जंजीरें तोड़ता भारत: बाल विवाह के खिलाफ निर्णायक जंग

India Breaking the Chains: The Decisive Battle Against Child Marriage

बृज खंडेलवाल

हैदराबाद की ऊँची इमारतों के बीच 28 साल की अनीता लैपटॉप पर झुकी है। वह सॉफ्टवेयर इंजीनियर है। रात देर तक काम करती है। प्रमोशन चाहिए। बेहतर पैकेज चाहिए। अपने पैरों पर पूरी तरह खड़े होने का ख्वाब है। शादी? “अभी नहीं,” वह सुकून से कहती है। पहले करियर। फिर मुक़ाम।

राजस्थान के एक छोटे से गाँव में 15 साल की रानी की दुनिया अलग है। उसकी हथेलियों की मेहंदी सूखी भी नहीं कि वह ससुराल की ज़िम्मेदारियों में घिर गई। किताबें छूट गईं। खेल छूट गया। बचपन खामोशी से रुख़्सत हो गया।
दो लड़कियाँ। एक देश। फर्क सिर्फ हालात का।

शहरों में शादी अब एक पसंद है। गांवों में अब भी अक्सर मजबूरी। कहीं “सेटल” होने का इंतज़ार है। कहीं “बोझ” समझकर जल्दी विदाई। यही हमारा तल्ख़ सच है।

इसी मसले पर हाल में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के कम्युनिटी हेल्थ सेंटर में एक जागरूकता कार्यक्रम हुआ, “बाल विवाह मुक्त भारत: हमारी ज़िम्मेदारी।” डॉक्टरों, समाजसेवियों और शिक्षकों ने खुलकर बात की। साफ कहा; बाल विवाह कोई रस्म नहीं, यह बच्चों के हक़ पर वार है।

कानून साफ हैं। Prohibition of Child Marriage Act के अनुसार लड़की की शादी की न्यूनतम उम्र 18 साल और लड़के की 21 साल है। Protection of Children from Sexual Offences Act नाबालिगों के साथ किसी भी तरह के शोषण को सख्त जुर्म मानता है। Juvenile Justice Act बच्चों की हिफाज़त और पुनर्वास की बात करता है।

और एक अहम नंबर; 1098, जो एक चाइल्ड हेल्पलाइन है। 24 घंटे काम करती है। कोई भी शख्स गुमनाम रहकर शिकायत कर सकता है। पैग़ाम साफ था; खामोशी ज़ुल्म को बढ़ाती है। आवाज़ उठाइए।

मगर कानून के बावजूद हक़ीक़त आसान नहीं।

डॉक्टरों ने बताया कि कम उम्र में गर्भधारण मां और बच्चे दोनों के लिए खतरनाक है। कमसिन लड़कियों में मौत का खतरा ज्यादा होता है। समय से पहले प्रसव, कम वजन के बच्चे, खून की कमी; ये आम समस्याएँ हैं। UNICEF के अनुसार भारत में हर साल लाखों लड़कियाँ 18 साल से पहले शादी कर दी जाती हैं।

National Family Health Survey-5 के आंकड़े बताते हैं कि 20 से 24 साल की उम्र की करीब 23 प्रतिशत महिलाओं की शादी 18 से पहले हो चुकी थी। पहले यह आंकड़ा और भी ज्यादा था। गिरावट आई है। मगर अभी सफर लंबा है।

बाल विवाह सिर्फ सेहत का मसला नहीं। यह तालीम का भी सवाल है। शादी होते ही पढ़ाई रुक जाती है। लड़की आर्थिक तौर पर कमजोर रह जाती है। गरीबी का दायरा और फैल जाता है।

गांवों में यह समस्या ज्यादा है। वजहें भी साफ हैं; गरीबी, असुरक्षा का डर, दहेज की चिंता, समाज का दबाव। कई मां-बाप सोचते हैं कि जल्दी शादी कर देने से जिम्मेदारी खत्म। मगर असल में मुश्किलें शुरू होती हैं।

एक साल अतिरिक्त पढ़ाई से बाल विवाह का खतरा काफी कम हो जाता है। तालीम सबसे मजबूत हथियार है। जन्म पंजीकरण भी जरूरी है, ताकि उम्र की सही जानकारी रहे और धोखा न हो।

सरकार ने भी पहल की है। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की “बाल विवाह मुक्त भारत” मुहिम 2030 तक इस बुराई को खत्म करने का संकल्प ले चुकी है। गांवों में शपथ कार्यक्रम हो रहे हैं। स्कूलों में जागरूकता अभियान चल रहे हैं। डिजिटल पोर्टल के जरिए शिकायत दर्ज की जा सकती है।

UNFPA और UNICEF जैसी संस्थाएँ किशोरियों को तालीम, सेहत और जीवन कौशल से जोड़ रही हैं। कुछ राज्यों में अच्छे नतीजे भी आए हैं। पश्चिम बंगाल की कन्याश्री योजना ने हजारों लड़कियों की शादी टालने में मदद की। राजस्थान के कुछ गांवों ने खुद को “बाल विवाह मुक्त” घोषित किया है।

फिर भी चुनौतियाँ कायम हैं। कई मामलों में शिकायत ही दर्ज नहीं होती। समाज का दबाव गवाहों को खामोश कर देता है। गरीबी अब भी बड़ी वजह है।

असल लड़ाई सोच की है। जब तक बेटी को बराबरी का हक़ नहीं मिलेगा, यह सिलसिला पूरी तरह खत्म नहीं होगा। पंचायत, स्कूल, पुलिस, समाज, सबको मिलकर काम करना होगा। मीडिया को भी जिम्मेदारी निभानी होगी।

अनीता और रानी के बीच की दूरी सिर्फ शहर और गांव की नहीं। यह अवसर और मजबूरी की दूरी है। ख्वाब और हक़ीक़त की दूरी है।

भारत बदल रहा है। बेटियाँ आगे बढ़ रही हैं। मगर यह बदलाव हर कोने तक पहुँचना चाहिए।

बाल विवाह तक़दीर नहीं। यह एक गलत फैसला है। और हर गलत फैसला बदला जा सकता है।

जरूरत है हिम्मत की। जागरूकता की। और इंसाफ़ की।

जिस दिन हर रानी को अपने सपनों का वक्त मिलेगा, उसी दिन सच में आज़ाद भारत की तस्वीर मुकम्मल होगी।