जाति के कोढ़ के विरुद्ध हिंदू सम्मेलन कितने जरूरी

How important is the Hindu convention against the scourge of caste?

महात्मा गांधी ने 12 मार्च, 1939 को बिड़ला मंदिर का इस शर्त पर उद्घाटन किया था कि इसमें जाति के आधार पर किसी के आने जाने पर रोक नहीं होगी। गांधी जी का यह कदम जाति के कोढ़ के खिलाफ एक बड़ा कदम था। अब उसी दिल्ली में इन दिनों हिंदू सम्मेलनों की एक श्रृंखला देखने को मिल रही है। क्या इन सम्मेलनों से जाति की बीमारी को दूर करने में मदद मिलेगी?

विवेक शुक्ला

महात्मा गांधी ने 12 मार्च, 1939 को बिड़ला मंदिर का इस शर्त पर उदघाटन किया था कि इसमें जाति के आधार पर किसी के आने जाने पर रोक नहीं होगी। गांधी जी का यह कदम जाति के कोढ़ के खिलाफ एक बड़ा कदम था। बिड़ला मंदिर से कुछ दूरी पर स्थित वाल्मीकी मंदिर में गांधी जी 1 अप्रैल 1946 से10 जून 1947 तक कुल 214 दिन वाल्मीकियों के साथ रहे थे। उनका यह सब करने के पीछे लक्ष्य था जाति के कोढ़ पर बोलना। अब उसी दिल्ली में इन दिनों हिंदू सम्मेलनों की एक श्रृंखला देखने को मिल रही है। भाई वीर सिंह बस्ती से लेकर आई.पी. एक्सटेंशन, सैनी एन्कल्वेव, जसोला विहार, पीतमपुरा, छत्तरपुर, न्यू अशोक नगर और यमुना पार के विभिन्न इलाकों तक—ये आयोजन छोटे-बड़े स्तर पर हो रहे हैं।

इनका केंद्रीय संदेश स्पष्ट है: हिंदू समाज को जाति के कोढ़ से मुक्त करना, सामाजिक समरसता स्थापित करना और एक सशक्त, संगठित हिंदू पहचान का निर्माण। कई स्थानों पर उपस्थित जनसमूह ने सामूहिक संकल्प लिया कि जाति-पात के भेदभाव को मिटाकर पहले हिंदू होने का गौरव अपनाया जाए। यह प्रवृत्ति केवल दिल्ली तक सीमित नहीं, बल्कि आरएसएस के शताब्दी वर्ष में देशव्यापी अभियान का हिस्सा प्रतीत होती है, जिसमें एक लाख से अधिक ऐसे सम्मेलनों की योजना है।

जाति व्यवस्था हिंदू समाज की सबसे पुरानी और जटिल चुनौतियों में से एक रही है। वर्ण-आधारित विभाजन, जो मूलतः गुण-कर्म पर टिका था, समय के साथ जन्म-आधारित कठोर जाति में बदल गया। इससे न केवल सामाजिक असमानता बढ़ी, बल्कि हिंदू समाज आंतरिक रूप से खंडित होता गया। बंटवारे की यह दीवार इतनी मजबूत हो गई कि बाहरी चुनौतियों—चाहे विदेशी आक्रमण हों या आज की वैचारिक घुसपैठ—के सामने हिंदू समाज बार-बार कमजोर पड़ता रहा। ईस्ट दिल्ली में आगामी रविवार को होने वाले एक विराट हिन्दू सम्मेलन की स्वागत समिति के अध्यक्ष और पेशे से टैक्स कंसलटेंट सुरेन्द्र कुमार गंभीर कहते हैं कि जब तक हिंदू समाज जाति के नाम पर आपस में लड़ता रहेगा, तब तक राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक सुरक्षा का सपना अधूरा ही रहेगा। वे मानते हैं कि हिन्दू समाज को जाति के कोढ़ को खत्म करना ही होगा।

इन सम्मेलनों में बार-बार दोहराया जा रहा है कि जातिवाद हिंदू समाज के लिए जहर है। इनमें कई वक्ताओं ने स्पष्ट कहा कि जाति भेद मिटाकर पहले “हिंदू” मानने की अपील की जानी चाहिए। कई जगहों पर संकल्प लिया गया—जाति-पात से ऊपर उठना, एक-दूसरे को भाई-बहन मानना, मंदिरों में समान प्रवेश, सामाजिक बहिष्कार का अंत और विवाह-संबंधों में खुलापन। यह संदेश नया नहीं है। डॉ. आंबेडकर से लेकर वीर सावरकर, गांधी और अब मोहन भागवत तक—सभी ने अलग-अलग भाषा में यही कहा कि जाति-भेद मन से मिटाना होगा। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत जी ने हाल ही में दोहराया

कि व्यक्ति का मूल्यांकन जाति, संपत्ति या भाषा से नहीं होना चाहिए; पूरा देश सबका है।

फिर भी सवाल उठता है—क्या ये सम्मेलन केवल नारे तक सीमित रहेंगे या वास्तविक बदलाव ला पाएंगे? इतिहास गवाह है कि अच्छे इरादे और भाषण कई बार कागजी संकल्प बनकर रह जाते हैं। जाति की जड़ें इतनी गहरी हैं कि वे परिवार, विवाह, राजनीति, रोजगार और यहां तक कि धार्मिक अनुष्ठानों में भी पैठ बनाए हुए हैं। दिल्ली जैसे महानगर में जहां शिक्षा और आधुनिकता का दावा है, वहां भी अंतर्जातीय विवाहों की दर बेहद कम है। ग्रामीण क्षेत्रों की तो बात ही छोड़िए।

इन सम्मेलनों की सफलता कई शर्तों पर टिकी है। पहला—संगठित निरंतरता। एक-दो आयोजन से काम नहीं चलेगा; इसे मासिक, त्रैमासिक अभियान में बदलना होगा। दूसरा—जमीनी कार्य। केवल भाषण नहीं, बल्कि अंतर्जातीय भोज, संयुक्त पूजा, सामूहिक विवाह, दलित-वंचित परिवारों की मदद, मंदिरों में समान भागीदारी जैसे व्यावहारिक कदम उठाने होंगे। तीसरा—युवा और महिलाओं की भागीदारी। बदलाव की असली ताकत नई पीढ़ी में है।

यदि युवा जाति के नाम पर भेदभाव को अस्वीकार करेंगे, तो अगली पीढ़ी में यह कोढ़ काफी हद तक सूख जाएगा। चौथा—सभी संप्रदायों का समावेश। जैन, सिख, बौद्ध और आर्य समाजी परंपराओं को भी साथ लेकर चलना होगा, क्योंकि हिंदू एकता का मतलब केवल सनातनी नहीं, बल्कि व्यापक भारतीय धार्मिक-सांस्कृतिक एकता है।

एक और महत्वपूर्ण बिंदु—ये सम्मेलन केवल आंतरिक सुधार तक सीमित न रहें। आज हिंदू समाज को बाहरी चुनौतियों का भी सामना है—धर्मांतरण, ऐतिहासिक गलत बयानी, वैश्विक स्तर पर हिंदू-विरोधी नैरेटिव। जाति का कोढ़ खत्म होना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि यही विभाजन बाहरी ताकतों को अंदर घुसने का मौका देता है। जब हिंदू एकजुट होंगे, तब ही सनातन मूल्यों—सत्य, अहिंसा, सेवा, सह-अस्तित्व—की रक्षा संभव होगी।

इन सम्मेलनों का एक प्रमुख उद्देश्य हिंदू समाज को संगठित करना और सांस्कृतिक चेतना को मजबूत करना बताया जाता है। आयोजकों का तर्क है कि वैश्वीकरण, शहरीकरण और आधुनिक जीवनशैली के दबाव में पारंपरिक मूल्य कमजोर पड़ रहे हैं, ऐसे में सांस्कृतिक आत्मविश्वास को पुनर्जीवित करना आवश्यक है। कार्यक्रमों में धार्मिक प्रवचन, सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ, विचार गोष्ठियाँ और सामाजिक विषयों पर भाषण शामिल होते हैं। कई बार शिक्षा, जनसंख्या, धर्मांतरण, मंदिरों का प्रबंधन और ऐतिहासिक विरासत जैसे मुद्देभी चर्चा के केंद्र में रहते हैं।

दिल्ली के ये हिंदू सम्मेलन एक आशाजनक शुरुआत हैं। यदि इनमें से निकले संकल्प कागज पर नहीं, बल्कि व्यवहार में उतरें, तो यह न केवल हिंदू समाज के लिए, बल्कि पूरे राष्ट्र के लिए ऐतिहासिक कदम साबित हो सकता है। जाति का कोढ़ उतरने से हिंदू समाज न केवल मजबूत बनेगा, बल्कि वह एक ऐसे भारत का निर्माण करेगा जो वास्तव में “सर्वे भवन्तु सुखिनः” के आदर्श को साकार कर सकेगा। समय आ गया है कि हम नारे से आगे बढ़कर कार्य करें—जाति नहीं, केवल हिंदू।