भारत का अरबपति युग: समृद्धि की चकाचौंध या असमानता की आहट?

India's Billionaire Era: Glare of Prosperity or Sound of Inequality?

प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

भारत की आर्थिक चमक के पीछे एक तीखा विरोधाभास है। एक ओर प्राइवेट जेट और लग्जरी यॉट्स की दुनिया, तो दूसरी ओर करोड़ों लोग दो वक्त की रोटी के लिए संघर्षरत हैं। यह दर्शाता है कि देश में धन तेजी से कुछ हाथों में सिमट रहा है, जबकि आम आदमी की मुश्किलें बढ़ रही हैं। मार्च 2026 तक फोर्ब्स सूची में भारत के 229 अरबपति हैं (पिछले वर्ष 205), जिनकी कुल संपत्ति 1 ट्रिलियन डॉलर से अधिक है। हुरुन ग्लोबल रिच लिस्ट इसे 308 बताती है। 99.7 बिलियन डॉलर के साथ मुकेश अंबानी शीर्ष पर हैं, जबकि गौतम अडानी सहित कई उद्योगपति अरबों की संपत्ति के शिखर पर हैं। पर इस समृद्धि का लाभ निचले तबकों तक नहीं पहुंच रहा और बढ़ती असमानता सामाजिक संतुलन को कमजोर कर रही है।

अरबपतियों की बढ़ती संख्या संयोग नहीं है। शेयर बाजार की तेजी, आईपीओ की लहर और फिनटेक, एआई व एडटेक जैसे नए क्षेत्रों ने कई नए अरबपति पैदा किए हैं। फोर्ब्स 2026 के अनुसार इस वर्ष 30 नए अरबपति जुड़े, जिनमें कई 30–35 वर्ष के युवा हैं। रेजरपे और फिजिक्सवाला जैसे स्टार्टअप्स के संस्थापकों ने कुछ ही वर्षों में अरबों की संपत्ति बनाई, जबकि रिलायंस इंडस्ट्रीज और अडानी ग्रुप जैसी कंपनियों ने भी धन कई गुना बढ़ाया है। लेकिन यह समृद्धि समावेशी नहीं है। विश्व असमानता रिपोर्ट 2026 के अनुसार भारत में शीर्ष 1% के पास 40% संपत्ति है, जबकि नीचे के 50% के पास मात्र 6.4%। शीर्ष 10% के पास 65% संपत्ति और 58% आय है, जबकि आधी आबादी को केवल 15% आय मिलती है। साफ है कि विकास का लाभ कुछ ही हाथों में सिमटा है।

बढ़ती आर्थिक असमानता का सबसे बड़ा असर आम आदमी की जिंदगी पर पड़ रहा है। एक ओर अरबपति प्राइवेट हेलीकॉप्टर से उड़ते हैं, तो दूसरी ओर करोड़ों परिवार महंगाई के बोझ तले दबे हैं। खाद्य कीमतें बढ़ती हैं, पर मजदूरी लगभग स्थिर है। शिक्षा और स्वास्थ्य की असमान पहुंच गरीबों को और पीछे धकेलती है। सामाजिक गतिशीलता ठहर गई है और गरीबी पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रहती है। ऑक्सफैम की हालिया रिपोर्टों के अनुसार अरबपतियों की संपत्ति तेजी से बढ़ी है, जबकि गरीबी घटाने के प्रयास कमजोर हैं। भारत में करोड़ों लोग न्यूनतम आय पर निर्भर हैं। यह बढ़ती खाई सामाजिक तनाव, बेरोजगारी और जाति-लैंगिक असमानता को और गहरा कर रही है।

धन-विभाजन की मानसिकता भारतीय समाज में गहराई से जमी रही है। कभी अमीरों को ‘महाजन’ या ‘सेठ’ कहकर सम्मान दिया जाता था, लेकिन अब सोशल मीडिया और सार्वजनिक बहस के दौर में सवाल उठ रहे हैं—जब लाखों लोग भूखे हैं, तो कुछ के पास अपार धन क्यों? अमर्त्य सेन जैसे विचारकों के अनुसार असमानता विकास की बड़ी बाधा है, जो सामाजिक न्याय और एकता को कमजोर करती है। धन का केंद्रीकरण जाति, लिंग और क्षेत्रीय असमानताओं को और गहरा करता है, जिसका सबसे ज्यादा असर दलितों, आदिवासियों और महिलाओं पर पड़ता है। अमीरों की भव्य जीवनशैली गरीबों में असंतोष बढ़ाती है। इसलिए समाज को समझना होगा कि धन केवल निजी संपत्ति नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी भी है—अन्यथा असमानता सामाजिक विखंडन को और तेज करेगी।

आर्थिक नीतियों के भीतर छिपे कारण भी असमानता को बढ़ाते हैं। 1991 के उदारीकरण के बाद बाजार-केंद्रित विकास का लाभ मुख्यतः अमीर वर्ग को मिला, जबकि गरीब हाशिये पर रह गए। क्रोनी कैपिटलिज्म और राजनीतिक संबंधों से लाभ उठाने वाले उद्योग इस खाई को और गहरा करते हैं। कर व्यवस्था भी असंतुलित है—अमीरों पर कम प्रत्यक्ष कर, जबकि गरीब जीएसटी जैसे अप्रत्यक्ष करों का अधिक बोझ उठाते हैं। विश्व असमानता रिपोर्ट के अनुसार 2014–2025 के दौरान आय असमानता स्थिर दिखी, लेकिन धन लगातार ऊपर ही केंद्रित होता गया। जीडीपी बढ़ी, पर आम आदमी की क्रय शक्ति और रोजगार उतने नहीं बढ़े। नीतियां भी अक्सर प्रभावशाली वर्ग के पक्ष में झुकती हैं, जिससे लोकतंत्र पर धन का प्रभाव बढ़ने लगता है।

वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भारत की असमानता बेहद तीखी है। विश्व असमानता रिपोर्ट 2026 के अनुसार, भारत में शीर्ष 10% और निचले 50% के बीच आय का अंतर दुनिया में सबसे अधिक है। जहां यूरोप में यह अंतर अपेक्षाकृत संतुलित है, वहीं भारत और थाईलैंड जैसे देशों में शीर्ष 10% के पास लगभग 65% संपत्ति केंद्रित है। वैश्विक स्तर पर भी शीर्ष 1% के पास 37% संपत्ति है, जबकि आधी आबादी के हिस्से केवल 2% संपत्ति आती है। स्कैंडिनेवियाई देशों की तरह उच्च कर और मजबूत सामाजिक कल्याण नीतियों से इस असंतुलन को कम किया जा सकता है। अन्यथा समय रहते सुधार न होने पर यह खाई और गहरी होकर सामाजिक अशांति को जन्म दे सकती है।

समाधान संभव हैं, बशर्ते राजनीतिक और सामाजिक इच्छाशक्ति हो। प्रगतिशील कर व्यवस्था के तहत अमीरों पर वेल्थ टैक्स और अधिक आयकर लगाकर संसाधनों को शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे में लगाया जा सकता है। एमएसएमई और कौशल विकास को बढ़ावा देकर रोजगार सृजन और न्यूनतम आय गारंटी जैसे कदम भी सहायक हो सकते हैं। साथ ही कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी को प्रभावी बनाकर उद्योगपतियों की सामाजिक जिम्मेदारी बढ़ाई जा सकती है। ऑक्सफैम के अनुसार वेल्थ टैक्स जैसी नीतियां असमानता कम करने में कारगर हो सकती हैं।

आज जरूरत इस बात की है कि भारत की बढ़ती अरबपति चमक के पीछे छिपी असमानता को गंभीरता से समझा जाए। सच्चा और समावेशी विकास तभी संभव है, जब धन-विभाजन की सोच बदले और आर्थिक असमानता को कम करने के ठोस प्रयास हों। यदि यह खाई यूँ ही बढ़ती रही, तो समाज गहरे विभाजन की ओर बढ़ेगा। इसलिए ऐसा भारत बनाना होगा जहां संपत्ति कुछ हाथों तक सीमित न रहकर सबके उत्थान का माध्यम बने, क्योंकि गहरी असमानता वाला समाज कभी मजबूत नहीं हो सकता।