भारत: एआई में आम आदमी को मिलेगी कितनी जगह?

India: How much space will the common man get in AI?

प्रो. महेश चंद गुप्ता

हाल में नई दिल्ली में एआई इम्पैक्ट समिट 2026 का समापन हुआ है। यह केवल एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का अंत नहीं है बल्कि यह भारत के लिए एक नई तकनीकी यात्रा की शुरुआत का संकेत है। आज जब पूरी दुनिया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को भविष्य की धुरी मानकर आगे बढ़ रही है, भारत ने यह संदेश दे दिया है कि वह इस दौड़ में पीछे नहीं रहेगा। यह संदेश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि एआई तकनीक अब किसी एक देश, एक कंपनी या कुछ अमीर समाजों तक सीमित तकनीक नहीं रह गई है। एआई वह औजार बन चुका है जो शासन, अर्थ व्यवस्था, समाज और व्यक्ति सबके जीवन को गहराई से प्रभावित करने वाला है। भारत एआई में आगे बढऩा चाहता है पर सवाल यह है कि क्या देश एआई को केवल उपभोक्ता की तरह या फिर निर्माता और दिशा निर्देशक के रूप में अपनाएगा?

समिट के उद्घाटन अवसर पर पीएम नरेंद्र मोदी ने जिस दृष्टि को सामने रखा है, वह दरअसल आत्म निर्भर और समावेशी सोच का विस्तार है। मोदी ने कहा है कि एआई केवल अमीर देशों की तकनीक नहीं होनी चाहिए बल्कि ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ का माध्यम बनना चाहिए। मोदी का यह कथन मौजूदा वैश्विक तकनीकी विमर्श में भारत की अलग पहचान को रेखांकित करने वाला है। यह कथन सिर्फ एक राजनीतिक वक्तव्य नहीं है बल्कि उस ऐतिहासिक अनुभव का निचोड़ है जिसमें भारत ने अंतरिक्ष कार्यक्रम, डिजिटल भुगतान और आधार जैसी पहचान प्रणाली हर बड़ी तकनीक को अंतत: आम आदमी के जीवन से जोडऩे की कोशिश की है।

वास्तविकता यह है कि एआई आज हर क्षेत्र में प्रवेश कर चुका है। कृषि में फसल पूर्वानुमान से लेकर स्वास्थ्य में रोग पहचान तक, शिक्षा में व्यक्तिगत रूप से सीखने के मॉडल से लेकर यातायात प्रबंधन और आपदा पूर्व चेतावनी प्रणालियों तक हर जगह एआई की भूमिका बढ़ती जा रही है। दुनिया के विकसित और विकासशील देश इस तकनीक को अपने-अपने ढंग से साधने में जुटे हैं। ऐसे वैश्विक परिदृश्य में यदि भारत एआई टूल्स विकसित करने में पीछे रह जाता है तो उसे अनिवार्य रूप से इसके लिए दूसरों पर निर्भर होना पड़ेगा। यह निर्भरता केवल तकनीकी नहीं होगी बल्कि नीतिगत और रणनीतिक भी होगी। ऐसे में एआई इम्पैक्ट समिट भारत के लिए एक रोडमैप की तरह उभरा है। इस आयोजन ने ऐसा रोडमैप बनाया है, जिससे हमें पता चलता है कि हमें किस दिशा में और किस गति से आगे बढऩा है।

हालांकि किसी भी बड़े तकनीकी सपने की असली परीक्षा उसकी धरातल पर उतरने की क्षमता में होती है। सरकार की ओर से एआई को लेकर जो पहलें सामने आ रही हैं, उन्हें कम करके नहीं आंका जाना चाहिए। अनुसंधान, स्टार्टअप्स, कौशल विकास और नीति निर्माण सभी स्तरों पर प्रयास दिखाई देते हैं लेकिन भारतीय व्यवस्था का एक कड़वा सच यह भी है कि अक्सर योजनाओं का लाभ अंतिम छोर के व्यक्ति तक पहुंचने से पहले ही कुछ ‘लपके’ लोग बीच में समेट लेते हैं। एआई जैसी जटिल और शक्तिशाली तकनीक के साथ यह खतरा और भी बढ़ जाता है। यदि एआई का लाभ केवल बड़े शहरों, बड़ी कंपनियों और सीमित तबकों तक सिमट गया तो इसका उद्देश्य ही विफल हो जाएगा।

इसलिए अब आवश्यकता इस बात की है कि एआई विशेषज्ञ, नीति निर्माता, मंत्रालय और नौकरशाही मिलकर इस बात पर गंभीरता से विचार करें कि आम आदमी को इससे सीधे कैसे जोड़ा जाए। आम आदमी को इसका प्रत्यक्ष लाभ कैसे मिले। उदाहरण के तौर पर यदि एआई के जरिये यह पता चल सके कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली में कहां अनाज खुर्दबुर्द हो रहा है तो यह तकनीक भूख के खिलाफ एक प्रभावी हथियार बन सकती है। यदि टीकाकरण या प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं में गिरावट का संकेत एआई पहले ही दे दे तो समय रहते हस्तक्षेप संभव है। यदि मौसम और भूगर्भीय डेटा के विश्लेषण से यह अनुमान लगाया जा सके कि किस क्षेत्र में प्राकृतिक आपदा की आशंका है तो जान-माल की हानि को काफी हद तक रोका जा सकता है।

लेकिन इन सभी संभावनाओं के साथ निगरानी और जवाबदेही का प्रश्न भी जुड़ा है। हमने देखा है कि योजनाएं कागज से धरातल तक आते-आते कैसे बदल जाती हैं? हमारे देश में नई तकनीक का स्वागत पूरे उत्साह से होता है लेकिन कुछ समय बाद वही तकनीक निगरानी और जवाबदेही के अभाव में अपनी धार खोने लगती है। एआई के क्षेत्र में यह लापरवाही भारी पड़ सकती है। हमें न केवल यह देखना होगा कि हम क्या कर रहे हैं बल्कि यह भी निगरानी रखनी होगी कि दुनिया क्या कर रही है और हम उससे क्या सीख सकते हैं। वैश्विक प्रतिस्पर्धा के इस दौर में आत्म मुग्धता के लिए कोई जगह नहीं है। इसके साथ ही एआई के दुरुपयोग की आशंकाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। डीपफेक, डिजिटल जालसाजी, निजता का उल्लंघन और गलत सूचना आदि एआई के स्याह पहलू हैं। सरकार ने इन पर लगाम लगाने के लिए कुछ कदम उठाने की घोषणा की है, जो स्वागत योग्य है लेकिन यह काम आधे-अधूरे प्रयासों से नहीं चलेगा। इसके लिए मजबूत कानूनी ढांचा, तकनीकी समाधान और जन-जागरूकता की जरूरत होगी।

एआई इम्पैक्ट समिट को लेकर विपक्षी दलों ने आपत्तियां जताई हैं। लोकतंत्र में असहमति स्वाभाविक है पर यदि हर नई तकनीक और हर दीर्घकालिक सोच का विरोध केवल विरोध के लिए किया जाए तो देश का हित पीछे छूट जाता है। आजादी के बाद यदि बाँध, अंतरिक्ष कार्यक्रम, कम्प्यूटर क्रांति और डिजिटल ढांचा जैसे हर बड़े विकास कार्यों का विरोध किया जाता तो क्या देश की तस्वीर आज जैसी होती? मोदी का 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का सपना तभी साकार हो सकता है, जब इस दिशा में उठाए गए कदमों में व्यापक सहमति और सामूहिक भागीदारी हो। विपक्षी दलों को इस पर सोचना चाहिए।

एआई को लेकर सबसे बड़ा भरोसा यही है कि यह भविष्य की प्रगति का एक सशक्त माध्यम बनेगा। यह प्रशासन को अधिक पारदर्शी बना सकता है, सेवाओं को तेज और सटीक कर सकता है और संसाधनों के बेहतर उपयोग में मदद कर सकता है लेकिन यह भरोसा तभी टिकेगा जब आम नागरिक को यह महसूस हो कि एआई उसके जीवन को रोजमर्रा अनुभवों में वास्तव में बेहतर बना रहा है। एआई इम्पैक्ट समिटन केवल भारत को मौका दे रहा है बल्कि आईना भी दिखाता है। अब यह हम पर है कि हम इसे क्या बनाते हैं? हमारे लिए अवसर है कि हम सही नीतियों, सही निवेश और सही इरादों के साथ दुनिया को नेतृत्व दे सकते हैं। इसके साथ चेतावनी यह है कि यदि हमने आम आदमी को केंद्र में नहीं रखा और यदि निगरानी और नैतिकता को नजरअंदाज किया तो यही तकनीक असमानताओं को और गहरा कर सकती है। भारत की ताकत हमेशा उसकी मानवीय दृष्टि रही है। यदि एआई को उसी दृष्टि से साधा गया तो यह सचमुच विकसित भारत की नींव बन सकती है।

(लेखक प्रसिद्ध शिक्षा विद्, लेखक और वक्ता हैं। वह 44 सालों तक दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ाते रहे हैं।)