संघर्ष और अस्थिरता के दौर में भरोसे का केंद्र बनता भारत

India becomes a center of trust in times of conflict and instability

प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

मध्य पूर्व में भड़का संघर्ष अब केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक व्यवस्था को प्रभावित करने वाला संकट बन गया है। अमेरिका-ईरान तनाव, इज़राइल से जुड़ी घटनाएँ और होर्मुज जलडमरूमध्य की अस्थिरता ने व्यापार व ऊर्जा आपूर्ति पर खतरा बढ़ाया है। ऐसे समय में भारत ने संतुलित और दूरदर्शी विदेश नीति का परिचय दिया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने ब्रिक्स जैसे मंच को सक्रिय कर सदस्य देशों के बीच संवाद को बढ़ावा दिया। भारत ने स्पष्ट किया कि युद्ध नहीं, बल्कि शांति, कूटनीति और सामूहिक प्रयास ही वैश्विक स्थिरता का आधार हैं। इसी कारण इस संकट में भारत एक जिम्मेदार और संतुलित शक्ति के रूप में उभरा है।

ब्रिक्स की अध्यक्षता संभालते ही मोदी सरकार ने संगठन में नई ऊर्जा भरने का प्रयास किया। “सहयोग, नवाचार और स्थिरता के माध्यम से लचीले भविष्य का निर्माण” की सोच के साथ भारत ने ब्रिक्स को केवल आर्थिक मंच नहीं, बल्कि वैश्विक समस्याओं के समाधान का माध्यम बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया। इस नीति का केंद्र विकासशील देशों की आवाज को विश्व राजनीति में उचित स्थान दिलाना रहा। भारत ने यह भी दिखाया कि जी20 की कूटनीतिक सफलता को ब्रिक्स में भी आगे बढ़ाया जा सकता है। मतभेदों के बावजूद भारत ने संवाद जारी रखा और संगठन में विभाजन को कम करने का प्रयास किया, हालाँकि पूर्ण सहमति बनाना चुनौतीपूर्ण रहा। यह नेतृत्व भारत की बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा को दर्शाता है।

संकट की घड़ी में भारत की कूटनीति का प्रमुख पहलू यह रहा कि उसने सभी ब्रिक्स देशों को एक साझा मंच पर लाने का प्रयास किया। बारह मार्च की वर्चुअल बैठक में भारत ने सदस्य देशों के बीच खुले और रचनात्मक संवाद को प्रोत्साहित किया। “शेरपा तंत्र” के माध्यम से लगातार बातचीत जारी रही, ताकि मतभेदों के बीच भी सहमति का मार्ग निकल सके। भारत का दृष्टिकोण स्पष्ट था—किसी पक्ष का समर्थन करने के बजाय शांति और स्थिरता के लिए सामूहिक प्रयास हों। इस पहल ने ब्रिक्स को केवल औपचारिक संगठन नहीं, बल्कि एक सक्रिय वैश्विक मंच के रूप में उभारने में मदद की और यह भारत की स्वतंत्र, संतुलित विदेश नीति का प्रमाण भी है।

बढ़ते क्षेत्रीय तनाव के बीच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने व्यक्तिगत स्तर पर भी सक्रिय कूटनीति का परिचय दिया। उन्होंने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान से टेलीफोन पर बातचीत कर स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की। वार्ता में नागरिकों की सुरक्षा, बुनियादी ढांचे की रक्षा और संघर्ष को फैलने से रोकने की आवश्यकता पर विशेष जोर दिया गया। भारत ने स्पष्ट किया कि संवाद और कूटनीति ही स्थायी समाधान का मार्ग है। साथ ही अमेरिका और इज़राइल जैसे देशों के साथ संबंधों का संतुलन भी बनाए रखा गया। यह बहुआयामी कूटनीति भारत की रणनीतिक परिपक्वता को दर्शाती है, जिसमें राष्ट्रीय हित, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक स्थिरता तीनों को समान महत्व दिया गया है।

ब्रिक्स के भीतर स्थिति इसलिए भी जटिल थी क्योंकि कई सदस्य देश सीधे मध्य पूर्व की राजनीति से जुड़े हैं। ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों के अपने क्षेत्रीय हित हैं, जिनसे मतभेद स्वाभाविक हैं। इसके बावजूद भारत ने संयम और धैर्य के साथ संवाद को आगे बढ़ाया। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रंधीर जायसवाल ने कहा कि भारत लगातार सदस्य देशों के संपर्क में है और सहमति का मार्ग तलाश रहा है और कुछ सदस्यों के सीधे शामिल होने से सहमति बनाना चुनौतीपूर्ण है। भारत ने चीन और रूस जैसे प्रमुख देशों के साथ भी समन्वय बनाए रखा। इन प्रयासों ने ब्रिक्स की विश्वसनीयता को मजबूत किया और यह संदेश दिया कि विकासशील देशों का यह समूह वैश्विक मुद्दों पर प्रभावी भूमिका निभा सकता है।

ऊर्जा सुरक्षा के मोर्चे पर भी मोदी सरकार ने अत्यंत दूरदर्शी कदम उठाए। मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास स्थिति संवेदनशील हो गई थी, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका थी। भारत ने कूटनीतिक माध्यमों से अपने तेल टैंकरों और ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए सक्रिय प्रयास किए। इसके साथ ही सरकार ने वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों, घरेलू गैस आपूर्ति और दीर्घकालिक ऊर्जा समझौतों पर भी ध्यान दिया। इन कदमों का परिणाम यह रहा कि वैश्विक संकट के बावजूद भारत में ऊर्जा आपूर्ति काफी हद तक स्थिर बनी रही, हालाँकि वैश्विक कीमतों में वृद्धि का असर पड़ा। यह दिखाता है कि भारत की विदेश नीति केवल कूटनीतिक बयान तक सीमित नहीं है, बल्कि सीधे तौर पर राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और जनता के हितों से जुड़ी हुई है।

वैश्विक संतुलन और सहयोग को नई दिशा देने की सोच के साथ मोदी सरकार की विदेश नीति ने बहुपक्षीय साझेदारी को प्रमुख प्राथमिकता बनाया है। ब्रिक्स के माध्यम से भारत ने स्पष्ट किया कि वैश्विक समस्याओं का समाधान केवल सामूहिक प्रयासों से ही संभव है। विकासशील देशों की आवाज को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सशक्त बनाने के लिए भारत निरंतर सक्रिय रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कई बार कहा है कि विश्व व्यवस्था को अधिक संतुलित और न्यायपूर्ण बनाना समय की मांग है। यही नीति भारत को वैश्विक दक्षिण के देशों के लिए एक भरोसेमंद नेतृत्वकारी शक्ति बनाती है, और ब्रिक्स में उसकी सक्रिय भूमिका इसी व्यापक दृष्टि का परिणाम है।

संकटों से घिरे मध्य पूर्व के परिदृश्य में भारत की सक्रिय कूटनीति ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि देश अब वैश्विक राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाने की क्षमता और आत्मविश्वास दोनों रखता है। ब्रिक्स के भीतर एकजुटता स्थापित करने की पहल ने न केवल संगठन की प्रासंगिकता को सुदृढ़ किया, बल्कि भारत की विदेश नीति की परिपक्वता और संतुलित दृष्टि को भी उजागर किया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में उठाए गए इन प्रभावी कदमों ने भारत को एक जिम्मेदार, विवेकपूर्ण और दूरदर्शी शक्ति के रूप में स्थापित किया है। आने वाले समय में यही कूटनीतिक दृष्टिकोण वैश्विक शांति, सहयोग और विकास के लिए एक मजबूत आधार सिद्ध हो सकता है और भारत की बढ़ती अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को और अधिक सुदृढ़ करेगा।