हरिद्वार बहुत जटिल-विकट और विस्फोटक परिस्थितियों में

Haridwar is in a very complex, critical and explosive situation

यतेन्द्र शर्मा

हरिद्वार में देखा गया है कि यहाँ मुस्लिम आबादी बहुत तेज़ी से बढ़ी है। मुस्लिम आबादी से यह क्षेत्र घिरता हुआ नज़र आ रहा है… और इसका कारण बहुत सरल शब्दों में जनसंख्या विशेषज्ञ मनु गौड़ जी के साथ हुई बातचीत से पता चला।

हरिद्वार को आम जनमानस में श्रद्धा के साथ हरि का द्वार, यानी भगवान विष्णु/भगवान शिव का द्वार कहा जाता है। यह वह पवित्र स्थल है जहाँ माँ गंगा भगवान शिव की जटाओं से निकलकर पहली बार मैदानी इलाके को स्पर्श करती हैं। इस कारण से हिंदुओं के लिए इसे अत्यंत पवित्र स्थल माना जाता है।

हरिद्वार ज़िले में 11 विधानसभा क्षेत्र आते हैं, वहीं लोकसभा की बात करें तो इसके अंतर्गत 14 विधानसभा क्षेत्र आते हैं। जब सन् 2000 में उत्तर प्रदेश से अलग होकर उत्तराखंड एक अलग राज्य बना और सन् 2001 में जनगणना हुई, तो हरिद्वार में मुस्लिम आबादी 9% थी। इसके बाद सन् 2011 की जनगणना में यह 14% हो गई, यानी महज़ 10 वर्षों में 5% की बढ़ोतरी हो गई। अब सन् 2025 के एक आकलन के अनुसार इनकी आबादी 20% से ज़्यादा हो चुकी है, हालाँकि अभी जनगणना होना बाकी है। मौजूदा आकलनों के मुताबिक़ हरिद्वार में 42% मुस्लिम आबादी हो गई है। इस पर मनु गौड़ जी दावा करते हैं कि सन् 2001 से अब तक दुगने से भी अधिक ग्रोथ रेट से मुस्लिम आबादी हरिद्वार में बढ़ी है, और पूरे विश्व में कहीं भी ऐसी ग्रोथ देखने को नहीं मिलती—यानी सबसे अधिक वृद्धि हरिद्वार में हुई है।

ये आँकड़े मैं क्यों बता रहा हूँ, इसकी वजह भी काफ़ी दिलचस्प है। भारतीय नदी परिषद ने हरिद्वार में विश्व का सबसे बड़ा और ऊँचा “भगवा ध्वज” लगाने का निर्णय लिया, क्योंकि भगवान के द्वार पर सनातन संस्कृति की पताका नहीं फहराएगी तो फिर कहाँ फहराएगी। लगभग 251 फ़ीट ऊँचाई की यह पताका बनाई जा रही है। इसका शिलान्यास स्वयं मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने किया है। यह ध्वज हरिद्वार में “ऊँ पुल” के पास शिव मूर्ति वाले परिसर में, वीआईपी घाट के पास लगाया जाएगा।

इसमें एक दिलचस्प बात यह सामने आई कि जब यह निर्णय भारतीय नदी परिषद द्वारा लिया गया, तो उत्तराखंड ब्यूरोक्रेसी के वरिष्ठ अधिकारियों ने इसका काफ़ी विरोध किया। उन्होंने मुख्यमंत्री धामी को मुस्लिम आबादी का डर दिखाया कि यदि ऐसा ध्वज लगाया गया, तो मुस्लिम वोटर एकजुट हो जाएँगे और आगामी चुनाव में सरकार के ख़िलाफ़ चले जाएँगे। जबकि होना यह चाहिए था कि संतुलन कैसे बनाया जाए, भविष्य का रोडमैप कैसे तैयार किया जाए—इस पर ब्यूरोक्रेसी को मंथन करना चाहिए था। लेकिन इसके विपरीत वे सरकार के मुखिया को डराने में लगे हैं।

यह डर भविष्य में कितना ज़ोर पकड़ेगा और किस तरह से सरकार के फ़ैसलों को प्रभावित करेगा, इससे आप अंदाज़ा लगा सकते हैं। क्योंकि आबादी का असंतुलन न केवल फ़ैसलों को प्रभावित करेगा, बल्कि संस्कृति और सभ्यता पर भी इसका व्यापक प्रभाव पड़ेगा, और भविष्य में गहरे टकरावों की आशंका भी बनी रहेगी।