अनुशासन, त्याग और पराक्रम का उत्सव-भारतीय थल सेना दिवस

Indian Army Day – A Celebration of Discipline, Sacrifice and Valour

सुनील कुमार महला

हर वर्ष 15 जनवरी को भारतीय थल सेना दिवस (इंडियन आर्मी डे) मनाया जाता है। वास्तव में, यह दिन भारतीय सेना के गौरव, शौर्य, अनुशासन और उन वीर जवानों के सर्वोच्च बलिदान को समर्पित है, जो देश की सीमाओं पर खड़े होकर राष्ट्र की रक्षा करते हैं। यह केवल एक उत्सव मात्र नहीं है, बल्कि यह भारतीय सैन्य इतिहास के एक निर्णायक क्षण की स्मृति भी है।दरअसल, 15 जनवरी 1949 को लेफ्टिनेंट जनरल के.एम.करिअप्पा ने भारत के पहले भारतीय सेनाध्यक्ष (प्रथम भारतीय कमांडर-इन-चीफ) के रूप में कार्यभार संभाला था। उस समय ब्रिटिश जनरल फ्रांसिस बुचर ने उन्हें औपचारिक रूप से यह पद सौंपा था। यह क्षण भारत की सैन्य संप्रभुता, आत्मनिर्भरता और औपनिवेशिक विरासत से मुक्ति का प्रतीक माना जाता है। बाद में, वर्ष 1986 में के. एम. करिअप्पा को उनके अतुलनीय योगदान के लिए फील्ड मार्शल की मानद उपाधि प्रदान की गई।स्वतंत्रता के बाद प्रारंभ में सेना दिवस 1 अप्रैल को मनाने का विचार किया गया था, किंतु ऐतिहासिक महत्व को ध्यान में रखते हुए 15 जनवरी की तिथि को स्थायी रूप से निर्धारित किया गया। शुरुआती वर्षों में सेना दिवस के कार्यक्रम सीमित रूप से विभिन्न सैन्य छावनियों में आयोजित होते थे, जबकि भव्य सार्वजनिक परेड और औपचारिक समारोहों की परंपरा बाद के वर्षों में विकसित हुई।आज सेना दिवस के अवसर पर दिल्ली या चयनित शहरों के परेड ग्राउंड में शानदार सैन्य परेड आयोजित की जाती है तथा इसमें सेना अपने आधुनिक हथियारों, टैंकों, मिसाइलों, राडार प्रणालियों और युद्ध कौशल का प्रदर्शन करती है। इसके साथ ही वीरता पुरस्कार, जैसे सेना मेडल, भी प्रदान किए जाते हैं। यह दिन नई सैन्य तकनीकों, युद्ध अभ्यासों और रेजिमेंटल परंपराओं की औपचारिक शुरुआत का भी साक्षी बनता है।

पाठकों को बताता चलूं कि भारतीय थल सेना विश्व की सबसे बड़ी स्वैच्छिक (वॉलंटरी) सेना मानी जाती है, जहाँ सैनिकों की भर्ती पूरी तरह स्वेच्छा से होती है और किसी भी प्रकार की जबरन भर्ती की व्यवस्था नहीं है। सैनिकों की संख्या के लिहाज़ से यह दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी सक्रिय थल सेना है, जिसमें लगभग 14.5 लाख (1.45 मिलियन) से अधिक सक्रिय सैनिक कार्यरत हैं। इसके अतिरिक्त 11-12 लाख रिज़र्व सैनिक तथा लगभग 25 लाख अर्धसैनिक बल भी भारत की सुरक्षा व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा हैं। नवम्बर 2025 में ऑस्ट्रेलिया के प्रतिष्ठित लोवी इंस्टीट्यूट ने ‘एशिया पॉवर इंडेक्स’ जारी किया जिसमें भारत को अमेरिका और चीन के बाद विश्व की तीसरी सबसे बड़ी सैन्य शक्ति घोषित किया है।भारतीय सेना का मुख्य दायित्व देश की स्थल सीमाओं की रक्षा, आंतरिक सुरक्षा बनाए रखना, आतंकवाद व उग्रवाद से मुकाबला करना तथा आपदा के समय नागरिकों की सहायता करना है। यह सेना दुनिया के सबसे कठिन और ऊँचे युद्धक्षेत्र सियाचिन ग्लेशियर की रक्षा करती है, जो समुद्र तल से लगभग 5000 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है, जहाँ अत्यंत विषम जलवायु परिस्थितियों में भी सैनिक निरंतर तैनात रहते हैं। इसके अतिरिक्त रेगिस्तान, घने जंगलों और ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों में भी भारतीय सेना प्रभावी रूप से कार्य करती है।

वैश्विक स्तर पर भारतीय थल सेना अपनी रणनीतिक क्षमता, अनुशासन और युद्ध अनुभव के लिए जानी जाती है। संयुक्त राष्ट्र शांति मिशनों में भारत का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है और भारत उन देशों में शामिल है, जिन्होंने सबसे अधिक सैनिक ‘यूएन पीसकीपिंग ऑपरेशंस’ में भेजे हैं। ग्लोबल फायरपावर इंडेक्स के अनुसार भारत दुनिया की चौथी सबसे शक्तिशाली सैन्य शक्ति है, जिसमें केवल अमेरिका, रूस और चीन भारत से आगे हैं। गौरतलब है कि भारतीय सेना की सर्वोच्च कमान देश के राष्ट्रपति के पास होती है, जो संविधान के अनुसार इसके सर्वोच्च कमांडर होते हैं। सेना की इंजीनियरिंग दक्षता का उत्कृष्ट उदाहरण लद्दाख के द्रास और सुरु नदियों के बीच निर्मित बेली ब्रिज है, जिसे अगस्त 1982 में सेना ने बनाया था और जिसे विश्व के सबसे ऊँचे पुलों में गिना जाता है।

भारतीय थल सेना का आदर्श वाक्य ‘सेवा परमो धर्मः’ है, जिसका अर्थ है-‘सेवा ही सर्वोच्च धर्म है।’ यही वाक्य सेना के कर्तव्यबोध, निस्वार्थ सेवा, अनुशासन और राष्ट्र के प्रति पूर्ण समर्पण का मूल आधार है। ‘सर्विस बिफोर सेल्फ’ सेना की कार्यसंस्कृति का अभिन्न हिस्सा है, जिसे हर सैनिक प्रशिक्षण और व्यवहार में आत्मसात करता है। हाल के वर्षों में सेना दिवस समारोहों में महिलाओं की भागीदारी और नेतृत्व को भी विशेष रूप से रेखांकित किया जाने लगा है। गौरतलब है इस वर्ष यानी कि वर्ष 2026 में भारत अपना 78वाँ सेना दिवस मना रहा है, जिसकी मुख्य परेड जयपुर (राजस्थान) में आयोजित की जा रही है। अब परंपरा यह बन चुकी है कि परेड दिल्ली से बाहर विभिन्न शहरों में आयोजित की जाए, ताकि सेना और जनता के बीच जुड़ाव और अधिक सशक्त हो। उल्लेखनीय है कि हर वर्ष सेना दिवस की एक विशेष थीम भी निर्धारित की जाती है। वर्ष 2025 की थीम थी-‘समर्थ भारत, सक्षम सेना’, और उसी वर्ष भारत सरकार ने ‘रक्षा सुधारों का वर्ष’ घोषित किया था, जिसका उद्देश्य थिएटर कमांडों का एकीकरण, तीनों सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल तथा स्वदेशी रक्षा क्षमताओं को बढ़ावा देना था। वर्ष 2026 के लिए सेना का मुख्य फोकस ‘नेटवर्किंग और डेटा-केंद्रितता का वर्ष’ रखा गया है, जो आधुनिक तकनीक और डिजिटल एकीकरण पर आधारित है। इस बार परेड में सेना की पशु टुकड़ी (एनिमल कंटीजेंट)-जैसे जांस्कर घोड़े(लद्दाख के जांस्कर क्षेत्र में पाए जाने वाले एक विशेष स्थानीय पर्वतीय घोड़े की नस्ल), ऊँट और खोजी कुत्ते-को भी विशेष महत्व दिया जा रहा है।

निष्कर्षतः, हम यहां पर यह बात कह सकते हैं कि भारतीय थल सेना शौर्य, समर्पण और राष्ट्रभक्ति का जीवंत प्रतीक है। सेना दिवस केवल एक तिथि नहीं, बल्कि भारतीय शौर्य की उस अखंड परंपरा का उत्सव है, जो ‘सेवा परमो धर्मः’ के संकल्प पर टिकी है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि हमारी सुरक्षित और शांतिपूर्ण नींद उन जवानों के बलिदानों की ऋणी है, जो सरहद की चौखट पर हर पल प्रहरी बनकर खड़े रहते हैं। चाहे सियाचिन की हाड़ कंपा देने वाली ठंड हो या थार के रेगिस्तान की झुलसाती गर्मी-भारतीय सेना का हर जवान देश की अखंडता के लिए अभेद्य दीवार बनकर खड़ा रहता है। वास्तव में, भारतीय थल सेना भारत के आत्मविश्वास का वह स्तंभ है, जिसके साये में पूरा देश सुरक्षित, सशक्त और प्रगतिशील महसूस करता है। भारतीय सेना को नमन।