हिन्दी बनाम तमिल : भाषा, अस्मिता और सत्ता की पुरानी लड़ाई

Hindi vs Tamil: The age-old battle of language, identity and power

अजेश कुमार

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन का ताज़ा बयान “न तब, न अब, न कभी हिन्दी को यहां जगह मिलेगी” केवल एक राजनीतिक प्रतिक्रिया भर नहीं है, बल्कि यह उस गहरे ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और वैचारिक संघर्ष की याद दिलाता है, जिसकी जड़ें आज़ादी से पहले तक फैली हुई हैं। हिन्दी को लेकर तमिलनाडु में उठने वाली हर बहस, हर बयान और हर विरोध दरअसल भाषा से अधिक अस्मिता, संघवाद और सत्ता-संतुलन की लड़ाई है।

‘भाषा शहीद दिवस’ के अवसर पर डीएमके द्वारा आयोजित कार्यक्रम और उसमें दी गई श्रद्धांजलि केवल अतीत की स्मृति नहीं है, बल्कि वर्तमान राजनीति का स्पष्ट संकेत भी है कि तमिलनाडु हिन्दी को एक सांस्कृतिक वर्चस्व के औज़ार के रूप में देखता रहा है और आज भी उसी दृष्टि से देख रहा है। भारत जैसे बहुभाषी देश में भाषा कभी सिर्फ़ संवाद का साधन नहीं रही। वह पहचान, सम्मान और सत्ता से जुड़ा प्रश्न रही है। हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित करने की कोशिशें, विशेषकर ग़ैर-हिन्दी भाषी राज्यों में, हमेशा शंका और प्रतिरोध का कारण बनी हैं। तमिलनाडु इस प्रतिरोध का सबसे मुखर और संगठित उदाहरण रहा है।

विशेषज्ञों के अनुसार, तमिल समाज में भाषा को केवल सांस्कृतिक धरोहर नहीं, बल्कि राजनीतिक चेतना का आधार माना जाता है। यही कारण है कि यहां हिन्दी को अपनाने का सवाल आते ही उसे ‘थोपे जाने’ की कोशिश के रूप में देखा जाता है, चाहे वह शिक्षा नीति के माध्यम से हो या प्रशासनिक प्रयोगों के ज़रिये। तमिलनाडु में हिन्दी विरोध का इतिहास 1937 से शुरू होता है, जब तत्कालीन मद्रास प्रांत की सरकार ने विद्यालयों में हिन्दी को अनिवार्य बनाने का प्रयास किया। उस समय यह निर्णय केवल शैक्षिक नहीं बल्कि राजनीतिक माना गया। इसके विरोध में द्रविड़ आंदोलन खड़ा हुआ, जिसने हिन्दी को ब्राह्मणवादी और उत्तर भारतीय वर्चस्व के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया।

1965 में जब हिन्दी को राजभाषा के रूप में पूर्णतः लागू करने की आशंका बनी, तब यह आंदोलन अपने चरम पर पहुंच गया। पूरे राज्य में विरोध प्रदर्शन, हड़तालें और हिंसक घटनाएं हुईं। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार दर्जनों लोगों की जान गई। इन्हीं लोगों को आज ‘भाषा शहीद’ कहा जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, 1965 का आंदोलन केवल हिन्दी विरोध नहीं था, बल्कि यह केंद्र-राज्य संबंधों में शक्ति-संतुलन को पुनर्परिभाषित करने की लड़ाई थी।

जहां देश के अधिकांश हिस्सों में तीन भाषा फ़ॉर्मूला अपनाया गया, वहीं तमिलनाडु ने शुरू से ही दो भाषा नीति को तरजीह दी—तमिल और अंग्रेज़ी। इसके पीछे व्यावहारिक और वैचारिक दोनों कारण रहे। विशेषज्ञों के अनुसार, अंग्रेज़ी को तमिलनाडु ने सामाजिक गतिशीलता और वैश्विक अवसरों की भाषा के रूप में देखा, जबकि तमिल को अपनी सांस्कृतिक आत्मा के रूप में। हिन्दी को इन दोनों के बीच कहीं भी आवश्यक नहीं माना गया।

यही कारण है कि आईटी, शिक्षा और वैश्विक व्यापार में तमिलनाडु ने अंग्रेज़ी के सहारे तेज़ प्रगति की, जबकि हिन्दी सीखने को रोज़गार की गारंटी बताने वाला तर्क यहां टिक नहीं पाया।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के लागू होने के बाद यह विवाद फिर सतह पर आया। केंद्र सरकार का दावा है कि यह नीति सभी भारतीय भाषाओं को समान महत्व देती है और हिन्दी कहीं भी अनिवार्य नहीं है, लेकिन तमिलनाडु सरकार इसे अलग नज़रिये से देखती है। विशेषज्ञों के अनुसार, नीति के शब्द भले ही लचीले हों, लेकिन उसके क्रियान्वयन का ढांचा हिन्दी को बढ़त देता दिखाई देता है। पाठ्यपुस्तकों, प्रतियोगी परीक्षाओं और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर हिन्दी की बढ़ती उपस्थिति तमिलनाडु की आशंकाओं को मज़बूत करती है।

यही कारण है कि डीएमके इसे केवल शिक्षा नीति नहीं, बल्कि सांस्कृतिक केंद्रीकरण की रणनीति मानती है।
राजनीति बनाम वास्तविक चिंता? केंद्र सरकार का आरोप है कि तमिलनाडु सरकार भाषा के मुद्दे पर राजनीति कर रही है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह केवल राजनीतिक लाभ का मामला है, या इसके पीछे वास्तविक ऐतिहासिक पीड़ा और अनुभव हैं?

विशेषज्ञों के अनुसार, तमिलनाडु का हिन्दी विरोध भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि अनुभवजन्य अविश्वास से उपजा है। दशकों तक चले आंदोलनों, शहीदों और सांस्कृतिक संघर्षों ने यहां की सामूहिक स्मृति में हिन्दी को ‘थोपे गए आदेश’ के रूप में दर्ज कर दिया है।

भारत का संघीय ढांचा राज्यों को सांस्कृतिक और भाषाई स्वायत्तता देता है, लेकिन जब केंद्र की नीतियां एकरूपता की ओर बढ़ती हैं, तो यह स्वायत्तता खतरे में महसूस की जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार, भाषा विवाद असल में भारतीय संघवाद की परीक्षा है। यदि, विविधता को सम्मान नहीं मिला, तो एकता केवल संवैधानिक शब्द बनकर रह जाएगी। तमिलनाडु का तर्क स्पष्ट है, एकता थोपने से नहीं, स्वीकार्यता से आती है।

दिलचस्प बात यह है कि हिन्दी आज स्वयं अपने पारंपरिक क्षेत्रों में भी चुनौतियों का सामना कर रही है। उत्तर भारत के कई राज्यों में अंग्रेज़ी शिक्षा को प्राथमिकता दी जा रही है। ऐसे में, हिन्दी को राष्ट्रव्यापी रूप से थोपने की ज़िद और भी असंगत प्रतीत होती है।

विशेषज्ञों के अनुसार, भाषा का विकास संरक्षण से नहीं, बल्कि स्वाभाविक स्वीकार्यता से होता है। जब किसी भाषा को सत्ता का औज़ार बना दिया जाता है, तो उसका विरोध तय है। तमिलनाडु का संदेश भी यही है कि तमिल चेतना को दबाया नहीं जा सकता, और हिन्दी को अस्वीकार करना हिन्दी से नफ़रत नहीं, बल्कि अपनी पहचान की रक्षा है।

हिन्दी बनाम तमिल की यह बहस किसी एक राज्य या भाषा तक सीमित नहीं है। यह भारत की आत्मा से जुड़ा सवाल है कि क्या यह देश विविधताओं का सम्मान करेगा या एकरूपता की ओर बढ़ेगा? विशेषज्ञों के अनुसार, समाधान टकराव में नहीं, बल्कि संवाद में है। भाषा को राजनीतिक हथियार बनाने के बजाय उसे सांस्कृतिक पुल बनाया जाना चाहिए। जब तक केंद्र और राज्य एक-दूसरे की संवेदनाओं को समझने के बजाय उन्हें नकारते रहेंगे, तब तक ‘न तब, न अब, न कभी’ जैसे बयान गूंजते रहेंगे, और भारत की भाषाई बहुलता बार-बार परीक्षा देती रहेगी।