‘मुफ़्त रेवड़ी आवंटन’ फ़िक्रमंद अदालत बेफ़िक्र सरकार ?

'Free Rewadi Allocation' Worried Court, Carefree Government?

तनवीर जाफ़री

हमारे देश की राजनीति में नेताओं की ‘सत्ता लोलुपता’ से देश की आर्थिक स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। केंद्र सरकार से लेकर अनेक राज्य सरकारों द्वारा मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिये ऐसी ऐसी योजनायें शुरू की गयी हैं जिनका सीधा प्रभाव देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। आज देश के ऐसे कई राज्य जोकि भारी क़र्ज़ और बजट घाटे में होने के बावजूद चुनाव से पहले मुफ़्त बिजली, मुफ़्त राशन, मुफ़्त रसोई गैस आदि बाँट रहे हैं। कहीं बैंक क़र्ज़ मुआफ़ कर दिया जाता है। यहाँ तक कि अब तो कुछ राज्यों में चुनाव से ठीक पहले मतदाताओं के खातों में नक़द धनराशि भी हस्तानांतरित की जा रही है।

मतदाताओं को ‘मुफ़्त रेवड़ी ‘ बांटने की इस क़वायद का दूरगामी प्रभाव यह होता है कि इससे सरकारों के पास विकास कार्यों हेतु व बुनियादी ढांचे को मज़बूत करने के लिए पैसे नहीं बच पाते। परन्तु यह निखट्टू लोगों की राजनीति में सक्रियता का ही परिणाम है कि इन सत्तालोलुप लोगों को केवल मतदाताओं के वोट अपने पक्ष में करने व सत्ता में बने रहने के लिये राज्यों का भारी क़र्ज़ में डूबना भी मंज़ूर है और राज्य का बजट घाटे में जाना भी स्वीकार है।

परन्तु सत्ता की इसी तरह की ग़ैर ज़िम्मेदाराना योजनाओं पर देश की उच्च अदालतें कई बार अपनी चिंतायें ज़ाहिर कर चुकी है। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली सर्वोच्च न्यायलय की एक बेंच द्वारा की गयी ऐसी ही एक ताज़ातरीन तल्ख़ टिप्पणी गत 19 फ़रवरी को एक बार फिर सामने आयी जो ग़ैर ज़िम्मेदार सत्ताधीशों के लिये आँखें खोलने वाली हैं। तमिलनाडु पावर डिस्ट्रीब्यूशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड की एक याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत द्वारा यह टिप्पणी उस समय की गयी जब तमिलनाडु सरकार द्वारा सभी उपभोक्ताओं को मुफ़्त बिजली देने के प्रस्ताव पर चर्चा हो रही थी। इस दौरान सर्वोच्च न्यायलय ने मुख्य रूप से यह कहा कि -‘कई राज्य पहले से ही भारी क़र्ज़ और बजट घाटे में हैं, फिर भी चुनाव से पहले मुफ़्त बिजली, मुफ़्त राशन , रसोई गैस, कैश ट्रांसफर जैसी मुफ़्त सुविधाएं बांट रहे हैं। इससे विकास और बुनियादी ढांचे के लिए पैसे नहीं बचते। अगर सरकारें लोगों को सुबह से शाम तक सब कुछ मुफ़्त देती रहेंगी, तो लोग काम क्यों करेंगे? इससे काम करने की आदत ख़त्म हो जाएगी और लोग आलसी बन जाएंगे। ग़रीबों की मदद करना समझ में आता है, लेकिन अमीर-ग़रीब में फ़र्क़ किए बिना सबको मुफ़्त सुविधाएं देना ग़लत है। यह एक तरह की “तुष्टीकरण ” नीति है, जो राष्ट्र निर्माण में बाधा डालती है’।

इतना ही नहीं बल्कि माननीय अदालत ने सरकार से यह भी पूछा कि आप “किस तरह का कल्चर बना रहे हैं?” अदालत ने चेतावनी देते हुये कहा कि ‘विकास के लिए एक पैसा भी नहीं बचेगा अगर यह सिलसिला जारी रहा’। साथ ही सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य सरकारों को रोज़गार सृजन पर फ़ोकस करने की सलाह दी, न कि सिर्फ़ मुफ़्त चीज़ें बांटने पर। यह सुनवाई के दौरान की गई मौखिक टिप्पणियां थीं, जो फ़्री बीज़ कल्चर पर कोर्ट की बढ़ती चिंता को दिखाती हैं। पूर्व में भी ‘मुफ़्त रेवड़ी आवंटन’ को लेकर न्यायालय अपनी चिंतायें ज़ाहिर कर चुकी हैं। 2022-2024 के दौरान भी अदालत ने ‘मुफ़्त की रेवड़ी ‘ बांटने को चुनावी लालच देने से जोड़ते हुये कहा था कि यह लोकतंत्र और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए नुक़्सानदेह है। अदालत ने यह भी बार-बार कहा कि कल्याणकारी योजनाएं ज़रूरतमंदों के लिए तो ठीक हैं, लेकिन अनुचित मुफ़्त वादे विकास को रोकते हैं। गोया सर्वोच्च न्यायालय “मुफ़्त रेवड़ी” कल्चर को न केवल आर्थिक बोझ बता चुका है बल्कि इसे काम की संस्कृति और राष्ट्र निर्माण के ख़िलाफ़ भी माना है। यह आलोचना समय-समय पर दोहराई जाती रही है, ख़ासतौर पर तब जबकि राज्य सरकारें चुनावों से पहले ऐसी योजनाएं घोषित करती हैं। केवल अदालतें ही नहीं बल्कि स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी 2022 में “रेवड़ी कल्चर को ख़तरनाक बता चुके हैं।

यही मुफ़्त रेवड़ी कल्चर गत अक्टूबर 2025 में बिहार विधानसभा चुनावों के दौरान तो अनैतिकता की अपनी सारी हदें पार कर गया। याद रहे कि बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का शेड्यूल 6 अक्टूबर 2025 को घोषित हुआ था और उसी दिन चुनाव आचार संहिता भी लागू हो गयी थी। परन्तु चुनाव आचार संहिता की धज्जियाँ उड़ाते हुये बिहार की नितीश सरकार ने अक्टूबर-नवंबर 2025 में कई बार महिलाओं के खातों में 10-10 हज़ार रुपये डायरेक्ट ट्रांसफर कर दिये। बिहार में मुख्यमंत्री महिला रोज़गार योजना के तहत चुनाव घोषित होने के बाद भी महिलाओं के खातों में पैसे ट्रांसफ़र किये जाने पर काफ़ी विवाद भी हुआ था। परन्तु चुनाव पर इसका असर यह हुआ नीतीश कुमार की अगुवाई में एन डी ए ने बिहार के 2025 के विधान सभा चुनाव में बड़ी जीत हासिल की। कई विश्लेषकों ने दावा किया कि महिला मतदाताओं के खातों में 10-10 हज़ार रुपये डायरेक्ट ट्रांसफ़र करने के कारण महिलाओं की मतदान दर बढ़ी क्योंकि महिलाओं को इसका सीधे फ़ायदा मिला।

परन्तु विपक्षी दलों ने इसे “चुनावी रिश्वत” या “वोट ख़रीदने” की कोशिश क़रार दिया था । कुछ सांसदों ने चुनाव आयोग को पत्र लिखकर शिकायत की थी कि यह चुनाव आचार संहिता का खुला उल्लंघन है और निष्पक्ष चुनाव को प्रभावित करता है। कुछ विपक्षी नेताओं ने इसी ‘रेवड़ी ‘ के आधार पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की, जिसमें चुनाव को रद्द करने और नए चुनाव कराने की मांग की गई। और इसे संविधान और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 123 (भ्रष्ट आचरण) का उल्लंघन बताया।

इसी तरह भारत सरकार द्वारा प्रधानमंत्री ग़रीब कल्याण अन्न योजना के तहत मुफ़्त राशन योजना चलाई जा रही है जो राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 के तहत संचालित होती है। यह योजना कोरोना महामारी के दौरान शुरू हुई थी, लेकिन अब इसे स्थायी रूप से विस्तारित कर दिया गया है। सरकारी दावों के अनुसार 1 जनवरी 2024 से अगले 5 वर्षों (यानी दिसंबर 2028 तक) के लिए सरकार ने लगभग 81.35 करोड़ लाभार्थियों को मुफ़्त खाद्यान्न प्रदान करने का फ़ैसला किया है। वर्तमान में लगभग 80 करोड़ लोग इस योजना के तहत मुफ़्त राशन प्राप्त कर रहे हैं। यह दुनिया की सबसे बड़ी खाद्य सुरक्षा योजनाओं में से एक है। आलोचकों का कहना है कि इस योजना से भी जहाँ लोगों में मुफ़्तख़ोरी की संस्कृति बढ़ेगी वहीँ इस ‘मुफ़्त रेवड़ी ‘ का लाभ सत्ता को मिलेगा। बड़ा आश्चर्य है कि आज इस ‘मुफ़्त रेवड़ी आवंटन’ को लेकर अदालतें तो फ़िक्रमंद हैं जबकि सरकार पूरी तरह बेफ़िक्र है ?