एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं
वैश्विक गतिशीलता के इस दौर में पासपोर्ट केवल यात्रा दस्तावेज़ नहीं,बल्कि किसी राष्ट्र की कूटनीतिक विश्वसनीयता, आर्थिक ताकत और अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा का सूचक बन चुका है।वर्ष 2026 के हेनली एंड पार्टनर्स द्वारा जारी हेनली पासपोर्ट इंडेक्स में भारत ने 10 पायदान की उल्लेखनीय छलांग लगाते हुए 85वें स्थान से 75वें स्थान पर पहुंचकर एक सकारात्मक संदेश दिया है।भारतीय पासपोर्ट धारक अब 56 देशों में वीजा-फ्री या वीजा- ऑन-अराइवल सुविधा के साथ यात्रा कर सकते हैं।लेकिन इसी के साथ यह तथ्य भी सामने आया कि दो देशों ने भारतीयों के लिए वीजा-फ्री सुविधा समाप्त कर दी।
ऐसे में स्वाभाविक प्रश्न उठता है क़ि दो देश घटे तो रैंकिंग कैसे सुधरी?और 2006 में हासिल 71वीं सर्वोच्च रैंक अब तक क्यों नहीं मिल पाई?इन दोनों पहलुओं को प्रशंसा और आलोचना,दोनों दृष्टिकोणों से समझना आवश्यक है।जहां एक और 10 रैंक की छलांग है तो दूसरी ओर ईरान:नवंबर 2025 में वीजा-फ्री सुविधा बंद कर दी गई। वजह थी धोखाधड़ी और ट्रैफिकिंग के मामले, जिनमें भारतीय नागरिकों को फर्जी नौकरी ऑफर देकर ईरान बुलाया गया और फिर किडनैप किया गया।बोलीविया: पहले वीजा-ऑन-अराइवल मिलता था, लेकिन 2026 से ई-वीजा लागू कर दिया गया। अब पहले से ऑनलाइन आवेदन करना जरूरी है,इसलिए यह वीजा- फ्री कैटेगरी में बिलकुल ही नहीं आता।
साथियों बात अगर हम हेनले पासपोर्ट इंडेक्स को गहराई से समझने की करें तो,विश्व के लगभग 200 देशों के पासपोर्ट की ताकत को इस आधार पर रैंक करता है कि उनके नागरिक कितने देशों में बिना पूर्व वीजा के प्रवेश कर सकते हैं। इस इंडेक्स के निर्माण में इंटरनेशनल एयर ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन के डेटा का उपयोग किया जाता है, जिसे हेनले की रिसर्च टीम विश्लेषित करती है।रैंक जितनी ऊंची, पासपोर्ट उतना शक्तिशाली। इस पैमाने पर देखें तो भारत का 75 वें स्थान पर पहुंचना एक उपलब्धि है,क्योंकि यह दर्शाता है कि भारतीय नागरिकों कीवैश्विक स्वीकार्यता और भारत की कूटनीतिक सक्रियता में सुधार हुआ है।
साथियों बात अगर हम दो देश घटे,फिर भी रैंकिंग सुधरी कैसे? इसको समझने की करें तो,यह विरोधाभास प्रतीत हो सकता है कि वीजा-फ्री देशों की संख्या में कमी के बावजूद भारत की रैंकिंग बेहतर हुई। इसका उत्तर इंडेक्स की सापेक्ष प्रकृति में छिपा है।हेनले इंडेक्स पूर्णांक नहीं,बल्कि तुलनात्मक रैंकिंग है। यदि अन्य देशों की स्थिति अधिक तेजी से गिरी हो या कुछ देशों की वीजा सुविधाओं में कटौती हुई हो,तो भारत भले ही सीमित वृद्धि करे,उसकी रैंक ऊपर जा सकती है। दूसरे शब्दों में, रैंकिंग केवल अपने प्रदर्शन पर नहीं,बल्कि दूसरों के प्रदर्शन पर भी निर्भर करती है।यदि कुछ अफ्रीकी एशियाई या लैटिन अमेरिकी देशों की वीजा-फ्री पहुंच कम हुई हो,तो भारत तुलनात्मक रूप से ऊपर आ सकता है।तारीफ़ के दृष्टिकोण से देखें तो यह संकेत है कि भारत ने वैश्विक मंच पर संतुलित कूटनीति अपनाई है। अफ्रीका,दक्षिण-पूर्व एशिया और कैरिबियन देशों के साथ भारत के संबंधों में सुधार हुआ है। जिन देशों में भारतीय पासपोर्ट धारकों को वीजा-फ्री सुविधा मिलती है,उनमें अंगोला बर्बाड़ोस,भूटान ,फिजी ,मलेशिया मौर्याशिस,नेपाल ,थाईलैंड और त्रिनिदाद and तोबागो जैसे देश शामिल हैं। यह सूची दर्शाती है कि भारत की उपस्थिति उभरते और विकासशील देशों में मजबूत हुई है।आलोचना के दृष्टिकोण से देखें तो 56 देशों की वीजा-फ्री पहुंच अभी भी वैश्विक औसत से कम है। शीर्ष देशों की तुलना करें तो स्थिति स्पष्ट होती है। इंडेक्स में प्रथम स्थान पर सिंगापुर है, जिसके नागरिक 192 गंतव्यों तक वीजा-फ्री पहुंच रखते हैं। दूसरे स्थान पर जापान और साउथ कोरिया हैं, जिनकी पहुंच 187 देशों तक है। तीसरे स्थान पर स्वीडन और यूनाइटेड अरब अमीरात हैं। चौथे स्थान पर फ्रांस ,जर्मनी,इटली ,स्पेन और स्विट्ज़रलैंड संयुक्त रूप से हैं। पांचवें स्थान पर ऑस्ट्रेया , ग्रीस माल्टा और पोर्टगाल हैं। शीर्ष 10 में ऑस्ट्रेलिया यूनाइटेड किंगडम , कनाडा और न्यूजीलैड भी शामिल हैं। तुलना से स्पष्ट है कि भारत अभी भी शीर्ष देशों से काफी पीछे है।
साथियों बात अगर हम दो देशों द्वारा वीजा-फ्री सुविधा समाप्त, यह चिंता का विषय इसको समझने की करें तो रिपोर्ट के अनुसार दो देशों ने भारतीयों के लिए वीजा-फ्री सुविधा समाप्त की, कथित तौर पर कुछ भारतीय नागरिकों की गैरकानूनी गतिविधियों में संलिप्तता के कारण। यह बिंदु आलोचना का आधार बनता है। किसी भी देश की यात्रा स्वतंत्रता केवल सरकार की कूटनीति पर निर्भर नहीं, बल्कि उसके नागरिकों के आचरण पर भी निर्भर करती है,यदि अवैध आव्रजन, ओवरस्टे, या स्थानीय कानूनों का उल्लंघन बढ़ता है, तो संबंधित देश वीजा नियम सख्त कर सकते हैं। इस संदर्भ में भारत को न केवलकूटनीतिक स्तरपर,बल्कि प्रवासी प्रबंधन और जागरूकता स्तर पर भी सुधार की आवश्यकता है।
तारीफ़ के दृष्टिकोण से यह कहा जा सकता है कि दो देशों की कटौती के बावजूद समग्र स्कोर स्थिर या बेहतर रहा, जो दर्शाता है कि अन्य देशों के साथ संबंधों में सुधार ने इस नुकसान की भरपाई की। भारत की ‘एक्ट ईस्ट’, ‘नेबरहुड फर्स्ट’ और अफ्रीका-आउटरीच नीतियों ने यात्रा सहयोग को बढ़ावा दिया है।
साथियों बात अगर हम 2006 की सर्वोच्च रैंक क्यों नहींदोहराई गई? इसको समझने की करें तो, भारत ने 2006 में 71वींसर्वोच्च रैंक हासिल की थी।तब वैश्विक भू- राजनीतिक परिदृश्य अलग था। 9/11 के बाद सुरक्षाकड़े हुए थे,परंतु डिजिटल निगरानी और आव्रजन नियंत्रण उतने व्यापक नहीं थे जितने आज हैं। पिछले दो दशकों में अवैध आव्रजन, शरणार्थी संकट, आतंकवाद और मानव तस्करी जैसी चुनौतियों के कारण कई देशों ने वीजा नियम कड़े किए हैं।भारत जैसे जनसंख्या-समृद्ध देश के नागरिकों पर अतिरिक्त जांच लागू होना स्वाभाविक हो गया है।
साथियों बातें कर हम आलोचना और तारीफ के दृष्टिकोण से बात को समझने की करें तो भारत की आर्थिक वृद्धि के बावजूद उच्च आय वाले देशों विशेषकर यूरोप और उत्तरी अमेरिका,के साथ वीजा उदारीकरण सीमित रहा है।शेंगेन क्षेत्र,अमेरिका या कनाडा में वीजा प्रक्रिया अभी भी जटिल है। इससे पासपोर्ट की रैंक पर सीधा प्रभाव पड़ता है।तारीफ़ के दृष्टिकोण से देखें तो 2006 के बाद वैश्विक प्रतिस्पर्धा बढ़ी है। कई छोटे देशों जैसे यूएई ने आक्रामक कूटनीति से अपनी रैंक तेजी से सुधारी है।ऐसे में भारत का स्थिर प्रगति पथ भीमहत्वपूर्ण है। 75वीं रैंक यह संकेत देती है कि भारत गिरावट की लंबी अवधि से बाहर निकल रहा है।
साथियों बात अगर हम क्षेत्रीय तुलना और दक्षिण एशिया का संदर्भ के एंगल से समझने की करें तो इंडेक्स में पाकिस्तान 97 वें स्थान पर है,जो पाकिस्तान की वैश्विक गतिशीलता की सीमाओं को दर्शाता है। वह फ़लेस्तिन (91), नार्थ कोरिया (94) और सोमालिया (96) से भी नीचे है। दक्षिण एशिया में भारत की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है, लेकिन वैश्विक औसत से अभी भी पीछे है। यह क्षेत्रीय स्थिरता, आर्थिक अवसरों और प्रवासन प्रवृत्तियों से जुड़ा मुद्दा है।पासपोर्ट की अवधारणा और राष्ट्रीय प्रतिष्ठा-पासपोर्ट केवल पहचान पत्र नहीं; यह राष्ट्र की साख का प्रतीक है। जब कोई देश अपने नागरिकों को बिना वीजा प्रवेश देता है, तो वह उस देश की सुरक्षा व्यवस्था,आर्थिक स्थिरता और नागरिकों की विश्वसनीयता पर भरोसा दर्शाता है। इस दृष्टि से भारत की रैंक में सुधार उसकी वैश्विक छवि में क्रमिक सकारात्मक बदलाव को दर्शाता है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि उपलब्धि भी, चुनौती भी,हेनले पासपोर्ट इंडेक्स 2026 में भारत की 10 पायदान की छलांग प्रशंसनीय है। यह कूटनीतिक सक्रियता,वैश्विक साझेदारियों और आर्थिक स्थिरता का संकेत है। दो देशों द्वारा वीजा-फ्री सुविधा समाप्त किया जाना चेतावनी भी है कि नागरिक आचरण और आव्रजन प्रबंधन पर सतत ध्यान आवश्यक है। 2006 की सर्वोच्च रैंक अब तक न दोहराया जाना यह दर्शाता है कि वैश्विक प्रतिस्पर्धा और सुरक्षा चिंताओं के बीच यात्रा स्वतंत्रता हासिल करना जटिल प्रक्रिया है।तारीफ़ के एंगल से देखें तो भारत ने गिरावट के दौर से उबरकर स्थिर प्रगति की है और दक्षिण एशिया में अपनी स्थिति मजबूत रखी है। आलोचना के एंगल से देखें तो अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है,विशेषकर विकसित देशों के साथ वीजा उदारीकरण में।इसलिए पासपोर्ट की ताकत केवल सरकार की नीतियों का परिणाम नहीं, बल्कि नागरिकों के वैश्विक व्यवहार,आर्थिक विश्वसनीयता और अंतरराष्ट्रीय विश्वास का संयुक्त प्रतिबिंब है। भारत के लिए यह रैंकिंग एक अवसर भी है और आत्ममंथन का क्षण भी,ताकि आने वाले वर्षों में वह न केवल 2006 की रैंक को पार करे, बल्कि वैश्विक गतिशीलता में एक नई पहचान स्थापित करे।





