ललित गर्ग
स्वच्छता रैंकिंग में लगातार टॉप पर आने वाले इंदौर में दूषित पेयजल की वजह से हुई मौतें कथनी और करनी की असमानता की पौल खोलती भयावह लापरवाही का नतीजा हैं। स्थानीय लोगों का यह आरोप बेहद गंभीर है कि पानी की क्वॉलिटी को लेकर लगातार शिकायत के बाद भी कार्रवाई नहीं की गई और दुर्भाग्य से इतनी बड़ी वारदात के बाद भी अदालत को दखल देकर स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था करने का आदेश देना पड़ रहा है। यह केवल एक दुर्घटना नहीं है और न ही इसे तकनीकी खामी कहकर टाला जा सकता है। यह घटना उस व्यवस्था का क्रूर और नंगा सच है, जो स्वच्छता के तमगों से सजी हुई है लेकिन भीतर से सड़ चुकी है। जिस शहर को लगातार सात वर्षों तक देश का सबसे स्वच्छ शहर घोषित किया जाता रहा, वहीं दूषित पेयजल के कारण पंद्रह निर्दाेष लोगों की मौत हो जाना पूरे तंत्र पर एक गहरा प्रश्नचिह्न है। यह त्रासदी साबित करती है कि चमकदार रैंकिंग और पुरस्कार जीवन की वास्तविक सुरक्षा का विकल्प नहीं हो सकते। इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में पेयजल आपूर्ति करने वाली पाइपलाइन में सीवर का पानी मिल गया, जिससे हजारों लोगों का जीवन खतरे में पड़ गया। सौ से अधिक लोग अस्पताल में भर्ती हुए, सैकड़ों बीमार पड़े और अनेक परिवार हमेशा के लिए उजड़ गए। सभ्य समाज में यह कल्पना ही आत्मग्लानि से भर देने वाली है कि जिस पानी को जीवनदायिनी मानकर पिया गया, वही सीवर की गंदगी से मिला हुआ था।
सबसे अधिक पीड़ादायक तथ्य यह है कि यह सब अचानक नहीं हुआ। नागरिकों ने पहले ही दूषित पानी की शिकायतें की थीं। पानी के रंग, गंध और स्वाद में बदलाव की जानकारी दी गई थी, लेकिन नगर निगम, जलप्रदाय विभाग और स्वास्थ्य तंत्र कुंभकर्णी नींद में सोए रहे। प्रशासन तब हरकत में आया जब मौतें हो चुकी थीं। यह लापरवाही नहीं, बल्कि गहरी संस्थागत असंवेदनशीलता, क्रूरता एवं अमानवीयता है। यह उस प्रशासनिक संस्कृति का परिणाम है जिसमें फाइलें और औपचारिकताएं मानव जीवन से अधिक मूल्यवान हो गई हैं। सवाल यह नहीं है कि पानी में सीवर कैसे मिला, असली सवाल यह है कि चेतावनियों के बावजूद इसे रोका क्यों नहीं गया? हर बार की तरह इस बार भी जांच समितियां बनीं, मुआवजे की घोषणाएं हुईं और कुछ अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया। भले ही अपर नगर आयुक्त को इंदौर से हटा दिया है और प्रभारी अधीक्षण अभियंता से जिम्मेदारी वापस ले ली है। लेकिन, क्या इतना काफी है? इस तरह की ‘रूटीन’ कार्रवाई जिम्मेदारों को सबक नहीं देतीं, बल्कि पीड़ितों का मजाक बनाती हैं। क्या इन दिखावे की कार्रवाइयों से मृतकों का प्रायश्चित हो गया? क्या इससे भविष्य में ऐसी घटनाएं रुकेंगी? सच्चाई यह है कि जांच समितियां अब जवाबदेही तय करने का नहीं, बल्कि मामले को ठंडा करने का माध्यम बन चुकी हैं।
इस दुखद घटना के बाद राजनीतिक बयानबाजी ने लोगों के घावों को और गहरा किया। जिस क्षेत्र में यह त्रासदी घटी, उसके प्रतिनिधि और राज्य के नगरीय विकास मंत्री, जिनके अधीन पेयजल आपूर्ति का विभाग आता है, उनकी असंवेदनशील टिप्पणियों ने जनता के आक्रोश को बढ़ाया। बाद में खेद प्रकट किया गया, लेकिन सवाल यह है कि खेद से क्या उन परिवारों का भविष्य सुरक्षित हो जाएगा, जिन्होंने अपने प्रियजनों को खो दिया? यह सही है कि उमा भारती जैसी वरिष्ठ नेत्री ने दोषियों से प्रायश्चित और दंड की मांग की, लेकिन देश का अनुभव बताता है कि ऐसी मांगें अक्सर समय के साथ फीकी पड़ जाती हैं। मध्य प्रदेश में डबल इंजन वाली सरकार का खूब प्रचार किया जाता है, लेकिन इंदौर की घटना ने दिखा दिया कि यदि व्यवस्था की पटरियां जर्जर हों, तो इंजन कितने भी हों, दुर्घटना तय है।
नववर्ष की पूर्व संध्या पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सुधार, क्रियान्वयन और रूपांतरण की बात कही थी और जीवन को सुगम बनाने के लिए प्रणालियों को अधिक अनुकूल बनाने पर जोर दिया था। लेकिन जब नागरिकों को स्वच्छ जल, स्वच्छ हवा, स्वस्थ चिकित्सा जैसी बुनियादी सुविधाएं ही सुरक्षित रूप से उपलब्ध न हों, तो जीवनयापन को सुगम बनाने की बात खोखली लगती है। सर्वाेच्च न्यायालय बार-बार स्पष्ट कर चुका है कि स्वच्छ पर्यावरण और सुरक्षित जल का अधिकार संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत जीवन के मौलिक अधिकार का हिस्सा है। इंदौर की यह त्रासदी इस अधिकार का खुला उल्लंघन है। यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर पानी में जहरीला पदार्थ मिलाए और उससे लोगों की मौत हो जाए, तो वह गंभीर अपराध माना जाता है। फिर जब प्रशासन की लापरवाही से जहरीला पानी घर-घर पहुंचता है और लोगों की जान जाती है, तो उसे अपराध क्यों नहीं माना जाए? यह गैर-इरादतन हत्या से कम गंभीर मामला नहीं है।
इंदौर की घटना यह भी उजागर करती है कि स्वच्छता रैंकिंग, स्मार्ट सिटी के दावे और चमकदार प्रचार व्यवस्थागत नाकामी को छिपा नहीं सकते। सड़कें साफ हो सकती हैं, दीवारें रंगी जा सकती हैं, लेकिन यदि पाइपलाइनों के भीतर जहर बह रहा है, तो ऐसा विकास जनता के साथ छल है। यह समस्या केवल इंदौर तक सीमित नहीं है। देश के अनेक छोटे-बड़े शहरों में जर्जर पाइपलाइनें, अवैज्ञानिक सीवर व्यवस्था और भ्रष्ट ठेकेदारी तंत्र वर्षों से नागरिकों की जिंदगी के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। कहीं हैजा फैलता है, कहीं पीलिया, कहीं दस्त और संक्रमण, लेकिन हर बार इसे स्थानीय समस्या कहकर टाल दिया जाता है। अब सवाल यह है कि क्या इंदौर की पंद्रह मौतें भी प्रशासन को जगाने के लिए पर्याप्त नहीं हैं? क्यों नहीं ऐसी घटनाओं को आधार बनाकर प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार और लापरवाही पर सख्त कार्रवाई का बुलडोजर चलाया जाता? आज जब अवैध निर्माणों और गरीब बस्तियों पर बुलडोजर चल सकता है, तो प्रशासनिक लापरवाही और भ्रष्टाचार पर क्यों नहीं? क्यों उन अधिकारियों पर आपराधिक मुकदमे दर्ज नहीं होते, जिनकी अनदेखी से लोगों की जान चली जाती है? क्यों सेवा से बर्खास्तगी और जेल की सजा जैसे कठोर कदम नहीं उठाए जाते?
यह घटना पूरे देश के लिए चेतावनी है। सभी राज्यों और स्थानीय निकायों को पेयजल आपूर्ति व्यवस्था का गंभीरता से ऑडिट करना चाहिए। मुख्य पाइपलाइनों का नियमित निरीक्षण हो, सीवर और जल आपूर्ति लाइनों के बीच सुरक्षित दूरी सुनिश्चित की जाए और यह स्पष्ट तय हो कि किस स्तर का अधिकारी किस गड़बड़ी के लिए जिम्मेदार होगा। जवाबदेही केवल कागजों में नहीं, व्यवहार में दिखनी चाहिए। जब तक लापरवाही को अपराध नहीं माना जाएगा और दोषियों को वास्तविक दंड नहीं मिलेगा, तब तक ऐसी त्रासदियां दोहराती रहेंगी। आज भी देश में हर एक लाख आबादी पर औसतन लगभग 35 लोगों की दूषित पेयजल की वजह से जान जाती है। ग्लोबल एवरेज की तुलना में यह लगभग तीन गुना है। बेशक सरकार ने जल जीवन मिशन जैसे अभियान चलाए हैं, जिसकी बदौलत करीब 81 प्रतिशत ग्रामीण घरों में टैप वॉटर पहुंचाने का दावा है, लेकिन अब भी सुधार की बहुत जरूरत है। भारत ने 2047 तक विकसित देशों की कतार में खड़े होने का लक्ष्य रखा है, लेकिन पहले आम लोगों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करना होगा। 2050 तक भारत की आबादी 1.7 अरब तक होने का अनुमान है और तब पानी के संसाधनों पर और दबाव पड़ेगा। देश को बेहतर वॉटर मैनेजमेंट के साथ सिस्टम को सुधारने की जरूरत है, तभी इस चुनौती का सामना किया जा सकता है।
इंदौर की घटना केवल शोक व्यक्त करने का विषय नहीं है, यह व्यवस्था परिवर्तन की पुकार है। यदि इसे भी एक दुर्भाग्यपूर्ण हादसा कहकर भुला दिया गया, तो कल किसी और शहर में, किसी और गली में, कोई और परिवार इसी पीड़ा से गुजरेगा। जनता को अब नारों, पुरस्कारों और रैंकिंग से संतुष्ट नहीं होना चाहिए। उसे सवाल पूछने होंगे, जवाब मांगने होंगे और यह सुनिश्चित करना होगा कि स्वच्छ भारत केवल झाड़ू और प्रचार से नहीं, बल्कि जवाबदेही, ईमानदारी और संवेदनशील प्रशासन से बने। यदि इंदौर की पंद्रह मौतें भी व्यवस्था की नींद नहीं तोड़ सकीं, तो यह मानना पड़ेगा कि गंदगी केवल पानी की पाइपलाइन में नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की नसों में बह रही है।





