हायर एजुकेशन: 75% कॉलेज अपने छात्रों को नहीं दे पा रहे जॉब वाली स्किल्स

Higher education: 75% of colleges fail to provide their students with job-relevant skills

राजेश जैन

भारत में हर साल लाखों युवा बड़े सपनों के साथ कॉलेज और यूनिवर्सिटी में दाखिला लेते हैं। परिवार उम्मीद करता है कि चार साल की पढ़ाई के बाद बच्चा अच्छी नौकरी पाएगा, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनेगा और समाज में सम्मान पाएगा। लेकिन आज की सच्चाई यह है कि डिग्री मिलने के बाद भी नौकरी मिलना किसी जुए से कम नहीं रह गया है। टीमलीज एडटेक की ताज़ा रिपोर्ट बताती है कि भारत के करीब 75% कॉलेज और विश्वविद्यालय अपने छात्रों को जॉब-रेडी स्किल्स देने में नाकाम हो रहे हैं। यानी डिग्री तो मिल रही है, लेकिन नौकरी के लायक नहीं है। यह सिर्फ शिक्षा व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ है।

डिग्री की फैक्ट्रियां बनते जा रहे हैं कॉलेज

रिपोर्ट का शीर्षक ही बहुत कुछ कह देता है -डिग्री की फैक्ट्रियों से रोजगार केंद्रों तक। आज बड़ी संख्या में संस्थान सिर्फ डिग्री बांटने वाली फैक्ट्रियों में बदल चुके हैं। क्लासरूम में थ्योरी पढ़ाई जाती है, पुराने सिलेबस रटाए जाते हैं, लेकिन असली दुनिया की जरूरतों से छात्रों का कोई संपर्क नहीं होता। नतीजा यह होता है कि छात्र पास होकर निकलते हैं, लेकिन उन्हें यह तक नहीं पता होता कि इंडस्ट्री उनसे क्या चाहती है।

आज कंपनियों को ऐसे युवा चाहिए जो टेक्नोलॉजी समझते हों, कम्युनिकेशन में मजबूत हों, प्रॉब्लम सॉल्विंग कर सकें, प्रैक्टिकल एक्सपीरियंस रखते हों। लेकिन ज्यादातर कॉलेज इन स्किल्स पर काम ही नहीं करते।

प्लेसमेंट का कड़वा सच

कागजों में कई संस्थान 100% प्लेसमेंट का दावा करते हैं, लेकिन सच्चाई इससे बहुत अलग है। रिपोर्ट के अनुसार, सिर्फ 16.67% संस्थान ही ऐसे हैं जो अपने 76% से 100% छात्रों को छह महीने के भीतर नौकरी दिला पाते हैं। बाकी छात्रों को या तो बहुत कम सैलरी वाली नौकरी मिलती है, या फिर वे बेरोजगार घूमते रहते हैं, या किसी दूसरे कोर्स की तैयारी करने लगते हैं।

यह स्थिति उन माता-पिता के लिए भी चिंता का विषय है, जो भारी फीस भरकर बच्चों को प्राइवेट कॉलेजों में पढ़ाते हैं। इंडस्ट्री और पढ़ाई के बीच गहरी खाई आज की शिक्षा व्यवस्था का सबसे बड़ा दोष यही है कि पाठ्यक्रम और उद्योग की जरूरतों में तालमेल नहीं है। रिपोर्ट बताती है कि सिर्फ 8.6% संस्थानों के कोर्स पूरी तरह इंडस्ट्री-फ्रेंडली हैं, 51% से ज्यादा संस्थानों का उद्योग से कोई तालमेल ही नहीं। मतलब आधे से ज्यादा कॉलेज ऐसे हैं, जहां पढ़ाया कुछ और जाता है और नौकरी में चाहिए कुछ और।

क्लासरूम में इंडस्ट्री का अनुभव नदारद

अगर कॉलेजों में इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स पढ़ाएं, तो छात्रों को असली दुनिया की समझ मिले। लेकिन रिपोर्ट कहती है कि सिर्फ 7.56% संस्थानों में ही “प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस” जैसे इंडस्ट्री प्रोफेशनल्स को शामिल किया गया है। बाकी जगह वही पुराने प्रोफेसर, वही पुराने नोट्स, वही पुरानी थ्योरी। छात्रों को यह नहीं बताया जाता कि आज जॉब मार्केट कैसे बदल रहा है, नई भूमिकाएं क्या हैं, कंपनियां किस तरह के स्किल्स ढूंढ रही हैं।

सर्टिफिकेट्स से दूरी

आज कंपनियां सिर्फ डिग्री नहीं देखतीं, वे मान्यता प्राप्त इंडस्ट्री सर्टिफिकेट्स को भी महत्व देती हैं। जैसे-एआई और डेटा साइंस सर्टिफिकेट, डिजिटल मार्केटिंग, साइबर सिक्योरिटी, क्लाउड कंप्यूटिंग लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक, 60% से ज्यादा संस्थानों ने इन सर्टिफिकेट्स को अपने कोर्स में शामिल करने पर कभी सोचा ही नहीं। नतीजा-छात्र ऐसे स्किल्स के बिना ग्रेजुएट होते हैं, जिन्हें कंपनियां तुरंत पहचान सकें।

इंटर्नशिप: नाम की, काम की नहीं

नौकरी से पहले इंटर्नशिप सबसे जरूरी कदम होती है। यहीं से छात्र सीखते हैं-ऑफिस कल्चर, टीमवर्क, असली प्रोजेक्ट पर काम लेकिन भारत में सिर्फ 9.4% संस्थानों में सभी कोर्स के लिए अनिवार्य इंटर्नशिप होती है और 37.8% संस्थानों में इंटर्नशिप की कोई व्यवस्था ही नहीं है। यानी लाखों छात्र बिना किसी प्रैक्टिकल अनुभव के सीधे जॉब मार्केट में उतर जाते हैं। फिर कंपनियां कहती हैं-आपके पास एक्सपीरियंस नहीं है।

लाइव प्रोजेक्ट्स भी गायब

लाइव इंडस्ट्री प्रोजेक्ट्स छात्रों को रियल वर्ल्ड प्रॉब्लम सॉल्विंग सिखाते हैं। लेकिन सिर्फ 9.68% संस्थानों में ही ऐसे प्रोजेक्ट कराए जाते हैं। बाकी जगह थ्योरी पढ़ाओ, एग्जाम लो, डिग्री दो और मामला खत्म।

एलुमनाई नेटवर्क की कमजोरी

पूर्व छात्र किसी भी संस्थान की ताकत होते हैं। वे मेंटरशिप दे सकते हैं, रेफरल दिला सकते हैं, जॉब के मौके खोल सकते हैं। लेकिन रिपोर्ट बताती है कि सिर्फ 5.44% संस्थानों के पास सक्रिय एलुमनाई नेटवर्क है। यानि कॉलेज अपने ही पुराने छात्रों की ताकत का इस्तेमाल नहीं कर पा रहे।

इसका असर सिर्फ छात्रों पर नहीं, देश पर भी

जब युवा बेरोजगार रहते हैं,तो इसका असर सिर्फ परिवार पर नहीं, पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। उत्पादकता घटती है, मानसिक तनाव बढ़ता है, स्किल गैप बढ़ता है, माइग्रेशन बढ़ता है, डिग्रीधारी बेरोजगारी , देश के लिए सबसे खतरनाक संकेतों में से एक है।

यह है समाधान

रिपोर्ट साफ कहती है कि अब बदलाव विकल्प नहीं, मजबूरी है। इसके लिए इंडस्ट्री-अनुकूल सिलेबस, अनिवार्य इंटर्नशिप, लाइव प्रोजेक्ट्स, इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स की भागीदारी, सर्टिफिकेट कोर्स, मजबूत एलुमनाई नेटवर्क, कॉलेजों को सिर्फ पढ़ाने की नहीं, रोजगार दिलाने की जिम्मेदारी लेनी होगी।

सरकार की भूमिका भी अहम

नई शिक्षा नीति सही दिशा में कदम है, लेकिन ज़मीन पर उसका असर अभी सीमित है। सरकार को चाहिए कि कॉलेजों की जवाबदेही तय करे, प्लेसमेंट डेटा पब्लिक करे, स्किल-बेस्ड एजुकेशन को बढ़ावा दे, इंडस्ट्री पार्टनरशिप अनिवार्य बनाए, छात्रों को भी जागरूक होना होगा।

आज का छात्र सिर्फ डिग्री पर निर्भर नहीं रह सकता। उसे खुद भी ऑनलाइन स्किल्स सीखनी होंगी, इंटर्नशिप ढूंढनी होगी, नेटवर्क बनाना होगा, इंडस्ट्री ट्रेंड समझना होगा। अगर भारत की हायर एजुकेशन सिस्टम आज नहीं सुधरा तो आने वाले सालों में डिग्रियों की भीड़ होगी, लेकिन नौकरियों की कमी। यह संकट सिर्फ शिक्षा का नहीं, राष्ट्र निर्माण का संकट है। अब वक्त है डिग्री फैक्ट्रियों को रोजगार केंद्रों में बदलने का।