दिलीप कुमार पाठक
दुनिया के मानचित्र पर जब भी किसी देश की सीमाएं सुलगती हैं, तो उसकी लपटें हजारों मील दूर बैठे एक भारतीय परिवार की रसोई तक पहुँचने में देर नहीं लगातीं। आज की वैश्वीकृत दुनिया में सरहदों पर गिरा हर बम हमारी जेब में एक अदृश्य छेद कर देता है। एक अजीब सा विरोधाभास देखने को मिल रहा है। एक तरफ सरकारी प्रेस रिलीज और दावे सब कुछ सामान्य होने की बात कह रहे हैं, तो दूसरी तरफ हकीकत यह है कि मोहल्लों की दुकानों और गैस एजेंसियों के बाहर स्टॉक खत्म होने की तख्तियां लटक रही हैं। सत्ता के गलियारों से जब यह बयान आता है कि देश में गैस की कोई कमी नहीं है, तो यह सुनकर उस कतार में खड़े आम आदमी को सुकून कम और खीझ ज्यादा होती है, जो पिछले कई दिनों से अपने गैस कनेक्शन के रिफिल होने का इंतजार कर रहा है। सवाल यह है कि अगर गैस की कमी नहीं है, तो फिर वह आम आदमी के चूल्हे तक पहुँच क्यों नहीं रही?
राजनीति और कूटनीति की वह बारीक परत है जिसे समझना जरूरी है। सरकार का यह तर्क तकनीकी रूप से सही हो सकता है कि हमारे पास पर्याप्त भंडारण है, लेकिन उपलब्धता और पहुँच के बीच की कड़ी बुरी तरह चरमरा गई है। वैश्विक स्तर पर बढ़ते तनाव ने रसद और परिवहन की कमर तोड़ दी है। जो जहाज पंद्रह दिन में भारत पहुँचते थे, वे अब रास्ता बदलकर आ रहे हैं, जिससे न केवल समय बढ़ गया है बल्कि माल ढुलाई का खर्च भी चालीस प्रतिशत तक ऊपर चला गया है। लेकिन क्या सारा दोष केवल भूगोल और युद्ध पर मढ़ा जा सकता है? हकीकत यह है कि जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें अस्थिर होती हैं, तो सरकारी तेल कंपनियां अपने घाटे को कम करने के लिए आपूर्ति की गति धीमी कर देती हैं। यह एक अलिखित राशनिंग है, जहाँ ऊपर से तो कहा जाता है कि सप्लाई जारी है, लेकिन नीचे वितरकों तक कोटा कम पहुँच रहा है। सरकारी दावों और जमीनी किल्लत के बीच का यही वह धुंधला क्षेत्र है जहाँ आम आदमी पिस रहा है। यहाँ सबसे बड़ा सवाल सिस्टम की पारदर्शिता पर खड़ा होता है। यदि सरकार के पास पर्याप्त स्टॉक मौजूद है, तो वितरण के स्तर पर यह अचानक गायब कैसे हो जाता है? क्या यह आपूर्ति की बाधा है या फिर संकट की आड़ में छिपी हुई कालाबाजारी का पुराना खेल? जब आपूर्ति शृंखला में अनिश्चितता आती है, तो बिचौलियों और मुनाफाखोरों की चांदी हो जाती है, जो कृत्रिम कमी पैदा करके आम आदमी की लाचारी का फायदा उठाते हैं। सरकार को केवल पोर्टल्स पर डेटा अपडेट करने के बजाय उन जमीनी लीकेज को बंद करना होगा, जहाँ से जनता का राशन और हक रिसकर अवैध गोदामों तक पहुँच जाता है। किसी भी आपदा की पहली मार गरीब और मध्यम वर्ग पर ही क्यों पड़ती है, जबकि बड़े कारोबारी इसी संकट को अवसर में तब्दील कर लेते हैं? सरकारी तंत्र की सुस्ती और निगरानी की कमी ने ही आज एक साधारण गैस सिलेंडर को दुर्लभ वस्तु बना दिया है।
सरकार आज बड़े आर्थिक सुधारों के जरिए अर्थव्यवस्था को आधुनिक बनाने की बात कर रही है। लेकिन क्या कोई देश तब तक विकसित कहला सकता है जब उसकी आधी आबादी को आज भी इस बात की चिंता सताए कि कल सुबह चाय बनाने के लिए सिलेंडर में गैस बचेगी या नहीं? यह केवल आंकड़ों का खेल नहीं है; यह उस माँ की जद्दोजहद है जिसे गैस के दाम बढ़ने पर बच्चों के स्कूल की फीस या फल-सब्जियों के बीच चुनाव करना पड़ता है। सरकार अक्सर वैश्विक हालात हाथ में न होने का तर्क देकर पल्ला झाड़ लेती है, लेकिन आपदा प्रबंधन और भविष्य की योजनाएं केवल कागजों पर क्यों मजबूत दिखती हैं? अगर हम जानते थे कि वैश्विक तनाव बढ़ रहा है, तो देश के भीतर आपूर्ति तंत्र को इतना लचीला क्यों नहीं बनाया गया कि वह इन झटकों को सह सके? आज देश को स्वस्थ और आत्मनिर्भर बनाने के कई लक्ष्यों की चर्चा हो रही है, लेकिन पोषण और स्वास्थ्य का सीधा संबंध रसोई से है। अगर ईंधन महंगा होगा या मिलेगा ही नहीं, तो बाकी सारी बातें बेमानी हो जाएंगी। मध्यम वर्ग आज खुद को एक ऐसे चक्रवर्ष में फंसा हुआ महसूस कर रहा है जहाँ एक तरफ उसे सुनहरे भविष्य के सपने दिखाए जा रहे हैं, और दूसरी तरफ उसे बुनियादी सुविधाओं के लिए भी जद्दोजहद करनी पड़ रही है। निष्कर्षतः, सरकार को केवल आंकड़ों की बाजीगरी से काम नहीं चलाना चाहिए। अगर स्टॉक है, तो वह कालाबाजारी में जाने के बजाय सीधे उपभोक्ता तक क्यों नहीं पहुँच रहा? सप्लाई चेन की इस लीकेज को ठीक करना सरकार की जिम्मेदारी है, न कि वैश्विक तनाव का बहाना बनाकर पल्ला झाड़ लेना। लोकतंत्र में जनता को संसाधनों पर पूरा अधिकार है। जब तक हर घर का चूल्हा बिना किसी डर और देरी के नहीं जलता, तब तक विकास का हर दावा अधूरा है।





