नरेंद्र तिवारी
भारतीय संस्कृति अपनी उत्सव धर्मिता के फलस्वरूप दुनियाँ को अपनी और आकर्षित करती है। उत्सव धर्मिता का सौंदर्य ही इसे खास बनाता है। इन्ही उत्सव एवं तीज त्योहारों की निरंतर चलती प्रक्रिया मे होली भी शामिल है। यह पर्व यूँ तो होलिका दहन से रंग पंचमी तक मनाया जाता है, किंतु फाल्गुन माह मे इसे फाग उत्सव के रूप मे सम्पूर्ण माह बनाने की परम्परा भी लम्बे समय से प्रचलित है। होली अधर्म पर धर्म की विजय और समानता का संदेश देती है, रंगों का यह महापर्व मन के मेल को धो देने का महत्वपूर्ण अवसर है।
होली के अनेकों रंग है, यह भारतीय उत्सव परम्परा का एक प्रमुख पर्व है। हर उत्सव के अपने संदेश होते है, होली उत्सव का भी अपना संदेश है। एक और होलिका दहन भक्त प्रहलाद की धार्मिक आस्थाओं की विजय का उद्घोष है। अपने पिता हिरण्य कश्यप की धर्म विरोधी मानसिकता का सबसे प्रबल विरोधी यदि कोई था तो वह उसका स्वयं का पुत्र भक्त प्रहलाद जो धर्म, दया, सदमार्ग का प्रतिक था। जब अपने पुत्र की धार्मिक आस्थाओं से तंग हिरण्य कश्यप भक्त प्रहलाद को धर्म का रास्ता छोड़, ईश्वर विरोधी बनाने के प्रयास मे विफल हो जाता है तब वह अपनी बहन होलिका जिसे आग मे सुरक्षित रहने का वरदान प्राप्त था। भक्त प्रहलाद को खत्म करने की योजना को मूर्त रूप देते है। होलिका अग्नि के मध्य भक्त प्रहलाद को गोदी मे लेकर उसे अग्नि के माध्यम से खत्म करने का प्रयास करती है, किंतु अपनी धार्मिक आस्थाओं पर प्रगाड़ विश्वास के चलते ईश्वर द्वारा भक्त प्रहलाद को भीषण आग मे भी सुरक्षित रखा जाता है, इसके विपरीत होलिका इस आग मे जलकर भस्म हो जाती है। संदेश धार्मिक आस्थाओं के माध्यम से सत्य के मार्ग पर चलने का है। असत्य और अधर्म पर सत्य और धर्म की विजय का यह उत्सव भारतीय दर्शन का सौंदर्य पर्व है। होलिका दहन के बाद पांच दिन तक याने रंग पंचमी तक सम्पूर्ण देश रंग ग़ुलाल की मस्ती मे रंग जाता है। यह पर्व हमारी अनेकता मे एकता के दर्शन का वाहक है। जब वातावरण रंग ग़ुलाल और पानी की बौछार से आच्छादित होता है। तब जाति, धर्म, अमीर गरीब के सब भेद धाराशाही हो जाते है। उत्सव के माध्यम से समाज मे सामाजिक समरासता का जो दर्शन होली पर्व मे है। वह दुनियाँ के अन्य उत्सव त्योहारों नजर नही आता है।
होली का सीधा संबंध प्रकृति से है। फाल्गुन माह माघ की ठण्ड के बाद फरवरी और मार्च के दौरान आता है। होली भी इसी माह मनाई जाती है। इस दौरान वातावरण आनंदित और उल्लासित होता है। गर्मी का आरम्भ जहाँ पतझड़ का संदेश लेकर आता है, तब पलास के फूल अपनी सम्पूर्ण सौंदर्यता के साथ खिल उठते है। पलास को छूल, परसा, ढाक, टेसू और किंशुक के वृक्ष के रूप मे विभिन्न हिस्सों मे जाना जाता है। इसके फूल जिसे जंगल की आग भी कहा जाता है। तपती गर्मी मे जब दूर से इसे देखते है तो आग के मानिन्द दिखाई देता है। दरअसल आग की तरह दिखने वाला यह टेसू का फूल अपनी डाल पर मदमाता, मुस्काता दिखाई देता है। पलाश के यह फूल यूपी, एमपी एवं झारखण्ड मे बहुतायत मे मिलते है। यूपी और झारखण्ड का यह राज्य पुष्प है। भारतीय डाक तार विभाग द्वारा डाक टिकिट पर प्रकाशित कर इस पुष्प को सम्मानित भी किया जा चूका है। प्राचीन काल मे टेसू के फूल से रंग तैयार किये जाते थै।
होली रंगों का त्यौहार है। हर रंग की अपनी खूबसूरती होती है। होली भारतीय समाज की एकता का प्रतिक है। एकता का रंग भारत की विशेषता है। इस दिन मतभेदो को भूल प्यार रंग जब गालो पर लगता है, तो गीले शिकवे खत्म हो जाते है। फ़िल्म शोले का वह शानदार गीत होली के दौरान हवाओं मे गूंजने लगता है, ‘होली के दिन दिल खिल जाते है, रंगों मे रंग मिल जाते है, गीले शिकवे भूलकर दोस्तों, दुश्मन भी गले मिल जाते है।’ याने होली के दिन मन का मेल धुल जाता है। होली का संदेश भी अपनों से हुई नाराजगी को दूर करना ही तो है। प्रकृति निर्मल है, रंग प्रकृति की अदभुत संरचना है। रंग भी होली के दिवस मन को निर्मल बनाने का प्रयास करता है।
होलिका दहन के बाद रंग खेलने की प्रक्रिया भगवान कृष्ण एवं राधा की प्रेम कथा से जुडा है। अपने बचपन मे कृष्ण ने गोकुल मे राधा पर रंग डालकर उन्हें गोरा करने का प्रयास किया और प्रेम रंग मे रंग दिया। इस कहानी के साथ रंगों से जुडी शिव पार्वती की कहानी भी प्रचलित है।
रंगों का यह उत्सव उत्तर भारत मे सदियों से प्रचलित रहा है यहां ब्रज की होली के नाम से मशहूर बरसाना और नंदगांव की लट्ठमार होली मे महिलाए पुरषों को मजाक में लाठीयों से मारती है। वृंदावन के मंदिरो में फूलों से होली खेली जाती है। होली के पाराम्परिक गीतों में भी मस्ती का भाव रहता है। इंदौर में बजर बट्टू सम्मेलन उज्जैन में टेपा सम्मेलन होली के उत्सव से जुड़े हास्य के मंच है। होली और रंग पंचमी पर हमारे समाचार माध्यम भी मस्ती के मूड में होते है पहले प्रिंट मिडिया बुरा ना मानो होली है के नाम से नेताओं, अफसरों फ़िल्मी कलाकारों को तरह तरह की उपमा से नवाजता था। अब टीवी चैनल भी होली की मस्ती में झूम उठते है।
दरअसल होली प्रेम, स्नेह और मस्ती का महापर्व है। इसमें एकरुपता और समानता का संदेश छुपा है। होली के पर्व को सार्थक कीजिये अपनों को रंग लगाकर गीले शिकवे दूर कीजिये। किसी कवि ह्रदय व्यक्ति ने इसे कविता के माध्यम से व्यक्त करते हुए लिखा की
‘प्रेम का रंग चढ़ा है गहरा,
दिल में सबनें चाहत घोली।
भूल गए है रंज-ओ -गम को,
सबनें अपनी बाहें खोली।
रंगों का त्यौहार है होली।’





