अजय कुमार बियानी
भारतीय संस्कृति में पर्व केवल कैलेंडर की तिथियाँ नहीं होते, वे भावनाओं, विश्वास और परंपराओं के जीवंत उत्सव होते हैं। जब कोई शिशु किसी विशेष पर्व पर जन्म लेता है, तो परिवार उसे केवल संयोग नहीं मानता, बल्कि ईश्वर का विशेष आशीर्वाद समझता है। हमारे समाज में यह विश्वास गहराई से रचा-बसा है कि समय भी अपनी पवित्रता लेकर आता है। ऐसी ही अनुभूति तब होती है, जब एक नन्ही बिटिया का जन्म दुर्गा अष्टमी के पावन दिन और एक नन्हे शिशु का आगमन महाशिवरात्रि जैसे महान पर्व पर हो।
दुर्गा अष्टमी का दिन शक्ति, साहस और मातृत्व का प्रतीक माना जाता है। नवरात्रि के नौ दिनों में यह अष्टमी विशेष महत्व रखती है। घर-घर में कन्या पूजन होता है, देवी को शक्ति स्वरूपा मानकर आराधना की जाती है। ऐसे दिन यदि किसी परिवार में कन्या जन्म ले, तो वह केवल एक सदस्य का आगमन नहीं, बल्कि उस शक्ति के साक्षात् स्वरूप के आने जैसा अनुभव होता है। यह संदेश भी है कि बेटियाँ केवल घर की रौनक नहीं, बल्कि समाज की धुरी हैं। दुर्गा अष्टमी पर जन्मी बालिका परिवार को यह स्मरण कराती है कि नारी ही सृजन की आधारशिला है।
दूसरी ओर, महाशिवरात्रि तप, त्याग और आस्था का महापर्व है। यह वह रात्रि है जब श्रद्धालु उपवास रखते हैं, भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं और पूरी रात जागरण कर आराधना में लीन रहते हैं। शिव केवल संहार के देव नहीं, बल्कि संतुलन, धैर्य और करुणा के प्रतीक हैं। यदि ऐसे दिन किसी परिवार में पुत्र का जन्म हो, तो वह केवल नई पीढ़ी का आगमन नहीं, बल्कि मूल्यों और संतुलन की नई शुरुआत का संकेत बन जाता है। महाशिवरात्रि पर जन्मा शिशु मानो यह संदेश देता है कि जीवन में संयम, सरलता और सहिष्णुता ही सच्ची शक्ति है।
इन दोनों जन्मों को केवल धार्मिक प्रतीकों से जोड़ देना पर्याप्त नहीं है। यह अवसर हमें सामाजिक दृष्टि से भी सोचने को प्रेरित करता है। एक ओर हम नारी शक्ति की आराधना करते हैं, दूसरी ओर समाज में कन्या के प्रति भेदभाव की घटनाएँ भी सामने आती हैं। दुर्गा अष्टमी पर जन्मी बेटी हमें यह आत्ममंथन करने का अवसर देती है कि क्या हम वास्तव में बेटियों को वह सम्मान और अवसर दे पा रहे हैं, जिसकी हम पूजा में कामना करते हैं? पूजा की थाली से आगे बढ़कर क्या हम उनके सपनों को पंख दे रहे हैं?
उसी प्रकार, महाशिवरात्रि पर जन्मा पुत्र हमें यह याद दिलाता है कि पुरुषत्व का अर्थ केवल अधिकार नहीं, बल्कि जिम्मेदारी भी है। शिव का स्वरूप हमें सिखाता है कि शक्ति और करुणा साथ-साथ चलती हैं। समाज में बढ़ती प्रतिस्पर्धा और भौतिकता के बीच यदि हम नई पीढ़ी को संतुलन, नैतिकता और संवेदनशीलता का संस्कार दे सकें, तो यही सच्ची आराधना होगी।
भारतीय परिवारों में ऐसे शुभ संयोगों को पीढ़ियों तक याद रखा जाता है। दादा-दादी, नाना-नानी इन तिथियों को केवल जन्मदिन के रूप में नहीं, बल्कि आशीर्वाद के प्रतीक के रूप में संजोते हैं। यह परंपरा केवल भावनात्मक नहीं, सांस्कृतिक निरंतरता का भी प्रमाण है। जब बच्चे बड़े होंगे और उन्हें बताया जाएगा कि उनका जन्म दुर्गा अष्टमी और महाशिवरात्रि जैसे पावन दिनों पर हुआ था, तो यह उनके आत्मविश्वास और पहचान का हिस्सा बनेगा। वे जानेंगे कि उनका जीवन केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि परंपरा और आस्था की धारा से जुड़ा हुआ है।
आज के वैज्ञानिक युग में कुछ लोग ऐसे विश्वासों को मात्र संयोग मान सकते हैं। परंतु भारतीय समाज में आस्था और तर्क साथ-साथ चलते हैं। पर्वों पर जन्म लेना कोई अलौकिक चमत्कार नहीं, लेकिन उससे जुड़ी भावनाएँ और प्रेरणाएँ निश्चित ही सकारात्मक ऊर्जा देती हैं। यदि इन संयोगों के माध्यम से परिवार अपने बच्चों को बेहतर संस्कार देने का संकल्प ले, तो यही सबसे बड़ा उत्सव है।
नवरात्रि की अष्टमी पर जन्मी पोती और महाशिवरात्रि पर जन्मा पोता — यह केवल दो तिथियाँ नहीं, बल्कि शक्ति और शिवत्व का संगम हैं। एक ओर सृजन की ऊर्जा, दूसरी ओर संतुलन की साधना। जब घर-आंगन में ऐसी किलकारियाँ गूंजती हैं, तो लगता है मानो पर्व केवल मंदिरों और पंडालों तक सीमित नहीं, बल्कि परिवार की मुस्कानों में भी जीवित हैं।
अंततः, यह हमें याद दिलाता है कि त्योहार केवल परंपरा निभाने के लिए नहीं, बल्कि मूल्यों को जीने के लिए होते हैं। यदि इन शुभ जन्मों के बहाने हम अपने घरों में समानता, संस्कार और संवेदनशीलता का दीप जला सकें, तो यही सच्चा उत्सव होगा। नवरात्रि की शक्ति और महाशिवरात्रि की शांति — जब दोनों का आशीर्वाद एक ही परिवार में उतर आए, तो वह घर सचमुच एक छोटे से तीर्थ के समान हो जाता है।





