क्रिकेट जो संवाद था, कैसे बन गया टकराव का मंच

How cricket, once a dialogue, became a platform for confrontation

प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

क्रिकेट, जिसे कभी पड़ोसी देशों के बीच संवाद और सौहार्द का माध्यम माना जाता था, आज उसी मैदान पर राजनीतिक कटुता की गहरी लकीरें खींचता दिखाई दे रहा है। बांग्लादेशी तेज गेंदबाज मुस्ताफिजुर रहमान की आईपीएल से अचानक रिहाई ने खेल की सीमाओं को लांघते हुए भारत–बांग्लादेश संबंधों को विवाद के केंद्र में ला खड़ा किया है। जनवरी 2026 की शुरुआत में बीसीसीआई द्वारा कोलकाता नाइट राइडर्स को दिया गया यह निर्देश केवल एक खिलाड़ी का करियर प्रभावित करने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने यह प्रश्न खड़ा कर दिया कि क्या अब क्रिकेट भी कूटनीति और आक्रोश का उपकरण बन चुका है। मैदान पर गेंद नहीं, बल्कि अविश्वास और नाराज़गी उछलती दिखाई दे रही है।

इस पूरे विवाद की जड़ें बांग्लादेश की आंतरिक राजनीतिक अस्थिरता में छिपी हैं। शेख हसीना सरकार के पतन के बाद वहां अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय पर बढ़ते हमलों की खबरों ने भारत में तीखी प्रतिक्रिया को जन्म दिया। अगस्त 2025 से जनवरी 2026 के बीच हिंसा, आगजनी और हत्याओं की घटनाओं ने सामाजिक माध्यमों और राजनीतिक मंचों पर उबाल पैदा कर दिया। दिपु चंद्र दास की लिंचिंग जैसी घटनाएं केवल मानवीय त्रासदी नहीं रहीं, बल्कि वे पड़ोसी देश के साथ भावनात्मक रिश्तों पर भी चोट करने लगीं। इसी आक्रोश की छाया क्रिकेट तक पहुंच गई, जहां खेल अब भावनाओं का बंधक बनता दिख रहा है।

आईपीएल 2026 की नीलामी में मुस्ताफिजुर रहमान की बोली एक बड़े क्रिकेटीय क्षण के रूप में दर्ज हुई थी। आधार मूल्य से कई गुना अधिक, 9.20 करोड़ रुपये में केकेआर द्वारा खरीदे गए इस गेंदबाज को उनकी घातक कटर और अनुभव के लिए चुना गया था। चेन्नई और दिल्ली जैसी टीमों से भिड़ंत के बाद मिली यह राशि उनकी लोकप्रियता और उपयोगिता को दर्शाती थी। लेकिन कुछ ही हफ्तों में यह निवेश राजनीतिक दबावों के आगे बेमानी हो गया। बीसीसीआई का आदेश आते ही आईपीएल की चमक फीकी पड़ गई और खेल के व्यावसायिक तर्क भावनात्मक शोर में दब गए।

बीसीसीआई द्वारा दिए गए संक्षिप्त और अस्पष्ट कारणों ने विवाद को और हवा दी। ‘वर्तमान परिस्थितियों’ का हवाला देकर की गई रिहाई ने यह स्पष्ट कर दिया कि क्रिकेट प्रशासन भी अब राजनीतिक माहौल से अछूता नहीं रहा। यह फैसला पाकिस्तानी खिलाड़ियों के आईपीएल बहिष्कार की याद दिलाता है, जब कूटनीतिक तनाव ने खेल के दरवाजे बंद कर दिए थे। इस बार भी सोशल मीडिया पर दबाव, राष्ट्रवादी भावनाएं और राजनीतिक बयानबाज़ी निर्णायक भूमिका में दिखीं। इससे क्रिकेट की स्वायत्तता और निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लग गए हैं।

भारत में जहां इस कदम को कुछ वर्गों ने ‘राष्ट्रीय भावनाओं की रक्षा’ बताया, वहीं बांग्लादेश में इसे अपमान और भेदभाव के रूप में देखा गया। बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए मुस्ताफिजुर का एनओसी रद्द कर दिया और भारत में आईपीएल प्रसारण पर रोक लगाने की धमकी दी। इतना ही नहीं, उन्होंने आईसीसी से टी20 विश्व कप 2026 के मैच भारत से श्रीलंका स्थानांतरित करने की औपचारिक मांग भी की। यह प्रतिक्रिया केवल एक खिलाड़ी के समर्थन में नहीं थी, बल्कि राष्ट्रीय सम्मान और संप्रभुता की घोषणा बन गई, जिसने रिश्तों में और खटास घोल दी।

टी20 विश्व कप 2026 इस पूरे विवाद की सबसे अहम अंतरराष्ट्रीय कड़ी के रूप में उभरता दिखाई दे रहा है। भारत में प्रस्तावित बांग्लादेशी मैचों को लेकर सुरक्षा आशंकाओं का हवाला देते हुए श्रीलंका स्थानांतरित करने की औपचारिक मांग की गई है। BCB ने आईसीसी को पत्र भेजकर यह अनुरोध किया है, जिसने टूर्नामेंट की तैयारियों पर सवाल उठाए हैं। यदि यह मांग स्वीकार हुई, तो यह एक खतरनाक उदाहरण बनेगा कि राजनीतिक तनाव किस तरह वैश्विक खेल आयोजनों की रूपरेखा बदल सकता है। इसका सीधा असर विश्व कप की गरिमा, निष्पक्षता और अंतरराष्ट्रीय भरोसे पर पड़ना तय है।

भारत और बांग्लादेश के क्रिकेट संबंधों का इतिहास उतार–चढ़ाव और सहयोग की मिली-जुली कहानियों से भरा रहा है। 2011 विश्व कप से लेकर कई द्विपक्षीय श्रृंखलाओं तक, क्रिकेट ने दोनों देशों को करीब लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। मुस्ताफिजुर जैसे खिलाड़ी इसी सेतु के प्रतीक रहे हैं, जिन्हें सीमाओं से परे सम्मान और प्रशंसा मिली। किंतु वर्तमान घटनाक्रम ने उस सौहार्द की नींव को हिला दिया है। 1971 के युद्ध की स्मृतियां, हालिया हिंसा और बढ़ता अविश्वास रिश्तों को फिर से संदेह और दूरी की दिशा में धकेल रहा है।

इस पूरे प्रकरण में राजनीतिक हस्तक्षेप सबसे निर्णायक तत्व बनकर उभरा है। भारत में कुछ नेताओं ने केकेआर और बीसीसीआई के फैसले को राष्ट्रभावना से जोड़कर सही ठहराया, जबकि अन्य ने इसे खेल की निष्पक्षता पर आघात बताया। यह विवाद दिखाता है कि मामला केवल समर्थन या विरोध तक सीमित नहीं, बल्कि खेल संस्थाओं की स्वायत्तता से भी जुड़ा है। सोशल मीडिया पर इतना उबाल रहा कि शाहरुख खान तक निशाने पर आ गए, जहां भावनाएं विवेक पर भारी पड़ती दिखीं। नतीजतन क्रिकेट धीरे-धीरे खेल से अधिक राजनीतिक प्रतीक बनता जा रहा है, जो लोकतांत्रिक संवाद के बजाय ध्रुवीकरण को बढ़ावा दे रहा है।

आगे की राह और अधिक धुंधली व अनिश्चित होती दिखाई दे रही है। द्विपक्षीय श्रृंखलाएं, खिलाड़ियों का आदान–प्रदान और संयुक्त क्रिकेट आयोजन सभी गंभीर सवालों के घेरे में आ खड़े हुए हैं। यदि यह तनाव लंबा खिंचता है, तो भारत–बांग्लादेश के क्रिकेट संबंध भी उसी राह पर बढ़ सकते हैं, जहां राजनीति ने खेल को वर्षों तक जकड़े रखा। आईसीसी के हस्तक्षेप की संभावना भले मौजूद हो, लेकिन ठोस राजनीतिक इच्छाशक्ति के बिना किसी स्थायी समाधान की उम्मीद कमजोर है। यह हालात वैश्विक क्रिकेट के लिए चेतावनी हैं कि बढ़ता राजनीतिक दखल अंततः खेल की आत्मा को खोखला कर देगा।

मुस्ताफिजुर रहमान की रिहाई अब केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं रह गई, बल्कि वह एक गहरे प्रतीक के रूप में उभर आई है। यह घटना साफ संकेत देती है कि क्रिकेट अब सिर्फ मैदान का खेल नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पहचान, सामूहिक भावनाओं और राजनीतिक सोच का विस्तार बन चुका है। यह क्षण दोनों देशों के लिए आत्ममंथन का है कि वे क्रिकेट को संवाद और विश्वास का माध्यम बनाए रखना चाहते हैं या उसे टकराव का अखाड़ा बनने देंगे। यदि समय रहते संतुलन नहीं साधा गया, तो वह क्रिकेटीय आत्मा, जो कभी सीमाओं को जोड़ती थी, धीरे–धीरे धुंध में खो सकती है।