ग्लोबल बनने की होड़ में कहीं खो न जाए अपनी ‘ममकार’ वाली बोली

In the race to become global, let our 'Mamakar' dialect not get lost

दिलीप कुमार पाठक

आज 21 फरवरी है, ‘अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस’। यह दिन हमें याद दिलाता है कि दुनिया की हजारों भाषाओं के शोर में वह सबसे पहली ‘ममकार’ वाली बोली कहाँ है, जिसे हमने अपनी माँ की गोद में सीखा था। मातृभाषा सिर्फ व्याकरण या शब्दों का समूह नहीं है, यह वह पालना है जिसमें हमारी संस्कृति और संस्कार बड़े होते हैं। भारत जैसे देश में, जहाँ हर कुछ किलोमीटर पर बोली बदल जाती है, वहाँ मातृभाषा का महत्व और भी गहरा हो जाता है।
सोचिए, क्या ‘अम्मा’ या ‘माँ’ कहने में जो सुकून मिलता है, वह किसी विदेशी शब्द में मुमकिन है? क्या ब्रज की मिठास, बुंदेली का ठाठ, भोजपुरी का अपनापन या राजस्थानी की खनक का कोई विकल्प हो सकता है? बिल्कुल नहीं। हमारी क्षेत्रीय बोलियाँ हमारे इतिहास की संदूक हैं। इनमें हमारे पुरखों के अनुभव, लोकगीत, मुहावरे और वे किस्से दफन हैं, जो हमें भीड़ में भी एक विशिष्ट पहचान देते हैं। जब एक भाषा मरती है, तो उसके साथ सदियों का लोक-ज्ञान भी मर जाता है।

अक्सर हम अपनी भाषा को केवल संवाद का जरिया मानते हैं, लेकिन गहराई से देखें तो यह हमारे व्यक्तित्व का हिस्सा है। घर के आंगन में बोली जाने वाली भाषा हमें अपनों से जोड़ती है और हमें मानसिक सुरक्षा का अहसास कराती है। आज के तकनीकी दौर में जब सब कुछ डिजिटल हो रहा है, हमारी बोलियों का अस्तित्व बचाना एक बड़ी चुनौती बन गया है। सोशल मीडिया और इंटरनेट पर हम अक्सर दूसरी भाषाओं का सहारा लेते हैं, जिससे हमारी अपनी शब्दावली धीरे-धीरे कम होती जा रही है। हमें समझना होगा कि अगर हम अपनी भाषा में नहीं लिखेंगे, तो वह धीरे-धीरे केवल बोलचाल तक सीमित रह जाएगी और एक दिन इतिहास बन जाएगी। स्कूल और कॉलेजों में भी बच्चों को यह सिखाना जरूरी है कि वे अपनी मातृभाषा बोलने में गर्व महसूस करें, न कि हीन भावना। जब कोई बच्चा अपनी भाषा में सवाल पूछता है, तो उसकी समझ और आत्मविश्वास कहीं ज्यादा मजबूत होता है। हमें घर के माहौल में भी अपनी बोलियों को जीवित रखना होगा, ताकि आने वाली पीढ़ी अपने दादा-दादी के लोकगीतों और किस्सों का आनंद ले सके। साहित्यकारों और स्थानीय कलाकारों को भी चाहिए कि वे अपनी भाषा में आधुनिक विषयों पर सृजन करें ताकि युवा वर्ग उससे जुड़ सके। भाषा का संरक्षण किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। यदि हम अपनी भाषा के प्रति सजग नहीं हुए, तो हमारी सांस्कृतिक विविधता का रंग फीका पड़ जाएगा। हमें अपनी भाषा के शब्दों को सहेज कर रखना होगा, क्योंकि शब्द ही वे ईंटें हैं जिनसे हमारे समाज की नींव बनी है। अपनी भाषा को बचाना अपनी जड़ों को पानी देने जैसा है, जिससे हमारे भविष्य का पेड़ हरा-भरा रहेगा। आज की भागदौड़ और ‘ग्लोबल’ बनने की होड़ में हम अक्सर अपनी बोलियों को ‘पिछड़ापन’ समझ लेते हैं। हम अंग्रेजी बोलने में गर्व और अपनी देहाती या क्षेत्रीय भाषा बोलने में शर्म महसूस करने लगे हैं। यह आत्महीनता ही किसी भाषा के पतन का पहला कारण बनती है। सच तो यह है कि जो व्यक्ति अपनी भाषा का सम्मान नहीं कर सकता, वह अपनी संस्कृति का संरक्षण कभी नहीं कर पाएगा। बहुभाषी होना बुद्धिमानी है, लेकिन अपनी मातृभाषा को भूल जाना अपनी जड़ें काट लेने जैसा है।

यूनेस्को के आंकड़े बताते हैं कि दुनिया की कई भाषाएँ विलुप्ति की कगार पर हैं। भारत में भी कई जनजातीय भाषाएँ और क्षेत्रीय बोलियाँ दम तोड़ रही हैं। हमें यह समझना होगा कि आधुनिकता का मतलब अपनी जड़ों को भूलना नहीं है। विज्ञान भी कहता है कि मौलिक चिंतन और रचनात्मकता मातृभाषा में ही सबसे अच्छी तरह निखरती है। यदि हम चाहते हैं कि हमारी आने वाली पीढ़ी अपनी विरासत पर गर्व करे, तो हमें उनके कानों में अपनी मिट्टी की बोली के रस घोलने होंगे।

आज के दिन का असली जश्न तभी है, जब हम अपनी भाषा को केवल किताबों तक सीमित न रखें, बल्कि उसे अपने दैनिक व्यवहार, दफ्तरों और चर्चाओं का हिस्सा बनाएं। अपनी मातृभाषा के गीत गाएं, उसकी कविताएं पढ़ें और अपने बच्चों को गर्व के साथ अपनी बोली सिखाएं। याद रखिए, जिस समाज के पास अपनी भाषा नहीं होती, वह समाज अपनी आत्मा खो चुका होता है। आइए, आज संकल्प लें कि हम अपनी मातृभाषा के दीप को बुझने नहीं देंगे और इसे पूरी शान के साथ अगली पीढ़ी को सौंपेंगे।