अम्बिका कुशवाहा ‘अम्बी’
हम भारतीय हैं, और हिंदी हमारी संस्कृति का गौरव है। आज हिंदी न केवल भारत की राजभाषा है, बल्कि विश्व की सबसे अधिक बोली जाने वाली प्रमुख भाषाओं में तीसरे स्थान पर है। भारत के हर राज्य में अपनी-अपनी स्थानीय भाषाएँ बोली जाती हैं, लेकिन हिंदी लगभग हर राज्य में प्रचलित है। यह सरकारी कार्यालयों से लेकर आम लोगों के रोज़मर्रा के संवाद तक का प्रमुख माध्यम बनी हुई है।
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, फणीश्वरनाथ रेणु, जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, मुंशी प्रेमचंद, हरिवंश राय बच्चन, रामधारी सिंह ‘दिनकर’ और मैथिलीशरण गुप्त जैसे महान साहित्यकारों ने कविता, उपन्यास, नाटक और कहानियों के माध्यम से हिंदी साहित्य को अपार समृद्धि प्रदान की। ब्रिटिश काल में अंग्रेजों के खिलाफ जन-जागरण और क्रांति में हिंदी साहित्यकारों का महत्वपूर्ण योगदान रहा। आधुनिक काल में मोहन राकेश, गीत चतुर्वेदी, मृदुला गर्ग, मनु भंडारी आदि ने अपनी सशक्त लेखनी से हिंदी को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। वर्तमान में समसामयिकी मुद्दे पर चर्चित लेखक नृपेन्द्र अभिषेक ‘नृप’ हिंदी में अपनी मजबूत लेखनी द्वारा हिंदी को बढ़ावा दे रहे हैं।
हालाँकि, संविधान लागू होने के 75 वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बाद भी उच्च शिक्षा, कानून और तकनीकी क्षेत्रों में अंग्रेजी ही प्रमुख माध्यम बनी हुई है। राजनीतिक स्वतंत्रता मिले 78 वर्ष हो चुके हैं, किंतु मानसिक गुलामी आज भी बरकरार है और डिजिटल युग में यह और गहराती जा रही है। आजकल कई शिक्षित माता-पिता हिंदी को हेय दृष्टि से देखते हैं और बच्चों को जन्म से ही अंग्रेजी में बोलना सिखाते हैं। आधुनिक अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में हिंदी बोलना अक्सर प्रतिबंधित-सा लगता है। नौकरी के साक्षात्कारों से लेकर सार्वजनिक बैठकों तक अंग्रेजी बोलने वालों को अधिक सम्मान मिलता है, जबकि हिंदी को कमतर आँका जाता है।
हिंदी विश्व में तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है, जिसमें लगभग कुल वक्ता 60 करोड़ से अधिक हैं। विश्व के 150 से अधिक देशों में करोड़ों प्रवासी हिंदी बोलते और लिखते हैं। कई विदेशी विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जाती है। भारत की लगभग 50 प्रतिशत से अधिक आबादी हिंदी को समझती और बोल सकती है, फिर भी ज्ञान-विज्ञान, तकनीकी शिक्षा और उच्च अध्ययन का माध्यम अभी भी मुख्यतः अंग्रेजी है। हिंदी साहित्य, काव्य और आलेखों में तो अद्भुत योगदान हुआ है, किंतु वैज्ञानिक एवं शैक्षणिक क्षेत्र में हिंदी माध्यम की गुणवत्तापूर्ण पुस्तकों का अभाव बना हुआ है।
हिंदी भारत की आत्मा है और हजारों वर्ष पुरानी है। यह हमारी सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है। दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में हिंदी के प्रति विरोध देखा जाता है, जहाँ इसे थोपने की आशंका जताई जाती है। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हिंदी हमारी एकता का सूत्र है। दूसरी भाषाएँ सीखना उत्तम है, किंतु अपनी मातृभाषा को तिरस्कृत करना अपनी जड़ों से कटना है। हिंदी में बोलना, लिखना और पढ़ना न केवल भाषा को समृद्ध करेगा, बल्कि देश की सांस्कृतिक पहचान को भी सशक्त बनाएगा।
डिजिटल युग में हिंदी का वैश्विक प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। यूट्यूब, सोशल मीडिया, ऐप्स और एआई टूल्स पर हिंदी कंटेंट की भरमार है। हिंदी भारत की राजभाषा होने के साथ-साथ फिजी की भी आधिकारिक भाषा है। भारत के बढ़ते आर्थिक, राजनीतिक और सामरिक प्रभाव से विदेशों में हिंदी सीखने की रुचि बढ़ रही है। विश्व हिंदी सचिवालय (मॉरीशस में स्थापित) हिंदी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत करने का कार्य कर रहा है। संयुक्त राष्ट्र में हिंदी को आधिकारिक भाषा बनाने की पहल जारी है, हालाँकि अभी यह पूर्ण नहीं हुई है।
हिंदी को तकनीकी और डिजिटल युग के अनुरूप विकसित करना आवश्यक है। स्कूलों-विश्वविद्यालयों में हिंदी माध्यम की शिक्षा को प्रोत्साहन देना और जहाँ संभव हो, अनिवार्य बनाना चाहिए। सभी राज्यों के नागरिकों को समझाना होगा कि अपनी भाषा का अपमान स्वयं का अपमान है। जब तक हम अंग्रेजी को प्रतिष्ठा का प्रतीक और भारतीय भाषाओं को साधारण मानते रहेंगे, हिंदी का पूर्ण उत्थान संभव नहीं।
हिंदी हमारी जन्मभूमि की आत्मा है। हिंदी बोलने, लिखने, पढ़ने और सीखने में हमें शर्म नहीं, बल्कि गर्व होना चाहिए। देश में हिंदी के प्रति सम्मान, ज्ञान और स्वाभिमान जगाने के लिए देशव्यापी जागरूकता अभियान शुरू करने की आवश्यकता है। हमारा कर्तव्य है, हिंदी को अपनाकर उसकी वास्तविक गरिमा प्रदान करें, क्योंकि हिंदी सिर्फ भाषा नहीं, हमारा स्वाभिमान है।





