भविष्य के जलवायु समझौतों के लिए मार्गदर्शक दस्तावेज: क्योटो प्रोटोकॉल

Guiding Document for Future Climate Agreements: The Kyoto Protocol

सुनील कुमार महला

पर्यावरणीय दृष्टि से 16 फरवरी का दिन अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि 16 फरवरी 2005 को क्योटो प्रोटोकॉल आधिकारिक रूप से लागू हुआ था, जो जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए विश्व का पहला कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय समझौता था। इसे 1997 में जापान के क्योटो शहर में अपनाया गया था और यह संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा अभिसमय (यूएनएफसीसीसी) के अंतर्गत बनाया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य औद्योगिक (विकसित) देशों द्वारा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को 1990 के स्तर की तुलना में कम करना था, ताकि वैश्विक तापमान वृद्धि को नियंत्रित किया जा सके। वास्तव में आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग की समस्या से प्रभावित है, जिसका प्रमुख कारण बढ़ती जनसंख्या, अंधाधुंध औद्योगिकीकरण, तेज शहरीकरण, विकास कार्यों के नाम पर पेड़ों की कटाई, जीवाश्म ईंधनों (कोयला, पेट्रोलियम, गैस) का अत्यधिक उपयोग, परिवहन, कृषि गतिविधियाँ और प्रदूषण हैं, जिनसे वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा तेजी से बढ़ रही है। ग्रीनहाउस गैसों जैसे कि कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड, जलवाष्प तथा फ्लोरीनयुक्त गैसें आदि वायुमंडल में सूर्य की ऊष्मा को रोककर पृथ्वी का तापमान बढ़ाती हैं, जिसे ग्रीनहाउस प्रभाव कहा जाता है। नवीनतम आँकड़ों के अनुसार वर्ष 2024 में वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन लगभग 57.7 गीगाटन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य तक पहुँच गया, जो अब तक का सबसे अधिक स्तर है और पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 2.3% अधिक है; इस अवधि में उत्सर्जन वृद्धि में भारत का योगदान सबसे अधिक रहा, हालांकि प्रति व्यक्ति उत्सर्जन अभी भी वैश्विक औसत से कम है। पाठकों को बताता चलूं कि भारत में लगभग 3 टन प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष, जबकि वैश्विक औसत लगभग 6.4 टन है। कुल उत्सर्जन के मामले में भारत लगभग 4 गीगाटन वार्षिक उत्सर्जन के साथ विश्व का तीसरा सबसे बड़ा उत्सर्जक है, लेकिन ऐतिहासिक योगदान विकसित देशों से कम है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार 2024 में वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की सांद्रता लगभग 423–425 पीपीएम तक पहुँच गई, जो औद्योगिक क्रांति से पहले की तुलना में लगभग 50% अधिक है और जलवायु जोखिम को बढ़ा रही है। क्योटो प्रोटोकॉल की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता ‘साझा लेकिन भिन्न जिम्मेदारी’ का सिद्धांत था, जिसके अनुसार ऐतिहासिक रूप से अधिक प्रदूषण करने वाले विकसित देशों पर अधिक दायित्व डाला गया, जबकि भारत और चीन जैसे विकासशील देशों को शुरुआती चरण में अनिवार्य उत्सर्जन कटौती से छूट दी गई। इस समझौते के अंतर्गत उत्सर्जन व्यापार, क्लीन डेवलपमेंट मैकेनिज्म (सीडीएम) और संयुक्त कार्यान्वयन जैसे नवाचारपूर्ण तंत्र बनाए गए, जिन्हें फ्लेक्सिबल मैकेनिज्म कहा गया और इन्हीं के माध्यम से कार्बन ट्रेडिंग की अवधारणा विकसित हुई, जिससे विकसित देश अन्य देशों में हरित परियोजनाओं या स्वच्छ तकनीक में निवेश करके कार्बन क्रेडिट खरीद सकते थे। भारत ने सीडीएम के तहत बड़ी संख्या में परियोजनाएँ विकसित कीं, जिससे तकनीकी आधुनिकीकरण, विदेशी निवेश और ‘सर्टिफाइड एमिशन रिडक्शन’ (सीईआर) क्रेडिट के रूप में आर्थिक लाभ मिला तथा भारत वैश्विक कार्बन बाजार का महत्वपूर्ण भागीदार बना। हालांकि, संयुक्त राज्य अमेरिका ने इस समझौते पर हस्ताक्षर तो किए थे, लेकिन इसे अपनी संसद से अनुमोदित नहीं कराया, जिससे इसकी प्रभावशीलता पर प्रश्न उठे, फिर भी इसकी एक बड़ी उपलब्धि यह रही कि इसने उत्सर्जन की निगरानी, रिपोर्टिंग और सत्यापन की सख्त वैश्विक प्रणाली विकसित की, जो आज भी अंतरराष्ट्रीय जलवायु व्यवस्था की आधारशिला मानी जाती है। आगे चलकर वैश्विक जलवायु प्रयासों को अधिक व्यापक बनाने के लिए 2015 में पेरिस समझौता अस्तित्व में आया, जिसमें लगभग सभी देशों को जलवायु कार्रवाई के साझा लक्ष्य में शामिल किया गया; संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की रिपोर्टों के अनुसार वर्ष 2023-2024 में वैश्विक उत्सर्जन रिकॉर्ड स्तर के आसपास है और वर्तमान नीतियों के साथ 1.5°C तापवृद्धि लक्ष्य हासिल करना कठिन दिखाई देता है। भारत ने वर्तमान वैश्विक व्यवस्था में महत्वपूर्ण लक्ष्य घोषित किए हैं। वर्ष 2030 तक 2005 के स्तर की तुलना में उत्सर्जन तीव्रता में 45% कमी, 50% बिजली क्षमता गैर-जीवाश्म स्रोतों से प्राप्त करना और 2070 तक नेट-जीरो हासिल करना और वर्ष 2025 तक भारत 50% से अधिक स्थापित बिजली क्षमता गैर-जीवाश्म स्रोतों से प्राप्त कर चुका है, जो उसकी प्रगति को दर्शाता है। वैश्विक स्तर पर क्योटो प्रोटोकॉल का सफर उतार-चढ़ाव भरा रहा, लेकिन इसकी सबसे बड़ी सफलता यह रही कि इसने दुनिया को सामूहिक पर्यावरणीय कार्रवाई की दिशा दिखाई, ‘प्रदूषक भुगतान करे’ सिद्धांत को व्यवहार में लागू किया और भविष्य की जलवायु नीतियों की मजबूत नींव रखी; सरल शब्दों में कहें तो आज जब दुनिया नेट-जीरो की बात करती है, तो उसकी जड़ें कहीं न कहीं क्योटो की उसी ऐतिहासिक पहल में निहित हैं। अंत में यही कहूंगा कि आज के संदर्भ में क्योटो प्रोटोकॉल ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि इसने पहली बार विकसित देशों पर ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन घटाने के कानूनी लक्ष्य तय किए।हालांकि, अब वैश्विक जलवायु नीति का केंद्र पेरिस समझौता बन चुका है, फिर भी क्योटो प्रोटोकॉल ने अंतरराष्ट्रीय सहयोग की नींव रखी।इस समझौते के कारण कार्बन बाजार, क्लीन डेवलपमेंट मैकेनिज्म (सीडीएम) जैसे तंत्र विकसित हुए, जिनसे विकासशील देशों को भी लाभ मिला।आज जलवायु परिवर्तन की बढ़ती चुनौतियों के बीच यह समझौता दुनिया को उत्सर्जन नियंत्रण की जिम्मेदारी याद दिलाता है। संक्षेप में, क्योटो प्रोटोकॉल आधुनिक वैश्विक जलवायु नीतियों का आधार माना जाता है।