अंतरराष्ट्रीय कॉक्लियर इम्प्लांट दिवस: आधुनिक चिकित्सा से ‘सशक्तीकरण’ की ओर

International Cochlear Implant Day: From modern medicine to 'empowerment'

सुनील कुमार महला

प्रतिवर्ष 25 फरवरी को ‘अंतरराष्ट्रीय कॉक्लियर इम्प्लांट दिवस’ मनाया जाता है। इस दिवस का प्राथमिक उद्देश्य श्रवण बाधित व्यक्तियों के लिए कॉक्लियर इम्प्लांट तकनीक के लाभों के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। यह दिन चिकित्सा इतिहास की एक गौरवशाली घटना का प्रतीक है। दरअसल, 25 फरवरी, 1957 को फ्रांसीसी चिकित्सक चार्ल्स आइरीज और आंद्रे जुरनो द्वारा दुनिया का पहला सफल कॉक्लियर इम्प्लांट किया गया था।

क्या है कॉक्लियर इम्प्लांट ?

पाठकों को बताता चलूं कि कॉक्लियर इम्प्लांट एक परिष्कृत छोटा इलेक्ट्रॉनिक उपकरण है, जिसे सर्जरी के माध्यम से कान के आंतरिक हिस्से (कोक्लीया) में लगाया जाता है। यह उपकरण श्रवण तंत्रिका (आडिटरी नर्व) को सीधे उत्तेजित करता है, जिससे गंभीर रूप से सुनने में अक्षम व्यक्ति भी ध्वनियों को महसूस कर सकता है।

जागरूकता और मिथकों का निवारण:-

वास्तव में, इस दिवस को मनाने का मुख्य लक्ष्य समाज में व्याप्त उन भ्रांतियों को तोड़ना है, कि जन्मजात मूक-बधिर बच्चे कभी सुन या बोल नहीं सकते। सच तो यह है कि यह दिन स्पष्ट संदेश देता है कि बहरेपन का उपचार संभव है। साथ ही, यह सरकारों और स्वास्थ्य संस्थाओं का ध्यान इस ओर आकर्षित करता है कि आधुनिक तकनीक को हर जरूरतमंद के लिए सस्ती और सुलभ बनाया जाना अनिवार्य है।

श्रवण हानि-एक वैश्विक चुनौती:-

वर्तमान में श्रवण अक्षमता एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती का रूप ले रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। इस संदर्भ में वर्तमान स्थिति की बात करें तो दुनिया भर में लगभग 43 करोड़ लोग (जिनमें 3.4 करोड़ बच्चे शामिल हैं) मध्यम से गंभीर श्रवण हानि से जूझ रहे हैं और यदि इस संबंध में समय पर निवारक उपाय नहीं किए गए, तो वर्ष 2050 तक यह संख्या 70 करोड़ से अधिक हो सकती है। यानी दुनिया का हर 10 में से 1 व्यक्ति इस समस्या से प्रभावित होगा। डब्ल्यूएचओ द्वारा ‘विश्व श्रवण दिवस’ (3 मार्च) से पूर्व जारी पहली वैश्विक रिपोर्ट के अनुसार, 2050 तक प्रत्येक 4 में से 1 व्यक्ति (लगभग 2.5 बिलियन लोग) किसी न किसी स्तर की श्रवण क्षति का सामना कर सकता है।भारत के संदर्भ में स्थिति की बात करें तो भारत में श्रवण संबंधी समस्याएं व्यापक हैं। आंकड़ों के अनुसार देश में लगभग 6 से 7 करोड़ लोग श्रवण अक्षमता से प्रभावित हैं। गौरतलब है कि प्रतिवर्ष भारत में 27,000 से अधिक बच्चे जन्मजात बधिर पैदा होते हैं।

इस संदर्भ में व्याप्त विभिन्न चुनौतियां:-

वास्तव में, श्रवण बाधा केवल सुनने की क्षमता तक सीमित समस्या नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के संपूर्ण सामाजिक, शैक्षिक और भावनात्मक जीवन को प्रभावित करती है। श्रवण बाधित लोगों को संचार में कठिनाई का सामना करना पड़ता है, जिससे शिक्षा प्राप्त करने, रोजगार पाने और सामाजिक संबंध बनाए रखने में चुनौतियाँ बढ़ जाती हैं। आम जनता में जागरूकता की कमी, निदान में अनावश्यक देरी, कुपोषण, शोर प्रदूषण और ग्रामीण क्षेत्रों में सीमित स्वास्थ्य सुविधाएं इस समस्या को और जटिल बनाती हैं।

निवारण और सुधार के मार्ग:-

श्रवण बाधा के निवारण और सुधार के लिए समय पर पहचान, उचित उपचार और जागरूकता बेहद आवश्यक हैं। गर्भावस्था में देखभाल, टीकाकरण, तेज आवाज़ से बचाव और कान के संक्रमण का इलाज रोकथाम में मदद करता है। जिन लोगों को समस्या है, उनके लिए हियरिंग एड, कॉक्लियर इम्प्लांट, स्पीच थेरेपी और सांकेतिक भाषा उपयोगी साधन हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार सही हस्तक्षेप से कई मामलों में श्रवण हानि को रोका या कम किया जा सकता है। दूसरे शब्दों में कहें तो व्यक्ति के जीवन की गुणवत्ता में बड़ा सुधार किया जा सकता है और यह तभी संभव है जब हम नवजात शिशुओं की समय पर स्क्रीनिंग करवाएं।उनका नियमित टीकाकरण और सुरक्षित दवाओं का उपयोग किया जाए।अत्यधिक शोर से बचाव हो।श्रवण यंत्रों और इम्प्लांट तकनीक की व्यापक उपलब्धता से श्रवण बाधाओ का काफ़ी हद तक निवारण किया जा सकता है।

अंत में निष्कर्ष के तौर पर यही कहूंगा कि अंतरराष्ट्रीय कॉक्लियर इम्प्लांट दिवस हमें यह विश्वास दिलाता है कि आधुनिक विज्ञान ने सुनने की अक्षमता को अब एक ‘बाधा’ के बजाय ‘उपचार योग्य स्थिति’ बना दिया है। सहानुभूति से कहीं अधिक आवश्यक सशक्तीकरण है। सही समय पर पहचान और तकनीक का उपयोग न केवल सुनने की शक्ति लौटा सकता है, बल्कि प्रभावित व्यक्ति को समाज की मुख्यधारा में भी स्थापित कर सकता है।