियां भी रौद्र रूप धारण कर चुकी हैं। चम्बा में मणि महेश यात्रा बाधित हुई और करीब 2,000 यात्री जगह-जगह फंसे। पंजाब में बांधों(डैम्स)का पानी खतरे के निशान तक पहुंच गया है और गेट खोलने की नौबत आ चुकी है। छत्तीसगढ़ में हालात बुरे हैं। जानकारी के अनुसार छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में बीते दो दिन बारिश ने तबाही मचा दी।इसे 94 साल बाद बड़ी आपदा बताया जा रहा है। खबरों के अनुसार बीते 24 घंटे में 217 एमएम बारिश दर्ज की गई है तथा सेना ने हेलिकॉप्टर से बाढ़ में फंसे 100 लोगों को रेस्क्यू किया है। एक जानकारी के अनुसार यहां कार के साथ बहे परिवार के चार लोगों की मौत हो गई।इधर, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर में भी हालात बेकाबू होते जा रहे हैं। सड़कें, पुल और मार्ग बाधित हो रहे हैं। कहना ग़लत नहीं होगा कि धार्मिक यात्राओं पर यह प्राकृतिक प्रकोप गहरा असर डाल रहा है। बहरहाल, पाठकों को बताता चलूं कि आइएमडी के अनुसार जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड, हिमाचल, पूर्वी राजस्थान, हरियाणा, गुजरात-कोंकण व मध्य महाराष्ट्र में अगले 7 दिन भारी बरसात की संभावना जताई गई है।पश्चिमी व दक्षिणी राजस्थान में 29 से 31 अगस्त तक, उत्तरप्रदेश में 1 से 2 सितम्बर तक तथा छत्तीसगढ़, बिहार व झारखंड में 28 अगस्त से 1 सितम्बर तक भारी बारिश की संभावना जताई गई है। आंकड़े बताते हैं कि उत्तर भारत में 12 साल बाद सबसे ज्यादा बारिश हुई है। विदित हो कि साल 2013 में केदारनाथ में आई विनाशकारी बाढ़ के बाद उत्तर भारत में इस साल सामान्य से 21% ज्यादा बारिश हुई हैं। आइएमडी के अनुसार 2021 के बाद इस बार उत्तर भारत के राज्यों में बेहद भारी बरसात हुई हैं। कहना ग़लत नहीं होगा कि आज अंधाधुंध विकास के बीच हम प्रकृति से लगातार खिलवाड़ कर रहे हैं और हमें इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। प्राकृतिक आपदाओं के सामने मनुष्य आज असहाय प्रतीत होता है। निश्चित ही इससे देश की अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है। हजारों लोगों की आजीविका पर भी व्यापक असर पड़ता है। जन-जीवन अस्त-व्यस्त तो होता ही है। ऐसे में सरकार और संबंधित राज्य प्रशासन की यह जिम्मेदारी बनती है कि यात्रियों की सुरक्षा, मार्गों की मरम्मत, मौसम की पूर्व चेतावनी और आपदा-निवारण व्यवस्था को मजबूत करें।बारिश का यह कहर हमें कहीं न कहीं एक गहरा संदेश देता है – प्रकृति को हल्के में लेना हमारी सबसे बड़ी भूल है।बाढ़ अत्यधिक वर्षा, नदियों के उफान, बांध टूटने या बादल फटने के कारण आती है। इसमें नदियाँ और नाले खतरे के निशान से ऊपर बहने लगते हैं, जिससे गांव-शहर जलमग्न हो जाते हैं। कहना ग़लत नहीं होगा कि मनुष्य अपनी सुविधाओं और लालच के लिए लगातार प्रकृति से खिलवाड़ कर रहा है। जंगलों की कटाई, नदियों का दोहन, प्रदूषण, अंधाधुंध शहरीकरण और औद्योगिकीकरण ने पर्यावरण का संतुलन बिगाड़ दिया है। इसका परिणाम हमें भूकंप, बाढ़, सूखा, भूस्खलन, ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन जैसी आपदाओं के रूप में भुगतना पड़ रहा है। अंत में यही कहूंगा कि प्रकृति और विकास का संतुलन बनाए रखना मानव जीवन के लिए आवश्यक है। केवल आर्थिक प्रगति ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि पर्यावरण और पारिस्थितिकी का संरक्षण भी उतना ही ज़रूरी है। सतत विकास वही है, जिसमें प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग सोच-समझकर किया जाए। पेड़-पौधों, जल, भूमि और वायु को सुरक्षित रखकर ही आने वाली पीढ़ियों को बेहतर जीवन दिया जा सकता है। हमें यह चाहिए कि हम प्रकृति का सम्मान करें और संसाधनों को नष्ट न करें, अन्यथा प्रकृति हमें कहीं का भी नहीं छोड़ेगी।