हैदराबाद में संरक्षित भारत की हजारों वर्षों पुरानी चिकित्सा धरोहर

India's thousands of years old medical heritage preserved in Hyderabad

रत्नज्योति दत्ता

नई दिल्ली : भारत की समृद्ध चिकित्सीय परंपरा की हजारों वर्षों पुरानी धरोहर—जो दुर्लभ हस्तलिखित ग्रंथों और प्राचीन अवशेषों में सुरक्षित है—राष्ट्रीय भारतीय चिकित्सा संपदा संस्थान (National Institute of Indian Medical Heritage) में संरक्षित की जा रही है।

यह संस्थान देश में स्वास्थ्य परंपराओं के विकास की एक अनूठी और व्यापक झलक प्रस्तुत करता है।

हैदराबाद स्थित इस संस्थान में 900 से अधिक चिकित्सीय-ऐतिहासिक अवशेष सुरक्षित हैं, जिनमें से कई लगभग एक हजार वर्ष पुराने हैं। इनमें ताड़पत्र, कागज, वृक्ष की छाल, वस्त्र तथा धातु की पट्टिकाओं पर लिखे हस्तलिखित ग्रंथ शामिल हैं। ये विभिन्न कालखंडों में चिकित्सा ज्ञान के संकलन और प्रसार के विविध माध्यमों को दर्शाते हैं।

आयुर्वेदिक ऐतिहासिक छापों का प्रदर्शन (SAHI) 2.0 पहल के अंतर्गत संस्थान अपने संरक्षण और डिजिटलीकरण कार्य का विस्तार कर रहा है। केंद्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद द्वारा विकसित साही पोर्टल आयुर्वेद की प्राचीनतम अवस्था से लेकर वर्तमान तक की विस्तृत यात्रा को प्रस्तुत करता है। साथ ही, यह अन्य सभ्यताओं के साथ भारत के चिकित्सीय संपर्क और आदान-प्रदान को भी रेखांकित करता है।

आयुष राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) प्रतापराव जाधव ने इस पहल के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा, “भारत की चिकित्सीय विरासत केवल गर्व का विषय नहीं, बल्कि ज्ञान की एक सतत प्रवाहमान धारा है।”

साही परियोजना के सहायक निदेशक एवं प्रमुख अन्वेषक डॉ. गोली पेंचला प्रसाद ने बताया, “हस्तलिखित ग्रंथ वे रचनाएं हैं जो कागज, छाल, वस्त्र, धातु या ताड़पत्र जैसे माध्यमों पर लिखी जाती हैं।” उन्होंने कहा कि ऐसे ग्रंथ प्रायः मंदिरों, मठों तथा पारंपरिक वैद्यों के पारिवारिक संग्रहों में प्राप्त होते हैं।

“इतिहास के दृष्टिकोण से साही का उद्देश्य भारत के चिकित्सीय अतीत का सम्यक् पुनर्निर्माण करना और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पूर्व अभिलेखों में उल्लिखित शिलालेखों का पता लगाकर उनका डिजिटलीकरण किया जा रहा है, ताकि उन्हें शोधार्थियों और आम जन के लिए सुलभ बनाया जा सके,” उन्होंने कहा।

डॉ. गोली पेंचला प्रसाद ने 23 मार्च को संस्थान के दौरे पर आए दिल्ली के मीडिया प्रतिनिधियों से बातचीत की।

उल्लेखनीय खोजों में चालुक्य वंश के राजा विक्रमादित्य प्रथम के काल का 1,660 वर्ष पुराना ताम्रपत्र अभिलेख शामिल है, जो वर्तमान आंध्र प्रदेश में प्राप्त हुआ था। यह दर्शाता है कि उस समय वैद्यों को विशेष प्रशासनिक अधिकार प्राप्त थे। ऐतिहासिक स्रोत प्रसिद्ध वैद्य जीवक का भी उल्लेख करते हैं, जो भगवान बुद्ध और राजा बिंबिसार के चिकित्सक थे, जिससे भारत में संगठित चिकित्सा परंपरा की प्राचीनता स्पष्ट होती है।

“साही 2.0 जैसी पहलें इस धरोहर को वैश्विक स्तर पर सुलभ बनाएंगी और पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक स्वास्थ्य व्यवस्था से जोड़ने में सहायक होंगी,” मंत्री ने कहा।

पृष्ठभूमि:
इस संस्थान की स्थापना की परिकल्पना वर्ष 1944 की भोर समिति की सिफारिशों से हुई थी, जिसने चिकित्सा इतिहास के लिए एक समर्पित संस्थान की आवश्यकता बताई थी। वर्ष 1956 में इसे आंध्र मेडिकल कॉलेज, विशाखापत्तनम में स्थापित किया गया और बाद में हैदराबाद स्थानांतरित कर दिया गया। समय के साथ यह भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद सहित विभिन्न संस्थाओं के अधीन रहा और वर्ष 2009 में इसे वर्तमान स्वरूप प्रदान किया गया।

आज एनआईआईएमएच में 10,000 से अधिक पुस्तकें, 285 हस्तलिखित ग्रंथ तथा एक विशेष चिकित्सीय-ऐतिहासिक संग्रहालय उपलब्ध है, जो इसे भारत की चिकित्सा धरोहर के प्रमुख केंद्रों में स्थान दिलाता है।