बंगाल में पार्टियां बदलीं, सरकार बदली, सियासी चेहरे बदले, पुलिस तंत्र भी बदलता गया, नहीं बदली तो बस कानून एवं व्यवस्था

In Bengal, parties changed, governments changed, political faces changed, the police system also changed, but the only thing that did not change was law and order

अशोक भाटिया

पश्चिम बंगाल की बदहाल कानून व्यवस्था की गूंज राष्ट्रीय पटल पर हमेशा होती है। इस मुद्दे पर विपक्षी दल सत्ताधारी दल पर निशाना साधते हैं। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इसे बंगाल की छवि को खराब करने की साजिश बताती हैं। इस बार भी चुनाव में कानून-व्यवस्था ज्वलंत मुद्दा है। यहां ईडी और एनआईए पर भी हमले हो चुके हैं।बंगाल में पार्टियां बदलीं, सरकार बदली, सियासी चेहरे बदले, पुलिस तंत्र भी बदलता गया, नहीं बदली तो बस कानून एवं व्यवस्था की बदतर हालत। समय के साथ पुलिस डिस्ट्रिक्ट के गठन हुए, कमिश्नरेट बने, दर्जनों थाने खुले, विभिन्न पुलिस प्रकोष्ठ के निर्माण हुए, ढेरों पद सृजित हुए, पुलिसकर्मियों को अत्याधुनिक हथियारों व उपकरणों से लैस किया गया, फिर भी कानून एवं व्यवस्था की स्थिति जस की तस है।

वाममोर्चा के 34 वर्षों के शासनकाल से लेकर वर्तमान में तृणमूल कांग्रेस के 15 वर्षों के राज तक बंगाल में कानून एवं व्यवस्था की बदहाली प्रत्येक चुनाव में बदस्तूर ज्वलंत मुद्दा बना हुआ है। इस विधानसभा चुनाव में भी इसकी गूंज सुनाई दे रही है।

भाजपा, कांग्रेस, वाममोर्चा से लेकर चुनावी मैदान में उतरे छोटे-बड़े सभी दल कानून एवं व्यवस्था की स्थिति को लेकर तृणमूल पर निशाना साध रहे हैं। दूसरी ओर राज्य की मुख्यमंत्री व तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी हर बार की तरह इसे विरोधी दलों की बंगाल की छवि बिगाड़ने की साजिश करार दे रही हैं।

वहीं, तृणमूल के नेता-कार्यकर्ता चुनाव प्रचार में कह रहे हैं कि राष्ट्रीय क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो ने कोलकाता को देश का सबसे सुरक्षित शहर करार दिया है। आखिर बंगाल में कानून एवं व्यवस्था ध्वस्त क्यों है?इसके जवाब में कानून विशेषज्ञ बृजेश गिरि बताते हैं कि बंगाल में दशकों से एक ट्रेंड चलता आ रहा है, वह यह है कि जब जिस पार्टी के हाथों में सत्ता होगी, पुलिस पर पूरी तरह से उसी का नियंत्रण होगा। पुलिस सत्ताधारी पार्टी की कैडर बनकर रह गई है। वाममोर्चा के जमाने में तो थाने में घुसकर पुलिस वालों को धमकाया जाता था। थाने में तोड़फोड़ की कई घटनाएं हो चुकी हैं।

बंगाल में विधानसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा से काफी पहले केंद्रीय बल भेजा जाना और 294 सीटों वाले उत्तर प्रदेश से लगभग आधी सीटें होने पर भी बंगाल में वहां की तरह 2 चरणों में मतदान कराया जाना, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है कि चुनाव आयोग इस राज्य को लेकर कितना सतर्क है।

चुनाव की घोषणा से पहले बंगाल में तैयारियों का जायजा लेने कोलकाता आई चुनाव आयोग की पूर्ण पीठ ने राज्य के आला प्रशासनिक व पुलिस अधिकारियों को हिंसा-मुक्त चुनाव कराने का बेहद कड़ा निर्देश दिया है। मुख्य चुनाव आयुक्त ने तो यहां तक कहकर गए हैं कि पुलिस-प्रशासन ने अगर ठीक तरीके से अपना काम नहीं किया तो आयोग को काम करवाना आता है।

गौरतलब है कि बंगाल कानून को शर्मसार करने वाली घटनाओं की लंबी फेहरिस्त है । बंगाल में कानून-व्यवस्था की इससे लज्जाजनक तस्वीर और क्या होगी कि 2014 में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के निवास स्थल से कुछ दूरी पर स्थित अलीपुर थाने में तृणमूल नेता के हमले के दौरान वहां ड्यूटी कर रहे पुलिसकर्मी जान बचाने के लिए मेज के नीचे छिप गए थे। विरोधी दल लगातार कानून-व्यवस्था का मुद्दा उठाते आए हैं।पिछले कई राज्यपाल भी इसे लेकर सवाल करते आए हैं। बोगटूई में लोगों के घरों में ताला जड़कर आग लगाकर जिंदा जलाकर मार डाला गया।कृष्णागंज में तृणमूल विधायक सत्यजीत विश्वास और झालदा में कांग्रेस पार्षद तपन कांदू की सरेआम गोली मारकर हत्याकर दी गई थी।माकपा के युवा संगठन डीवाईएफआई के कार्यकर्ता अनीस खान के घर में पुलिस की वर्दी में घुसकर उन्हें छत से फेंककर हत्या कर दी गई।संदेशखाली में पुलिस की नाक के नीचे बड़ी संख्या में महिलाओं का यौन उत्पीड़न व ईडी की टीम पर हमला।पूर्व मेदिनीपुर जिले के भूपतिनगर में विस्फोट कांड की तफ्तीश के सिलसिले में गई एनआईए की टीम पर हमला।2021 के विधानसभा चुनाव के बाद हुई हिंसा व पिछले साल हुए पंचायत चुनाव में भारी रक्तपात इसकी वीभत्सता को और बढ़ाते हैं।

राज्यपाल डॉ. सीवी आनंद बोस तो पिछले साल पंचायत चुनाव के समय सड़क पर उतर गए थे। लोगों के बीच सुरक्षा की भावना पैदा करने को उन्होंने इस चुनाव में भी मतदान के दिनों में लोगों के बीच रहने की बात कही है। सियासी विश्लेषकों का कहना है कि बंगाल में भ्रष्टाचार की तरह कानून-व्यवस्था भी बड़ा मुद्दा है। राज्य में कई बार राष्ट्रपति शासन लागू करने की भी मांग उठ चुकी है।

जब तक पुलिस से सत्ताधारी पार्टी का नियंत्रण नहीं हटेगा, तब तक कानून-व्यवस्था की स्थिति में सुधार की उम्मीद करना बेमानी है। सत्ताधारी पार्टी और पुलिस के बीच स्पष्ट रेखा होनी चाहिए। पुलिस को निष्पक्ष व स्वतंत्र तरीके से काम करने की छूट देनी होगी।

इस बार भी भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) ने शांतिपूर्वक बंगाल चुनाव कराने के लिए केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों की तैनाती की है। चुनाव आयोग के अनुसार, पश्चिम बंगाल में मतगणना पूरी होने के बाद भी केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सीएपीएफ) की 500 कंपनियां कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए तैनात रहेंगी। चुनाव के बाद भी सीएपीएफ की कंपनियां बंगाल में तैनात रहेंगी। यह तैनाती ईसीआई के अगले आदेश तक जारी रहेगी।

बता दें कि भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) ने 15 मार्च को असम, केरल, पुडुचेरी, तमिलनाडु तथा पश्चिम बंगाल की विधानसभाओं के लिए आम चुनाव और गोवा, गुजरात, कर्नाटक, महाराष्ट्र, नागालैंड तथा त्रिपुरा के आठ विधानसभा क्षेत्रों के लिए उपचुनाव का कार्यक्रम घोषित किया था। इसके तहत असम, केरल, पुडुचेरी, गोवा, कर्नाटक, नागालैंड और त्रिपुरा में 9 अप्रैल तथा तमिलनाडु, गुजरात और महाराष्ट्र में 23 अप्रैल को वोट डाले जाएंगे। वहीं, पश्चिम बंगाल में दो चरणों में 23 अप्रैल और 29 अप्रैल को मतदान हो रहा है ।

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 135बी के अनुसार, किसी भी व्यवसाय, व्यापार, औद्योगिक उपक्रम या किसी अन्य संस्था में कार्यरत प्रत्येक व्यक्ति, जिसे लोक सभा या राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं के चुनाव या किसी संसदीय/विधानसभा क्षेत्र में उपचुनाव में मतदान का अधिकार प्राप्त है, उसे मतदान के दिन सवैतनिक अवकाश प्रदान किया जाएगा।

ऐसे सवैतनिक अवकाश के कारण किसी भी कर्मचारी के वेतन में कटौती नहीं की जाएगी। कोई भी नियोक्ता जो इन प्रावधानों का उल्लंघन करता है, उसे जुर्माने का सामना करना पड़ेगा। सभी दैनिक वेतन भोगी और आकस्मिक मजदूरों को भी मतदान के दिन सवैतनिक अवकाश का अधिकार होगा।

आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि ऐसे मतदाता (जिसमें आकस्मिक और दैनिक वेतन भोगी श्रमिक शामिल हैं) जो अपने निर्वाचन क्षेत्र के बाहर स्थित औद्योगिक या वाणिज्यिक संस्थानों में कार्यरत हैं, लेकिन मतदान होने वाले किसी निर्वाचन क्षेत्र में पंजीकृत हैं, उन्हें भी मतदान के दिन सवैतनिक अवकाश का लाभ मिलेगा, जिससे वे अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकें।

आयोग ने सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेश सरकारों को निर्देश दिया है कि वे सभी संबंधित अधिकारियों को इन प्रावधानों के सख्त पालन के लिए आवश्यक निर्देश जारी करें और यह सुनिश्चित करें कि सभी मतदाता अपने मताधिकार का स्वतंत्र और सुविधाजनक रूप से प्रयोग कर सकें।

मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार ने राज्य के मुख्य सचिव, DGP (पुलिस महानिदेशक) और अन्य वरिष्ठ प्रशासनिक व पुलिस अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए हैं। उन्होंने यह सुनिश्चित करने को कहा है कि नागरिक बिना किसी डर के मतदान करें और चुनाव प्रक्रिया पूरी तरह से हिंसा, धमकी, प्रलोभन, छप्पा (फर्जी मतदान) और बूथ कैप्चरिंग से मुक्त हो। चुनाव के बाद राज्य में होने वाली हिंसा के इतिहास को ध्यान में रखते हुए ही आयोग ने 500 कंपनियों को चुनाव के बाद भी रोके रखने का महत्वपूर्ण फैसला लिया है।

2021 चुनाव के बाद हुई हिंसा पर NHRC की रिपोर्ट पर नजर डाले तो हम पाएंगे कि 2021 के विधानसभा चुनाव के बाद हुई हिंसा की राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) की जांच रिपोर्ट में कई गंभीर तथ्य सामने आए थे। राज्य के DGP ने 2 मई 2021 से 20 जून 2021 के बीच हिंसा की 1,970 शिकायतों की जानकारी दी थी।29 हत्याएं, 12 यौन उत्पीड़न, 391 गंभीर चोट के मामले, 940 आगजनी/तोड़फोड़ और 562 आपराधिक धमकी के मामले।1,970 शिकायतों में से केवल 1,168 को FIR में बदला गया और कुल 9,304 आरोपियों में से सिर्फ 1,345 को गिरफ्तार किया गया।311 स्थानों पर की गई स्पॉट जांच में पाया गया कि 60% जगहों पर FIR दर्ज ही नहीं की गई थी।

चुनाव आयोग के एक अधिकारी ने स्पष्ट किया कि भले ही बंगाल में 6 मई को मतदान पूरा हो जाएगा, लेकिन चुनाव बाद की हिंसा का चुनाव से सीधा संबंध होता है, जो चुनाव आयोग को इसमें एक हितधारक बनाता है। नई सरकार बनने के बाद भी, बलों को वापस बुलाने के लिए राज्य को चुनाव आयोग या केंद्रीय गृह मंत्रालय को पत्र लिखना होगा, और क्योंकि तैनाती आयोग के अगले आदेश तक है, इसलिए मंत्रालय को भी EC से मंजूरी लेनी होगी।

: चुनाव की घोषणा से पहले पश्चिम बंगाल सरकार ने 832 TMC नेताओं और 144 अन्य (TMC समर्थकों सहित) को सुरक्षा प्रदान करने के लिए 2,185 पुलिसकर्मियों को तैनात किया था। आयोग ने DGP को 2-3 दिनों के भीतर इसकी पेशेवर तरीके से समीक्षा करने और सभी राजनीतिक दलों के पदाधिकारियों/समर्थकों के बीच सुरक्षाकर्मियों का समान वितरण करने का आदेश दिया है।खंडाघोष विधानसभा क्षेत्र के संयुक्त BDO और सहायक RO को TMC के लिए खुलेआम प्रचार करने के आरोप में चुनाव आयोग ने गुरुवार को निलंबित कर दिया और उनके खिलाफ कार्रवाई के आदेश दिए।आयोग के एक सूत्र ने बताया कि 27 अक्टूबर 2025 को राज्य में SIR शुरू होने से ठीक पहले पश्चिम बंगाल सरकार ने बड़े पैमाने पर 1,370 अधिकारियों का तबादला किया था। इसमें 97 IAS, 146 IPS, 1,080 पश्चिम बंगाल सिविल सेवा और 47 पश्चिम बंगाल पुलिस के अधिकारी शामिल थे।