दिलीप कुमार पाठक
आज के दौर में ‘एआई’ (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) एक ऐसा शब्द बन गया है जो चर्चा में तो बहुत है, लेकिन इसे लेकर आम आदमी के मन में डर और उत्साह दोनों हैं। सरल भाषा में कहें तो एआई एक ऐसी ‘दिमागी मशीन’ है जिसे इंसान ने बनाया है ताकि वह मशीनों को इंसान की तरह सोचने, समझने और काम करने की ताकत दे सके। जैसे सदियों पहले पहिए ने इंसान की गति बदली और फिर ट्रैक्टर ने खेतों में बैलों की जगह ली, वैसे ही एआई अब हमारे सोचने और काम करने के ढंग को पूरी तरह बदल रहा है। अब सवाल यह उठता है कि क्या यह जादुई मशीन हमारे लिए वरदान साबित होगी, या यह एक ऐसा अभिशाप है जो हमें पीछे धकेल देगा?
अगर हम फायदे की बात करें, तो एआई एक बहुत बड़ा वरदान बनकर उभरा है। एक आम मजदूर, कारीगर या किसान के लिए यह किसी सच्चे और जानकार साथी जैसा है। मान लीजिए, कोई किसान अपनी फसल की फोटो मोबाइल से खींचता है, तो एआई तकनीक उसे तुरंत बता सकती है कि फसल में कौन सी बीमारी लगी है और कौन सी दवा छिड़कनी चाहिए। जो भाई-बहन पढ़-लिख नहीं सकते, वे अब मोबाइल से अपनी भाषा में बात करके सरकारी योजनाओं, पेंशन या राशन कार्ड की जानकारी ले सकते हैं। उन्हें अब किसी बिचौलिए के चक्कर काटने की जरूरत नहीं पड़ेगी। अस्पतालों में एआई के जरिए कैंसर और दिल की बीमारियों का पता बहुत जल्दी चल रहा है, जिससे इलाज सस्ता और सटीक हो गया है। कारखानों में खतरनाक मशीनों के बीच काम करने वाले मजदूरों की सुरक्षा के लिए एआई एक ढाल की तरह है; यह मशीन की खराबी को पहले ही पकड़ लेता है, जिससे बड़े हादसों को रोका जा सकता है। लेकिन, सिक्के का दूसरा पहलू भी है जो इसे एक अभिशाप की तरह दिखाता है। आम आदमी के मन में सबसे बड़ा डर ‘बेरोजगारी’ का है। जहाँ पहले दस आदमी मिलकर कोई काम करते थे, वहाँ अब एक एआई वाली मशीन उसे अकेले और बहुत तेजी से निपटा रही है। इससे उन लोगों के मन में असुरक्षा की भावना पैदा हो रही है जो केवल शारीरिक श्रम पर निर्भर हैं। इसके अलावा, एआई के जरिए आजकल ‘डीपफेक’ जैसी धोखाधड़ी हो रही है, जिसमें किसी की भी नकली आवाज या चेहरा बनाकर लोगों को ठगा जा रहा है। यह तकनीक हमें मानसिक रूप से आलसी भी बना सकती है, क्योंकि हम हर छोटे-बड़े सवाल के जवाब के लिए मशीन पर निर्भर होने लगे हैं। अगर हम अपनी सोचने-समझने की शक्ति मशीनों को सौंप देंगे, तो हमारी खुद की बुद्धि कुंद हो सकती है।
यहाँ सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हम इस नई तकनीक से परहेज करके या डरकर दूर नहीं भाग सकते। इतिहास गवाह है कि जब देश में पहली बार कंप्यूटर आया था, तब भी बहुत शोर मचा था कि यह करोड़ों लोगों का रोजगार खा जाएगा। लेकिन वक्त ने दिखाया कि कंप्यूटर ने काम को छीना नहीं, बल्कि करोड़ों नए तरह के रोजगार पैदा किए। एआई के साथ भी यही होने वाला है। जो लोग यह सोचकर इससे दूरी बना लेंगे कि यह उनके काम का नहीं है, वे वक्त की दौड़ में बहुत पीछे छूट जाएंगे। दुनिया बहुत तेजी से बदल रही है, और अगर हम इस बदलाव के साथ नहीं चले, तो हमारी मेहनत और हमारी काबिलियत पुरानी पड़ जाएगी।
अब समय आ गया है कि हम खुद को इस बदलाव के सांचे में ढालें और इसका सदुपयोग सीखें। हमें यह समझना होगा कि एआई हमारा दुश्मन नहीं, बल्कि एक ‘आधुनिक औजार’ है। जैसे हाथ से लकड़ी काटने के बजाय आरा मशीन का इस्तेमाल करना बुद्धिमानी है, वैसे ही दिमाग के बोझ को कम करने के लिए एआई का सहारा लेना जरूरी है। हमें अपनी नई पीढ़ी को इस तकनीक के प्रति तैयार करना होगा। एआई का सही इस्तेमाल सीखकर एक मजदूर अपनी कार्यक्षमता बढ़ा सकता है और एक छोटा दुकानदार अपने व्यापार को बड़ा बना सकता है। अंत में, यह बात गांठ बांध लेनी चाहिए कि एआई अपने आप में न तो अच्छा है और न ही बुरा। यह ठीक ‘आग’ की तरह है। आग से चूल्हा जलता है जिससे घर में खुशहाली आती है, और उसी आग से घर जल भी सकता है। सब कुछ इस पर निर्भर करता है कि आग किसके हाथ में है और वह उसका इस्तेमाल कैसे करता है। हमें एआई को अपना गुलाम बनाकर रखना है, उसे अपना मालिक नहीं बनने देना है। अगर हम जागरूक रहेंगे और इसे अपनी भलाई के लिए इस्तेमाल करेंगे, तो यह मानव सभ्यता के लिए अब तक का सबसे बड़ा वरदान साबित होगा। वक्त के साथ कदम मिलाना ही बुद्धिमानी है, क्योंकि ठहर जाना ही असली हार है।





