राजेश जैन
सुबह सैर कर घर में घुसते ही मैंने देखा-मेरी दस साल की बिटिया गुड़िया ऐसे बिलख रही थी, जैसे किसी ने उसके बचपन का सबसे चमकीला रंग चुरा लिया हो।
“पापा… वे मुन्नू को ले गए।”
मुन्नू-घर के बाहर सड़क पर रहने वाला वही कुत्ता, जो न तो हमारी जाति पूछता था, न धर्म, न आधार कार्ड। जो रोज़ सुबह पूंछ हिलाकर सबको खुश कर देता था। नगर निगम की गाड़ी आई और उसे “समस्या” समझकर उठा ले गई। गुड़िया की आंखों में सवाल थे-मुन्नू ने किसका क्या बिगाड़ा था? अब उसे कौन खाना देगा? उसकी पीठ सहलाएगा। ठंड लगे तो कौन गत्ते का घर बनाएगा कम्बल ओढ़ाएगा…
मेरे पास जवाब नहीं था। सच तो यह है कि मेरे पास सवाल भी पूरे नहीं थे। मैं बस सन्न था-जैसे भीतर कोई शीशा टूटा हो, जिसकी आवाज़ बाहर तक न गई हो।
दिन भर रोज़मर्रा के काम निपटाते हुए यही सोचता रहा- यह कैसी दुनिया है, जहां ताकत का मतलब सिर्फ उठाने की ताकत है, संभालने की नहीं। यहां जिसके हाथ में लाठी है, वही तय करता है कि भैंस किसकी है। और भैंस न मिले तो कुत्ता ही सही।
दफ्तर पहुंचा तो बॉस की आवाज़ पहले से ऊंची थी।
“टारगेट पूरे क्यों नहीं हुए?”
मैंने मन ही मन पूछा-“हवा कब से टारगेट बनने लगी?”
बॉस सेठ से परेशान है, सेठ कंपनी से, कंपनी नेता से, नेता बड़े-बड़े उद्योगपतियों से और उद्योगपति दुनिया से-जो कभी बाजार नहीं बनती। ऊपर से नीचे तक एक लंबी धमकी-श्रृंखला है, जिसमें हर कोई अगले से डरता है और पिछले पर चिल्लाता है। इस पूरी सीढ़ी में कहीं भी करुणा नहीं है।
शाम को पानी की बोतल खाली हुई तो याद आया-नल का पानी साफ़ नहीं है? दफ्तर से बाहर निकला तो हवा में धुआं मिला था। ऐसा कि सांस लेते हुए लगता है, जैसे फेफड़े भी मास्क मांग रहे हों। प्रकृति अब चुप नहीं है; वह भी आंखें दिखा रही है। कभी सूखा, कभी बाढ़, कड़कड़ाती सर्दी तो कभी चिलचिलाती गर्मी। जैसे कह रही हो, “तुमने मुझे समस्या समझा, अब मैं समाधान नहीं दूंगी।”
और हम? हम रोज़ किसी न किसी मुन्नू को उठा ले जाते हैं। कभी सड़क से, कभी नौकरी से, कभी रिश्तों से। हम कहते हैं-यह व्यवस्था है। व्यवस्था वही, जो कमजोर को साफ़-सफाई का कचरा समझ ले। कचरा उठाने वाली गाड़ी आती है, गाना बजती है और शहर थोड़ा “सुंदर” हो जाता है। सुंदर-पर सूना।
घर लौटकर गुड़िया ने फिर पूछा—“पापा, मुन्नू अब कहां होगा?”
मैंने कहा—“पता नहीं।”
सच यह था कि मुझे पता था-मुन्नू अब हमारी संवेदनाओं से बहुत दूर होगा। किसी शेल्टर में, किसी फाइल में, किसी आंकड़े में। आंकड़े बहुत सभ्य होते हैं-वे रोते नहीं, वे सवाल नहीं करते।
रात को खबरें चलीं। कोई नेता भाषण दे रहा था-देश महान है। किसी इंटनेशनल नेता को विनेज़ुएला के बाद ग्रीनलैंड, कनाडा चहिए था। स्क्रीन के कोने में स्टॉक मार्केट की हरी रेखाएं दौड़ रही थीं। किसी चैनल पर बहस थी-कुत्ते किसकी जिम्मेदारी हैं?
मैंने टीवी बंद कर दिया। गुड़िया की सिसकी ज्यादा सच्ची थी।
लेकिन क्या करूं। हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं, जहां “प्रबंधन” सबसे बड़ा धर्म है। समस्या हो तो मैनेज करो। दर्द हो तो मैनेज करो। आंसू हो तो मैनेज करो। और अगर कोई मुन्नू रास्ते में आ जाए-तो उठा लो। हम भूल गए हैं कि कुछ चीजें मैनेज नहीं होतीं, बस अपनाई जाती हैं।
सुबह उठा तो सड़क खाली थी। वही जगह, वही धूप-बस मुन्नू नहीं था। गुड़िया ने स्कूल जाने से पहले कटोरी में रोटी रखी-“अगर मुन्नू आ जाए।”
मैंने कुछ नहीं कहा। शायद इसलिए कि कुछ कहने से ज्यादा जरूरी था-कुछ सीखना।
सीख यह कि ताकत का असली इम्तहान तब होता है, जब आपके पास उठाने की नहीं, रोकने की ताकत हो। जब आप कह सकें-“नहीं, यह गलत है।”
लेकिन हमारी दुनिया में “नहीं” कहने की नौकरी नहीं होती।
हम सब किसी न किसी के बॉस हैं—किसी बच्चे के, किसी कर्मचारी के, किसी जानवर के, किसी नदी के। और हम सब किसी न किसी के अधीन भी हैं। सवाल सिर्फ इतना है—हम ऊपर से जो डर पाते हैं, उसे नीचे किस पर उतारते हैं?
गुड़िया सो गई। मैंने खिड़की से बाहर देखा—एक और कुत्ता दूर खड़ा था। आंखें हमारी तरफ थीं। जैसे पूछ रहा हो—“मेरी बारी कब?”
मैंने पर्दा नहीं गिराया। पहली बार लगा—शायद देखने से ही शुरुआत होती है। शायद किसी मुन्नू को बचाने के लिए दुनिया बदलनी नहीं पड़ती—बस अपनी आदतें बदलनी पड़ती हैं। क्योंकि अगर हम आज मुन्नू के लिए नहीं रुके, तो कल कोई हमारे लिए भी नहीं रुकेगा। और तब हमारी कटोरियां भी भरी होंगी—पर उन्हें सूंघने वाला कोई नहीं होगा।





