प्रो. महेश चंद गुप्ता
दुनिया अब अलग-अलग बिखरे देशों का नक्शा मात्र नहीं रही है। यह एक ऐसा तंत्र बन गई है, जिसमें कहीं भी हलचल होती है तो उसकी तरंगें दुनिया के हर कोने तक पहुंचती हैं। हाल में ईरान, अमेरिका और इजराइल के बीच टकराव की स्थिति के बाद पैदा हुए तनाव ने इस सच्चाई को फिर से उजागर कर दिया है। इससे पहले रूस-यूक्रेन युद्ध से भी यह सबक मिल चुका है कि जंग किसी एक भूभाग तक सीमित नहीं रहती। उसके असर सीमाओं से परे जाते हैं। इस बात को हम लागू होते देख रहे हैं।
भारत इस अमेरिका-इजरायल-ईरान संघर्ष का हिस्सा नहीं है, लेकिन उसका असर हमारे यहां साफ दिखाई दे रहा है। पेट्रोल और एलपीजी की आपूर्ति में अस्थिरता, छोटे उद्योगों का ठप पड़ना, निर्यात पर असर—ये सब संकेत दे रहे हैं कि वैश्विक अस्थिरता का बोझ हम भी ढो रहे हैं। दुनिया इतनी छोटी हो चुकी है कि कई लोग इसकी तुलना एक गांव से भी करते हैं। मानना ही होगा कि यह एक ऐसा साझा घर बन चुकी है, जिसकी एक दीवार पर आग लगे तो दूसरी दीवार पर बैठे लोग भी उसकी आंच महसूस करते हैं। यही वजह है कि ईरान, अमेरिका और इजराइल के बीच बढ़ता तनाव सिर्फ युद्ध क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा। उसकी छाया हमारे रसोईघर, बाजार और छोटे-छोटे काम-धंधों तक आ पहुंची है।
भारत की नीति स्पष्ट रूप से शांति की है, लेकिन वैश्विक व्यवस्था में उसकी भागीदारी इतनी गहरी है कि किसी भी तनाव के असर से बचना संभव नहीं है। शहरों में ठेले पर चाय बेचने वाला हो या मिठाई की दुकान चलाने वाला हलवाई, हर किसी के काम पर इसका असर साफ दिखाई दे रहा है। गैस सिलेंडर की बुकिंग में देरी अब सिर्फ एक असुविधा नहीं, बल्कि रोजमर्रा की कमाई पर चोट बनती जा रही है। इसका बड़ा कारण मूलभूत जरूरतों के लिए हमारा अन्य देशों पर निर्भर होना है। बड़ा सवाल यह है कि क्या हम अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए इतने अधिक बाहरी स्रोतों पर निर्भर हो चुके हैं कि कहीं भी हलचल हो और हमारी जमीन हिलने लगे?
यह सच है कि हमारी जरूरतों का बड़ा हिस्सा आज भी आयात किए गए तेल और गैस से पूरा होता है। खाड़ी क्षेत्र में तनातनी बढ़ते ही सप्लाई चेन पर दबाव पड़ता है और उसका सीधा असर हमारे घरों तक पहुंचता है। यह निर्भरता केवल आर्थिक नहीं है, बल्कि रणनीतिक कमजोरी भी है। लेकिन बात केवल ऊर्जा तक सीमित नहीं है। भारत का औद्योगिक और कृषि ढांचा भी कई मायनों में वैश्विक आपूर्ति पर टिका हुआ है। खाद्य तेल से लेकर उर्वरकों तक, इलेक्ट्रॉनिक्स से लेकर रक्षा उपकरणों तक कई ऐसे क्षेत्र हैं जिनमें हम पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं हैं। यह स्थिति तब और चिंताजनक हो जाती है जब वैश्विक संकट लंबा खिंचने लगता है।
तीन दशक पहले सद्दाम हुसैन को काबू करने के लिए मित्र देशों द्वारा इराक पर हमलों से डीजल-पेट्रोल के लिए हमारे देश में लगी लंबी कतारें हमें याद हैं। अब हम कमोबेश वैसी ही स्थिति की आशंका देख रहे हैं। बात केवल आयात की नहीं है, निर्यात भी इस संकट से प्रभावित हो रहा है। बीकानेर का भुजिया, महाराष्ट्र के केले, कपड़ा उद्योग और समुद्री उत्पाद आदि सबका अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचना अब पहले जैसा सहज नहीं रहा। जलगांव से रोजाना दो से तीन हजार टन केला खाड़ी देशों व यूरोप को निर्यात होता है, लेकिन इस युद्ध ने निर्यात को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। केले से भरे सैकड़ों कंटेनर बंदरगाहों पर फंसे हुए हैं। इसी प्रकार बीकानेर से भुजिया का निर्यात भी प्रभावित हुआ है। समुद्री रास्तों में असुरक्षा और लागत बढ़ने से कई व्यापारियों को नुकसान उठाना पड़ रहा है। यह केवल माल की आवाजाही का संकट नहीं है, बल्कि इन उद्योगों से जुड़े लाखों लोगों की रोजी-रोटी का भी सवाल है।
भारत की आत्मनिर्भरता की बहस में सूचना एवं प्रौद्योगिकी का क्षेत्र अक्सर नजरअंदाज हो जाता है, जबकि यह आज की अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा दोनों के लिए बेहद अहम है। भारत डिजिटल रूप से तेजी से आगे बढ़ा है, लेकिन इस डिजिटल ढांचे की बुनियाद अब भी काफी हद तक विदेशी तकनीक पर टिकी है। मोबाइल ऑपरेटिंग सिस्टम, क्लाउड सेवाएं, सर्वर इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र बाहरी कंपनियों के नियंत्रण में हैं। ऐसे में वैश्विक तनाव या प्रतिबंधों की स्थिति में यह निर्भरता गंभीर जोखिम बन सकती है। इंटरनेट के क्षेत्र में भी हालात अलग नहीं हैं। सोशल मीडिया, सर्च इंजन और डेटा स्टोरेज जैसे प्लेटफॉर्म विदेशी स्वामित्व में हैं, जिससे डेटा सुरक्षा और डिजिटल संप्रभुता पर सवाल उठते हैं। यह केवल आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक चुनौती भी है।
इसके साथ ही, भारत में मौलिक आविष्कारों की कमी भी चिंता का विषय है। आईटी सेवाओं में मजबूती के बावजूद, शोध और पेटेंट के मामले में भारत अभी पीछे है। रिसर्च और डवलपमेंट पर कम निवेश इसकी वजह हैं। ऐसे में आत्मनिर्भरता के लिए तकनीकी नवाचार को प्राथमिकता देना अनिवार्य हो गया है। यह परिदृश्य हमें बाध्य कर रहा है कि हम आत्मनिर्भरता के उस विचार की ओर लौटें, जिसे हम अक्सर नारे के रूप में इस्तेमाल करते आए हैं, लेकिन उसे व्यवहार में पूरी तरह उतार नहीं पाए हैं। आत्मनिर्भरता का अर्थ दुनिया से कट जाना नहीं है, बल्कि इतना सक्षम बनना है कि वैश्विक उथल-पुथल का असर सीमित किया जा सके। मौजूदा समय में सवाल यह नहीं है कि भारत को वैश्विक व्यापार से दूरी बनानी चाहिए या नहीं, बल्कि यह है कि क्या हमारी अपनी नींव इतनी मजबूत है कि बाहरी झटकों को सह सके?
समय की मांग है कि हमें ऊर्जा के क्षेत्र में वैकल्पिक रास्तों की ओर तेजी से बढ़ना चाहिए। सौर और पवन ऊर्जा अब केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं रहे हैं, बल्कि आर्थिक स्थिरता का आधार भी बन चुके हैं। इसी प्रकार मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को मजबूत करना, छोटे उद्योगों को तकनीक और वित्तीय सहायता देना और कृषि उत्पादों की प्रोसेसिंग को बढ़ावा देना जरूरी है, क्योंकि ऐसे कदम ही भारत को भीतर से सशक्त बना सकते हैं।
इस बीच, कुछ ऐसे सवाल भी हैं जिनका उत्तर हमें खोजना चाहिए। बड़ा सवाल है कि क्या हमने सस्ते आयात के लालच में अपनी उत्पादन क्षमता को कमजोर कर दिया है? क्या हमारी नीतियां दीर्घकालिक सोच के बजाय तात्कालिक लाभ पर अधिक केंद्रित रही हैं? और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या हम हर संकट के बाद कुछ समय के लिए जागते हैं और फिर वही पुरानी लापरवाही ओढ़ लेते हैं? दुनिया में अस्थिरता निरंतर बढ़ रही है। कभी इस देश में तो कभी उस देश में कुछ न कुछ संकट खड़ा हो ही जाता है।
मानना पड़ेगा कि दुनिया में अस्थिरता अब अपवाद नहीं रही है बल्कि एक स्थाई स्थिति बनती जा रही है। एक युद्ध खत्म होता नहीं है तो दूसरा शुरू हो जाता है। ऐसे में यह उम्मीद करना कि सब कुछ सामान्य रहेगा, शायद खुद को धोखा देने जैसा ही होगा। हमारे सामने चुनौती यह नहीं है कि वह इन युद्धों को रोक सके बल्कि बड़ी चुनौती यह है कि हम इनके प्रभाव को अपने यहां किस हद तक सीमित कर पाते हैं। जब दुनिया जलती है तो उसकी आंच से बचना संभव नहीं है लेकिन हम अपने घर को आग से बचाने के प्रयत्न तो कर ही सकते हैं। आत्म निर्भरता उसी बचाव का नाम है। आत्म निर्भरता ही एक ऐसा कवच है, जो हमें संकट से बचा सकता है। हमारा देश आत्मनिर्भर बने, इसके लिए कदम उठाने ही होंगे। इसके लिए सरकार, हमारे नीति नियंताओं, नागरिकों, संस्थाओं को मिलकर काम करना होगा। यह परिहार्य है, इस बात को समझा जाना चाहिए।
(लेखक प्रख्यात विचारक, चिंतक और वक्ता हैं। वह 44 सालों तक दिल्ली यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर रहे हैं।)





